शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
उत्पन्ना युक्तिकार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते।
स एव तरते दुर्ग जलान्ते वानरो यथा।।¹
संकट के समय युक्ति की अपेक्षा रखने वाले कार्यों में जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वही विपत्ति को पार कर जाता है, जैसे जल के भीतर वानर ने किया था।
व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः।²
जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नही करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।
उत्प्रेक्षा का लक्षण :
'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् ।³
किसी प्रकृत अर्थात प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की अप्रस्तुत (उपमान) के रूप में सम्भावना करना ही उत्प्रेक्षा है। जैसे-शुकसप्तति में प्रयुक्त उपमा के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
मणिकुट्टिममार्गेषु शोभते रविविस्तरः।
शेषफणमणिरागो वसुधामिवोपागतः।⁴
मणिमय भूमितल वाले मार्गों पर पड़ी सूर्य की किरणें ऐसी शोभित होती हैं मानो शेषनाग के सिरो की मणियों की चमक और रंग सर्वत्र भूमि पर फैला हुआ है।
उदयाचलमारूढो भाति चन्द्रो निशामुखे।
यामिनीवनितोत्सङ्गः शुल्क. कृष्णशिरःस्थितः।।⁵
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 319, पृष्ठ स० 268
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 123, पृष्ठ स० 106
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 139, पृष्ठ स० 460
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 137, पृष्ठ स० 115
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 147, पृष्ठ सं० 119
[ 157 ]
सायंकाल उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा शोभित हो रहा है, मानों रात्रिरूप नायिका के उत्संग में रजत मुद्रा है जिसका शिरोभाग काला है।
अर्थान्तरन्यास का लक्षण :
सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।।¹
जहाँ विशेष द्वारा सामान्य का अथवा सामान्य द्वारा विशेष का, कारण द्वारा कार्य का अथवा कार्य द्वारा कारण का—साधर्म्य अथवा वैधर्म्य के माध्यम से समर्थन किया जाता है वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। जैसे—
रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्रायः सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।²
राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीड़ा में चारों भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते हैं।
अप्रधानः प्रधानः स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।³
यदि राजा की सेवा करें तो साधारण व्यक्ति भी असाधारण तथा मुख्य हो जाय। यदि राजा की सेवा करने से वञ्चित रहा तो असाधारण तथा मुख्य व्यक्ति भी साधारण एव नगण्य हो जाता है।
1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 164, पृष्ठ स० 500
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 38, पृष्ठ स० 34-35
[ 158 ]
दीपक का लक्षण :
सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्।
सैव क्रियासु वह्वीषु कारकस्येति दीपकम्।¹
जहाँ अप्रस्तुत (अप्रकृत अथवा उपमान) तथा प्रस्तुत (प्रकृत अथवा उपमेय) पदार्थों मे एक ही धर्म का सम्बन्ध हो अथवा (जहाँ) अनेक क्रियाओं का एक ही कारक हो, वही दीपक अलङ्कार होता है। जैसे–
हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः।
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः।²
हँसता हुआ भी राजा, सम्मान करता हुआ भी दुष्ट, स्पर्श करता हुआ भी गज, सूँघता हुआ भी सर्प, प्राणों को हरता है।
मालदीपक का लक्षण :
मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।³
यदि पूर्व–पूर्व (वस्तु) उत्तर–उत्तर की उपकारक (गुणाधायक) हो तो मालादीपक अलङ्कार होता है। जैसे–
उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता माध्यमाश्च पितुर्गुणैः।
अधमा मातुलैः ख्याता श्वशुरैश्चाधमाधमाः।⁴
उत्तम व्यक्ति अपने गुणो से, मध्यम व्यक्ति पिता के गुणों से, अधम व्यक्ति मामा के गुणो से तथा अधमों में अधम–महा अधम व्यक्ति ससुर के गुणों से प्रसिद्धि प्राप्त करते है।
1 काव्य प्रकाश, सूत्र सं० 155, पृष्ठ स० 487
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 36, पृष्ठ स० 33-34
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 156, पृष्ठ स० 489
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 66, पृष्ठ स० 52
[ 159 ]
निदर्शना का लक्षण :
अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमापरिकल्पकः निदर्शना।¹
जहाँ वस्तुओ का परस्पर सम्बन्ध सम्भव (अबाधित) अथवा असम्भव (बाधित) होता हुआ उनके बिम्ब-प्रतिविम्बभाव का बोधन करे वहाँ निदर्शना अलङ्कार होता है।
जैसे-
विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हन्तुं किं नाम पौरुषम्।।²
विश्वास करने वाले व्यक्ति को धोखा देना कौन सा पाण्डित्य है? अंक में स्थित सोये व्यक्ति को मारना कौन सी पौरुष की बात है?
