भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को धैर्य रखना चाहिये क्यों कि उसकी समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण सबका कारण दैव है।

रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषीं धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।¹

इस छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरूष भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाते है।

यत्र स्वेदलवैरलं विलुलितैर्व्यालुप्यते चन्दनं
सच्छेदैर्मणितैश्च यत्रा रणित न श्रूयते नुपुरम्।
यत्रायान्त्यचिरेण सर्वविषयाः काम तदेकाग्रतः
सख्यस्तत्सुरत भणामि रतये शेषा च लोकस्थितिः ।।²

प्रस्तुत छन्द में किस प्रकार का सुरत प्रीतिकारक होता है, इसके बारे में बताया गया है।

उन्नादाम्बुदवद्धितान्धतमसि प्रभ्रष्टदिङ् मण्डले।
काले यामिकजागरूकसुभटव्याकीर्णकोलाहले।
भूपस्यासुहृदार्णवाम्बुवडवावह्नस्त्वमन्तःपुरा
दायातासि यदम्बुजाक्षि कृतक मन्ये भयं योषिताम।³

प्रस्तुत छन्द के माध्यम से यही बताया गया है कि प्रमदा-जन में जो भय की प्रवृत्ति है वह केवल कृत्रिम है, वास्तव में उन्हें किसी से भय नही लगता।


1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 131 पृष्ठ स० 112-113
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 259 पृष्ठ स० 227

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