शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने, शौर्यं शत्रुषु मार्दवं गुरूजने धर्मिष्ठता साधुषु। मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविधं मानं जने गर्विते, शाठय पापजने नरस्य कथित. पर्यन्तमष्टौ गुणां.।।¹
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि यदि ये आठ गुण मुनष्य में अर्न्तनिहित हैं तभी वह गुणी माना जायेगा।
अप्राज्ञेन च कातरेण च गुणः स्यात्सानुरागेण कः प्रजाविक्रमशालिनोऽपि हि भवेत् कि भक्तिहीनात्फलम्। प्रज्ञाविक्रमभक्तयः समुदिता येषां गुणा भूतये ते भृत्या नृपतेः कलत्रमितरे सम्पत्सु चापत्सु च।²
उपरोक्त शार्दूलविक्रीडित छन्द के माध्यम से यही आदर्श दर्शाया गया है कि जिस सेवक मे प्रज्ञा, विक्रम, भक्ति ये तीनों गुण पूर्ण विकसित हों वे ही सेवक राजा की समृद्धि बढ़ाने वाले, सम्पत्ति और विपत्ति में साथ देने वाले दूसरे कलत्र (पत्नी) है।
स्वामी दुर्णयवारणव्यतिकरे शास्त्रोपदेशे गुरू- र्विश्रम्भे हृदयं नियोगसमये दासो भये चाश्रयः। दाता सप्तसमुद्रसीमरशनादामान्तिकायाःक्षितेः सर्वाकारमभूत्स्वयं वरसुहृत्को वा न कर्णो मम।।³
प्रस्तुत छन्द मे मन्त्री में होने वाले गुणों को दर्शाया गया है।
मालिनी : (प्रत्येक चरण में पन्द्रह अक्षर)
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।⁴
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 119 पृष्ठ स० 104
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 229 पृष्ठ स० 197
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 233 पृष्ठ सं० 200
4 वृत्तरत्नाकर, 3/87
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