रूपक का लक्षण :
तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।³
उपमान और उपमेय का (जिनका भेद प्रसिद्ध है उनका सादृश्यातिशयवश) जो अभेद (वर्णन) है वह रूपक अलंकार है। जैसे-
धूर्तोऽसौ मत्सुतालुब्धो धनहीनो भवत्यसौ।
मनोभवग्रहग्रस्तो असमञ्जसमीदृशम।⁴
यह धनहीन धूर्त कामदेव रूप ग्रह से ग्रस्त हो मेरी पुत्री पर लुब्ध होता है- उसके साथ रमण करना चाहता है। इस प्रकार यह युक्ति युक्त बात नहीं है (जो हमें चोरी लगा रहा है)।
सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां
लज्जां तावद्विधत्ते विनयमति समालम्बते तावदेव।
1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 148 पृष्ठ स० 474
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 71 पृष्ठ स० 55-56
3 काव्यप्रकाश, सूत्र स० 138 पृष्ठ स० 463
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 72 पृष्ठ स० 56
[ 160 ]
भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते।
यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति।¹
पुरूष तभी तक सन्मार्ग पर ठहरा रहता है, तभी तक इन्द्रियों के निरोध में समर्थ होता है, तभी तक लज्जा करता है, तभी तक विनय अपनाये रहता है, जब तक (कर्णपर्यन्त) खिंचे भ्रूरूप चाप से छोडे गये, लोचनपर्यन्त विस्तृत, नील बरौनीरूप पक्षवाले, धैर्य को विनष्ट करने वाले, सुन्दरियों के ये नेत्ररूप बाण हृदय में नहीं चुभते है।
अत्रान्तरे विशालाक्षि चन्द्रो हन्तुं तमोरिपुम्।
उदयाद्रिशिरः स्थातुमुद्यतोंऽशुभटैर्वृतः।।²
हे आयत लोचने! इस बीच में अन्धकार रूप शत्रु का विनाश करने के लिए चन्द्रमा किरण रूप योद्धाओं समेत उदयाचल के शिखर पर स्थित होने के लिये उद्यत हुआ।
प्रतिवस्तूपमा का लक्षण :
प्रतिवस्तूपमा तु सा।
सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः।³
जहा एक ही साधारणधर्म को दो वाक्यों में दो बार (भिन्न शब्दों से) कहा जाय वह प्रतिवस्तूमा (अलंङ्कार) होती है। जैसे-
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्राम जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवी त्यजेत्।।⁴
कुल की रक्षाके लिये एक को त्याग देना चाहिये। गाँव की रक्षा के लिये कुल को त्याग देना चाहिए। जनपद (देश) की रक्षा के लिये गाँव को तथा अपनी रक्षा के लिये पृथिवी (देश) को त्याग देना चाहिये।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 118, पृष्ठ स० 99-100
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 145, पृष्ठ स० 119
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 153, पृष्ठ स० 484
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 37, पृष्ठ स० 34
[ 161 ]
अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार का लक्षण·
अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुतताश्रया।¹
प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति कराने वाली (प्रस्तुताश्रया) जो अप्रस्तुत (अर्थ) की प्रशंसा (वर्णन) है वह ही अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है। जैसे—
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः।।²
अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात शीघ्र लाकर मिला देता है।
(य) “छन्द” :
संस्कृत साहित्य में काव्य की मुख्यतया दो विधायें मानी गई हैं— (1) पद्य काव्य (2) गद्य काव्य और इन्हीं दोनों काव्यों के मिश्रण से चम्पूकाव्य की रचना हुई है।
काव्य के अपेक्षित उपादान—सगुण, दोष–रहित तथा अलङ्कृत शब्दार्थ माने गये हैं, परन्तु पद्य काव्य के लिये जिस उपादान की आवश्यकता पड़ती है वह है 'छन्द' अर्थात् पद्यकाव्य मे गुणो के अतिरिक्त मात्रा, वर्ण, संख्या, यति, विराम, लय आदि की भी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति छन्दोनियम द्वारा होती है। पद्य का ही दूसरा नाम छन्द है।
