भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

उत्पन्ना युक्तिकार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते।
स एव तरते दुर्ग जलान्ते वानरो यथा।।¹

संकट के समय युक्ति की अपेक्षा रखने वाले कार्यों में जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वही विपत्ति को पार कर जाता है, जैसे जल के भीतर वानर ने किया था।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः।²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नही करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

उत्प्रेक्षा का लक्षण :

'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् ।³

किसी प्रकृत अर्थात प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की अप्रस्तुत (उपमान) के रूप में सम्भावना करना ही उत्प्रेक्षा है। जैसे-शुकसप्तति में प्रयुक्त उपमा के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

मणिकुट्टिममार्गेषु शोभते रविविस्तरः।
शेषफणमणिरागो वसुधामिवोपागतः।⁴

मणिमय भूमितल वाले मार्गों पर पड़ी सूर्य की किरणें ऐसी शोभित होती हैं मानो शेषनाग के सिरो की मणियों की चमक और रंग सर्वत्र भूमि पर फैला हुआ है।

उदयाचलमारूढो भाति चन्द्रो निशामुखे।
यामिनीवनितोत्सङ्गः शुल्क. कृष्णशिरःस्थितः।।⁵


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 319, पृष्ठ स० 268
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 123, पृष्ठ स० 106
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 139, पृष्ठ स० 460
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 137, पृष्ठ स० 115
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 147, पृष्ठ सं० 119

[ 157 ]