शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसायंकाल उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा शोभित हो रहा है, मानों रात्रिरूप नायिका के उत्संग में रजत मुद्रा है जिसका शिरोभाग काला है।
अर्थान्तरन्यास का लक्षण :
सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।।¹
जहाँ विशेष द्वारा सामान्य का अथवा सामान्य द्वारा विशेष का, कारण द्वारा कार्य का अथवा कार्य द्वारा कारण का—साधर्म्य अथवा वैधर्म्य के माध्यम से समर्थन किया जाता है वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। जैसे—
रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्रायः सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।²
राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीड़ा में चारों भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते हैं।
अप्रधानः प्रधानः स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।³
यदि राजा की सेवा करें तो साधारण व्यक्ति भी असाधारण तथा मुख्य हो जाय। यदि राजा की सेवा करने से वञ्चित रहा तो असाधारण तथा मुख्य व्यक्ति भी साधारण एव नगण्य हो जाता है।
1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 164, पृष्ठ स० 500
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 38, पृष्ठ स० 34-35
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