छन्द दो प्रकार के माने गये गये हैं—
(1) वैदिक छन्द (2) लौकिक छन्द।
लौकिक छन्दों की उत्पत्ति वैदिक छन्दों से हुई है तथापि लौकिक छन्द वैदिक छन्दो से अधिक भिन्न होते हैं। वैदिक छन्दों में पादों की रचना अक्षर संख्या पर निर्भर है, उनमे लघु, गुरू, वर्ण तथा गण आदि का विचार नहीं किया जाता है। इसके विपरीत लौकिक छन्दों में ये सभी नियम अनिवार्य हैं, साथ ही प्रत्येक लौकिक छन्द में
1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 150, पृष्ठ सं० 476
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 61, पृष्ठ स० 47
[ 162 ]
चार पाद होते हैं जबकि वैदिक छन्दो में त्रिपाद वाले और पंचपाद वाले भी छन्द हैं। वैदिक छन्दो में अक्षरो की संख्या सन्धि तोडकर पूरी कर ली जाती है, जहाँ कहीं भी अक्षर नियमित संख्या से कम पाये जाते हैं जैसे-‘वरेण्यम’ में वरेणि+यम’ मान लिया जाता है किन्तु लौकिक छन्दों में वर्ण के लिये ऐसा नहीं माना जा सकता। वैदिक छन्दो के अन्तर्गत अनुष्टुप और त्रिष्टुप छन्द आते हैं। शेष लौकिक छन्दों के अंतर्गत हैं। जैसे- बसन्ततिलका, मालिनी, इन्द्रवज्रा आदि।
संस्कृत छन्दों की रचना मात्राओं से की जाती है स्वरों से नहीं। प्रत्येक लौकिक-छन्द में चार पाद होते हैं और प्रत्येक पाद में यदि वह समवृत है तो नियमित वर्ण ही होगे और वर्णों में भी लघु गुरू नियमानुसार ही होते हैं। लघु का चिन्ह (I) और गुरू का चिन्ह (s) है।
मात्रिक छन्दों में मात्राओं की गणना की जाती है वर्णों की नहीं जबकि वर्णवृत्तों में लघु गुरू वर्णों की गणना की जाती है।
छन्द योजना काव्य-शिल्प का महत्वपूर्ण अंङ्ग हैं काव्य की आत्मा रस का महत्वपूर्ण सम्बन्ध मानव अन्तस की भाव तरंङ्ग से है। मनोवेग काव्य में प्रयुक्त शब्दों की स्वर लहरी से उद्धवेलित होते हैं। यह स्वर लहरी मधुर, ललित एवं पुरूषलय की व्यञ्जक होती है और यही लय ही छन्द की आत्मा है। इस प्रकार छन्द-योजना का रस व्यञ्जना से घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृत काव्यशास्त्रों में छन्दों की प्रकृति पर गहराई से विचार किया गया है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने छन्दों के विषय में विशेष रूप से विचार किया और इस शाश्वत सत्य का उद्घाटन किया कि अमुक छन्द अमुक भाव अथवा रस या वस्तु वर्णन के लिये विशेष उपयुक्त है।
शुकसप्तति यद्यपि कथा-प्रधान (गद्य) ग्रन्थ है तथापि कवि ने इसमें छन्दों का यत्र-तत्र प्रयोग किया है। इस ग्रन्थ में प्रयुक्त छन्द वर्णनीय वस्तु के अनुसार प्रयुक्त हुये हैं। इनमें से कुछ वैदिक हैं कुछ लौकिक हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार है-
[ 163 ]
अनुष्टुप (प्रत्येक चरण में आठ अक्षर) :
पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः।
षष्ठ गुरू विजानीयादेतत्पद्यस्य लक्षणम्।।
पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तम द्विचतुर्थयोः
गुरू षष्ठ च जानीयात् शेषेष्वनियमो मतः।¹
अर्थात् अनुष्टुप छन्द के चारों चरणों मे पञ्चम वर्ण लघु होता है, द्वितीय और चतुर्थ चरणों का सत्तम वर्ण भी लघु होता है एव चारो चरणों में षष्ठ वर्ण गुरू होता है।
विषय वस्तु के अनुसार अनुष्टुप का वर्णन सुवृत्त तिलक में इस प्रकार किया गया है-
आरम्भे सर्गबन्धस्य कथाविस्तारसङ्ग्रहे।
समोपदेशवृत्तान्ते सन्तः शसन्त्यनुष्टुभम्।।
किसी सर्ग के प्रारम्भ में कथा के विस्तार संग्रह करने तथा उपदेश या वृतान्त कथन मे अनुष्टुप छन्द के प्रयोग की प्रशंसा विद्वानगण करते हैं। अनुष्टुप का स्वभाव इतिवृत्त वर्णन करने में बड़ा सुविधा पूर्ण होता है।
शुकसप्तति मे कथाओं के मध्य में किसी तथ्य या बात के समर्थन के प्रसङ्ग में अथवा आदर्श सम्बन्धित, कथनो में प्रसङ्ग में अथवा किसी तथ्य को प्रमाणिक सिद्ध करने के प्रसग मे अनुष्टुप का प्रयोग किया गया है। जैसे-
पित्रोस्ते दुःखिनोर्दुःखात्पतत्यश्रुचयो भुवि।
तेन पापेन ते वत्स पतनं देवशर्मवत् ।²
अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि पुत्र के द्यूतादि व्यसनों में आसक्त रहने से माता-पिता को असहय दुःख उत्पन्न होता है।
1 छन्दोमजरी 4/7
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 2, पृष्ठ स० 3
[ 164 ]
निजान्वयप्रणीतं यः सम्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तमाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।¹
स गृही स मुनिः साधु स च योगी स धार्मिक ः।
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।²
अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि सभी प्रकार के विकारो से रहित होकर जो मनुष्य अपने कुल का धर्मपूर्वक पालन करता है वही सच्चा गृहस्थ है, साधु है।
व्याघेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मसमः
अभवत्कीर्तिमॉल्लोके परतः कीर्तिभाजनम् ।³
अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि पूज्य का सम्मान न करने से मनुष्य को सम्मान की प्राप्ति नहीं होती।
तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।
मृतो मृत इति ज्ञात्वा क्षणात्स्नेहो निवर्तते ।।⁴
इस छन्द के द्वारा प्रस्तुत श्लोक मे समझाया गया है कि जीवित रहने पर ही अपनो का स्नेह रहता है, मरने पर नहीं।
कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिक्पुत्रकचग्रहे ।।⁵
उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि विपत्ति आ पड़ने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं, कोई सहायता नहीं करता है।
प्रपच्छ सा तदा सार्धं पुश्चलीभिः कृतादरा।
ससम्भ्रमा जगादेदं किमिदं भाषितं शुकः।⁶
1 शुकसप्तति., श्लोक सं० 3, पृष्ठ सं० 5
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 4, पृष्ठ सं० 5
3 शुकसप्तति, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्तति, श्लोक सं० 7, पृष्ठ स० 7
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 8, पृष्ठ सं० 9
6 शुकसप्तति., श्लोक सं० 9, पृष्ठ सं० 9
[ 165 ]
कथयन्ति न याचन्ते भिक्षाहारा गृहे गृहे।
अर्थिभ्यो दीयता नित्यमदातु. फलमीदृशम्।।¹
उपरोक्त छन्द के माध्यम से बतलाया गया है कि याचक को दान न देने वाला भीयाचक बनकर भटकता है।
बुद्धिरस्ति यदैषा ते व्रज सुभ्रु परान्तिकम्।
भज निद्रां विशालक्षि मान्यथा स्वं विडम्बय।|²
गच्छ देवि किमाश्चर्य यत्र ते रमते मन.।
नृपवद्यदि जानासि परित्राणं त्वमात्मन.।³
इस अनुष्टुप छन्द में यही दर्शाया गया है कि जिसका मन जहाँ रमता है वह वहीं जाता है कही और नही।
कृतावज्ञः पुरा देवि वृद्धवाक्यपराङ्मुखः।⁴
पतितो ब्राह्मणोऽनर्थे विषकन्याविवाहने।।
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि बड़े बुजुर्गों के वचनों का तिरस्कार करने वाला घोर सङ्कट में पडता है।
अविदग्धः पति स्त्रीणां प्रौढानां नायकोऽगुणी।
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्।।⁵
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन-ये तीनों दुःखदायी होते है।
तथापि कामिनीलुब्धो धिक्कृतः साधुभिस्तदा।।
तामेवादाय चलितस्तत्कृते निहतः पथि।।⁶
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 17, पृष्ठ स० 16
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 19 पृष्ठ स० 18
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 20 पृष्ठ स० 18
4 शु० स०, श्लोक स० 22, पृष्ठ स० 23
5 शु० स०, श्लोक स० 23, पृष्ठ सं० 24
6 शु० स०, श्लोक स० 28, पृष्ठ स० 29
[ 166 ]
नदीनां नखिनाञ्चैव शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ।।¹
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि नदियों, नखधारी, सिंहादि, शृंगधारी, भेडा आदि पशुओं, शस्त्रधारी पुरूषो, स्त्रियों एवं राजाओ का विश्वास नहीं करना चाहिए।
भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः।
दुःखोपसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव।।²
इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि भोगी, कञ्चुकावृत, क्रूर, कुटिलगामी, राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय होते हैं।
आरोहन्ति शनैर्भृत्या धुन्वन्तमपि पार्थिवम्।
कोपप्रसादवस्तूनां विचिन्वन्ति समीपपगाः।।³
इन अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि जिस प्रकार से वृक्ष पर चढ़ने वाला व्यक्ति गिरने का भय त्यागकर धीरे-धीरे उस पर चढ़ जाता है और यथाभाग्य मधुर फलो का चयन करता है उसी प्रकार अप्रसन्न राजा के पास अपनी पहुँच बनाने वाले व्यक्ति यथाभाग्य प्रसादफल प्राप्त करते हैं।
रोगैर्ग्रहैर्नृपर्यस्तो या न वेत्ति जडक्रियः।
मध्यमन्त्रमुपायं च सोऽवश्यं तात न स्थिरः ।।⁴
उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि जो व्यक्ति आलसी एवं दीर्घसूत्री रोगग्रस्त होने पर युक्ताहार-विहार, ग्रहग्रस्त होने पर मन्त्र, और नृपग्रस्त होने पर साम-दानादि उपाय नही करता वह नष्ट हो जाता है।
1 शु० स०, श्लोक स० 34, पृष्ठ स० 33
2 शु० स०, श्लोक स० 35, पृष्ठ स० 33
3 शु० स०, श्लोक स० 39, पृष्ठ स० 35
4 शु० स०, श्लोक स० 43, पृष्ठ स० 37
[ 167 ]
मा वृकोदर पादेन एकादशचमूपतिम्।
पञ्चानामपि यो भर्ता नासाप्रकृतिमानवी।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पाँच आदमियों का पोषण करने वाला भी महान होता है दुर्योधन के पास तो ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी।।
प्रदोषसमयेऽन्यस्मिन्कामिनी काममोहिता।
विनयेन शुकं प्राह गच्छामि यदि मन्यसे।।²
विरञ्चिरपि कामार्तःस्वसुतामभिलाषुकः।
दृश्यतेऽद्यापि वियति हारिणीं तनुमाश्रितः।।³
यह अनुष्टुप छन्द यह उपदेश देता है कि कामपीडित व्यक्ति किसी में भी साभिलाष हो सकता है इससे उसे पाप या कलङ्क नहीं लगता।
तयैवं बोधितो मूर्खः स यावद्रमते न ताम्।
फूत्कृतं मुषितास्मीति त्रायतां त्रायतामहो।।⁴
व्रज देवि सुखं भुङ्क्ष्व अर्धभुक्ते पतौ यथा।
कृत राजिकया चित्तमुत्तरं धूलिसयुतम्।।⁵
युक्तमेव विशालाक्षि पर रन्तुं यदृच्छया।
यद्यायाते पतौ वेत्सि धनश्रीरिव भाषितुम।।⁶
न स्नाति न च सा भुङ्क्ते न जल्पति सखीसमम्।
निरस्ताशेषसस्कारा स्वदेहेऽपि पराङ्मुखी।।⁷
मलयानिलमारूढ कोकिलालापडिण्डिमः।
1 शु० स०, श्लोक स० 50, पृष्ठ स० 40
2 शु० स०, श्लोक सं० 83, पृष्ठ स० 69
3 शु० स०, श्लोक स० 96, पृष्ठ स० 76
4 शु० स०, श्लोक स० 98, पृष्ठ स० 76
5 शु० स०, श्लोक स० 100, पृष्ठ स० 80
6 शु० स०, श्लोक स० 101, पृष्ठ स० 82
7 शु० स०, श्लोक स० 102 , पृष्ठ स० 83
[ 168 ]
मल्लिकाामोददूतश्च मधुपारवमङ्गलः ।।¹
अन्यदा तु समायतो वसन्त कालराट् क्षितौ।
मनोऽपि विक्रिया यस्मिन्याति संयमिनां किल ।।²
सत्यमेव त्वयाभाणि कर्तव्यं यन्मनोऽनुगम्।
मनस्तु मुग्धिका यद्वदशक्यान्खेदयत्यलम् ।।³
इस अनुष्टुप के माध्यम से यही कहा गया है कि मनोवाञ्छित कार्य से ही खुशी प्राप्त होती है अन्यथा खिन्नता प्राप्त होती है।
गच्छ देवि न ते दोषो गच्छन्त्याः परवेश्मनि।
यदि काचिच्छरीरे ते बुद्धि सर्षपचौरवत् ।।⁴
कुरु यद्रोचते भीरु यदि कर्तुं त्वमीश्वरा।
यथा सन्तिकया भर्ता स्वच्छन्दा च विमोचिता ।।⁵
गच्छ देवि मनो यत्र रमते ते नरान्तरे।
केलिकावद्यदा वेत्सि पतिवञ्चनमद्भुतम् ।।⁶
अनुरागो वृथा स्त्रीषु गर्वो वृथा तथा।
प्रियोऽहं सर्वदा ह्यस्या ममैषा सर्वदा प्रिया ।।⁷
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि स्त्रीविषयक अनुराग व गर्व व्यर्थ होता है।
ये जात्यादिमहोत्साहा, नोपगच्छन्ति पार्थिवम्।
तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्त विनिर्मितम् ।।⁸
1 शु० स०, श्लोक स० 103, पृष्ठ स० 83
2 शु० स०, श्लोक स० 104, पृष्ठ स० 83
3 शु० स०, श्लोक स० 110, पृष्ठ स० 91
4 शु० स०, श्लोक स० 115, पृष्ठ स० 97
5 शु० स०, श्लोक सं० 117, पृष्ठ सं० 98
6 शु० स०, श्लोक स० 119, पृष्ठ स० 101
7 शु० स०, श्लोक स० 322, पृष्ठ स० 272
8 शु० स०, श्लोक सं० 42, पृष्ठ स० 36
[ 169 ]
विवाहे पार्वतीं दृष्ट्वा हरस्य हरवल्लभाम्।
चस्कन्द रेतस्तस्यापि, बालखिल्यास्तदुद्भवाः।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बतलाया गया है राजा के समीप न जाने से मनुष्य किस दशा को प्राप्त हो जाता है और बालखिब्य ऋषि की उत्पत्ति कैसे हुई।
शार्दूलविक्रीडित (प्रत्येक चरण में उन्नीस अक्षर) :
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।²
जिस छन्द के प्रत्येक चरण मे क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण तथा अन्त मे एक गुरू वर्ण आये एवं 12 तथा 7 सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे शार्दूलविक्रीडित छन्द कहा जाता है।
वैद्य पानरतं नटं कुपठितं मूर्खं परिव्राजकं
योधं कापुरुषं विटं विवयसं स्वाध्यायहीनं द्विजम्।
राज्यं बालनरेन्द्रमन्त्रिरहित मित्रं छलान्वेषि च
भार्या यौवनगर्वितां पररता मुञ्चन्ति ये पण्डिताः ।।³
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पण्डितजनों को मद्यपीने वाले वैद्य, ठीक सवाद न कहने वाले अभिनेता, मूर्ख संन्यासी, कायर योद्धा, बुड्ढे विट, वेदादि नहीं पढ़ने वाले ब्राह्मण, मन्त्रिरहित बालराजा के राज्य, कपटाचारी मित्र तथा यौवनोन्मत्त एवं परपुरूष मे आसक्त पत्नी का परित्याग कर देना चाहिये।
क्षुत्क्षामस्य करण्डपिण्डिततनोम्म्लानिन्द्रियस्य क्षुधा
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा
स्वस्थास्तिष्ठत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणम्।⁴
¹ शु० स०, श्लोक स० 97 पृष्ठ स० 76
² वृत्तरत्नाकर, 3/100
³ शुकसप्तति, श्लोक स० 27, पृष्ठ सं० 28
⁴ शुकसप्तति, श्लोक स० 62, पृष्ठ स० 47-48
[ 170 ]
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को धैर्य रखना चाहिये क्यों कि उसकी समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण सबका कारण दैव है।
रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषीं धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।¹
इस छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरूष भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाते है।
यत्र स्वेदलवैरलं विलुलितैर्व्यालुप्यते चन्दनं
सच्छेदैर्मणितैश्च यत्रा रणित न श्रूयते नुपुरम्।
यत्रायान्त्यचिरेण सर्वविषयाः काम तदेकाग्रतः
सख्यस्तत्सुरत भणामि रतये शेषा च लोकस्थितिः ।।²
प्रस्तुत छन्द में किस प्रकार का सुरत प्रीतिकारक होता है, इसके बारे में बताया गया है।
उन्नादाम्बुदवद्धितान्धतमसि प्रभ्रष्टदिङ् मण्डले।
काले यामिकजागरूकसुभटव्याकीर्णकोलाहले।
भूपस्यासुहृदार्णवाम्बुवडवावह्नस्त्वमन्तःपुरा
दायातासि यदम्बुजाक्षि कृतक मन्ये भयं योषिताम।³
प्रस्तुत छन्द के माध्यम से यही बताया गया है कि प्रमदा-जन में जो भय की प्रवृत्ति है वह केवल कृत्रिम है, वास्तव में उन्हें किसी से भय नही लगता।
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 131 पृष्ठ स० 112-113
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 259 पृष्ठ स० 227
[ 171 ]
माधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने, शौर्यं शत्रुषु मार्दवं गुरूजने धर्मिष्ठता साधुषु। मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविधं मानं जने गर्विते, शाठय पापजने नरस्य कथित. पर्यन्तमष्टौ गुणां.।।¹
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि यदि ये आठ गुण मुनष्य में अर्न्तनिहित हैं तभी वह गुणी माना जायेगा।
अप्राज्ञेन च कातरेण च गुणः स्यात्सानुरागेण कः प्रजाविक्रमशालिनोऽपि हि भवेत् कि भक्तिहीनात्फलम्। प्रज्ञाविक्रमभक्तयः समुदिता येषां गुणा भूतये ते भृत्या नृपतेः कलत्रमितरे सम्पत्सु चापत्सु च।²
उपरोक्त शार्दूलविक्रीडित छन्द के माध्यम से यही आदर्श दर्शाया गया है कि जिस सेवक मे प्रज्ञा, विक्रम, भक्ति ये तीनों गुण पूर्ण विकसित हों वे ही सेवक राजा की समृद्धि बढ़ाने वाले, सम्पत्ति और विपत्ति में साथ देने वाले दूसरे कलत्र (पत्नी) है।
स्वामी दुर्णयवारणव्यतिकरे शास्त्रोपदेशे गुरू- र्विश्रम्भे हृदयं नियोगसमये दासो भये चाश्रयः। दाता सप्तसमुद्रसीमरशनादामान्तिकायाःक्षितेः सर्वाकारमभूत्स्वयं वरसुहृत्को वा न कर्णो मम।।³
प्रस्तुत छन्द मे मन्त्री में होने वाले गुणों को दर्शाया गया है।
मालिनी : (प्रत्येक चरण में पन्द्रह अक्षर)
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।⁴
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 119 पृष्ठ स० 104
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 229 पृष्ठ स० 197
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 233 पृष्ठ सं० 200
4 वृत्तरत्नाकर, 3/87
[ 172 ]
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः नगण, नगण मगण, यगण तथा यगण आये, साथ ही साथ भोगी अर्थात् नाग (8) तथा लोक (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे मालिनी कहते हैं।
सुवृत्त-तिलक मे मालिनी छन्द का इस प्रकार वर्णन किया गया है–
कुर्यात्सर्गस्य पर्यन्ते मालिनी द्रुततालवत्।
सर्ग के अन्त में द्रुतताल के समान मालिनी छन्द का प्रयोग करना चाहिये। महाकाव्यों मे सर्ग के अन्त में छन्द परिवर्तन करने का नियम है। सर्ग की समाप्ति में जब कवि को किसी कथा को अथवा प्रसङ्ग को शीघ्रता से समाप्त करना होता है तब मालिनी छन्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है।
शुकसप्तति कथा काव्य होने के कारण इसमें सर्ग नहीं प्राप्त होते हैं। अतः कवि ने मालिनी के स्वरूप का पालन करते हुये इस छन्द का प्रयोग कहीं-कहीं कथा के मध्य और कहीं-कही कथा के अन्त में किया है।
जैसे–
उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना–
ममृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः
भवति विकलमूर्तिर्मण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम्।।¹
मालिनी छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि तेजस्वी से तेजस्वी व्यक्ति भी दूसरे के घर जाकर लघुता को प्राप्त करता है अर्थात् उसका तेज घट जाता है।
वंशस्थ- (प्रत्येक चरण में बारह अक्षर)
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।²
¹ शुकसप्ततिः, श्लोक स० 307 पृष्ठ स० 257
² वृत्तरत्नाकर, 3/46
[ 173 ]
वीर एवं रौद्र रस के मेल में वसन्ततिलका छन्द उपयुक्त माना गया है किन्तु शुकसप्तति में स्त्रियों के स्वभाव, कथन उनके आचरण, साधुपुरूषों के आचरण इत्यादि का कथन करने के प्रसङ्ग में कवि ने इस छन्द का प्रयोग किया है। जैसे-
अद्यापि नोज्झति हरः किल कालकूटं, कूर्मी बिभर्ति धरणीं खलु चात्मपृष्ठे। अम्भोनिधिर्वहति दुःसहवाडवाग्नि- मङ्गीकृतं सुकृतिन. परिपालयन्ति।¹
वसन्तलिका छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि महान पुरुष अपना सर्वस्व बलिदान करके भी दिये गये वचन का परिपालन करते हैं।
चिन्तामिमां वहषि किं गजयूथनाथ यूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म। पिण्डं गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपदः किल सम्यदो वा।
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को हर स्थिति में धैर्य धारण करना चाहिये और जो कुछ भी दैवकृपा से प्राप्त हो रहा हो उसी में संतोष रखना चाहिए। सुख-दुःख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।
संमोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति। एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणा किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।²
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि किस प्रकार से कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ दयालु हृदय पुरुषों के साथ कौन-कौन से व्यवहार करती हैं।
1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 13, पृष्ठ सं० 12
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 275-276
[ 175 ]
स्रग्धरा (प्रत्येक चरण में इक्कीस अक्षर)
म्रभ्नैर्यानां त्रायेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।¹
जिसके चारो चरणो मे क्रमश मगण, रगण, भगण, नगण तथा तीन यगणों से युक्त और तीन बार मुनि अर्थात् (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो ऐसी छन्द रचना को स्रग्धरा कहा जाता है। जैसे–
सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवित पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां । लज्जां तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ।²
प्रस्तुत श्लोक में स्रग्धरा छन्द के माध्यम से पुरुषों की सीमाओं एवं उसके धैर्य का वर्णन किया गया है।
इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण मे ग्यारह अक्षर)
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।³
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण तथा दो गुरू वर्ण क्रमशः हों, उसे इन्द्रवज्रा छन्द कहते हैं। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होता है। जैसे–
इन्दात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम् । सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम् ।।⁴
प्रस्तुत छन्द के माध्यम से राजा के शरीर की रचना कैसे होती है यह बताया गया है।
1 वृत्तरत्नाक, 3/104
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 118 पृष्ठ स० 99
3 वृत्तरत्नाक, 3/23
4 शुकसत्तति, श्लोक स० 49 पृष्ठ स० 39
[ 176 ]
छठवाँ अध्याय : संस्करण एवं सूक्तियाँ
आर्याछन्द :
यस्या. पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि ।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चमदश साऽऽर्या ।।¹
अर्थात जिसके प्रथम चरण मे तथा तृतीय चरण मे भी बारह मात्रायें हों, द्वितीय चरण में अठारह तथा चतुर्थ चरण मे पन्द्रह मात्रायें हो, वह आर्या है।
जैसे-
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात् ।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ।²
प्रस्तुत आर्या छन्द के माध्यम से यही उपदिष्ट किया गया है कि अनुकूल दैव दूसरे दीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लोकर मिला देता है।
उपर्युक्त छन्दो के प्रयोग को देखकर यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी किसी विशिष्ट बात पर बल देने के लिये छन्दों का आश्रय लिया है। आदर्श सम्बन्धी, व्यवहार परक, नीतिपरक कथनों मे वैशिष्ट्य उत्पन्न करने के लिये ही कवि ने विविध छन्दो का प्रयोग किया है जो गद्य द्वारा संभव नहीं था। शुकसप्तति की गद्यमयी कथा के मध्य में इन छन्दो का प्रयोग ‘सोने मे सुहागे’ का काम करते हैं। ये छन्द कथा को गति प्रदान करने में ही सार्थक भूमिका निभाते हुये दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार कवि का छन्द प्रयोग अत्यन्त सार्थक है।
¹ श्रुतबोध।
² शुकसप्तति-, श्लोक स० 61 पृष्ठ स० 39
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