शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
छठाँ अध्याय
"संस्करण एवं सूक्तियाँ"
"संस्करण एवं सूक्तियाँ"
शुकसप्तति के प्रधान रूप से दो संस्करण प्राप्त होते हैं -
(1) सामान्य संस्करण :
इसका सम्पादन स्मिट नामक विद्वान ने किया है किन्तु इसका काल अनिश्चित है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इसे संक्षिप्त वाचनिका माना है। प्रसिद्ध इतिहासकार कीथ के अनुसार सामान्य और अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत दोनों संस्करणों का सम्पादन स्मिट ने किया है। यद्यपि श्वेताम्बर जैन की रचना प्रतीत होती है।¹ इनमें से साधारण संस्करण प्राचीन नहीं है। यह बहुत कुछ परिष्कृत-संस्करण का एक संक्षिप्त रूपान्तर है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि इसमें कहानियों के वास्तविक अभिप्राय को अस्पष्ट ही छोड़ दिया गया है। ऐसा लगता है कि जैन ग्रन्थकार हेमचन्द्र किसी न किसी रूप में इससे परिचित थे।
इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तिपरक पद्यों का निवेश किया गया रहा होगा और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन-परक पद्य रहे होंगे।
इस संस्करण में मूलकथा के रूप में हरिदत्त नामक व्यापारी का मदनसेन नामक एक मूर्ख पुत्र की कथा प्राप्त होती है। जो शुक और मैना के उपदेश के कारण सदाचारी बन जाता है। यहाँ तक कि जब वह व्यापार हेतु यात्रा पर जाने लगता है तब अपनी पत्नी को उन दोनों पक्षियों के सुपुर्द कर जाता है। बुद्धिमान शुक प्रतिदिन एक कथा को सुनाकर उसकी पत्नी के चरित्र की रक्षा करता है।
¹ संस्कृत-साहित्य का इतिहास-ए बी कीथ।
भाषान्तरकार (डा० मङ्गलदेव शास्त्री) पृष्ठ-345
(2) परिष्कृत संस्करण :
इस संस्करण का सम्पादन चिन्तामणि भट्ट नामक एक ब्राह्मण द्वारा किया गया है। इसमें चिन्तामणि भट्ट ने पञ्चतन्त्र के पूर्णभट्ट कृत (1999) जैन संस्करण का उपयोग किया था। ऐसा भी विचार प्रकट किया गया है कि बहुत सम्भव है कि कुलटा पत्नियो की कम से कम कुछ कहानियाँ शुकसप्तति के एक प्राचीनतर रुप से ली गयी थी। इसका समय लगभग 12 वीं शताब्दी के आस-पास है।
इस संस्करण मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता से यह सम्भावना प्रकट की जा सकती है कि यह संग्रह अपने मूलरुप में प्राकृत भाषा में रहा होगा।
इस संस्करण में 70 कहानियाँ प्राप्त होती हैं। जिसमें कथा के रुप में हरिदत्त व्यापारी के मूर्खपुत्र की कथा प्राप्त होती है जिसके विदेश जाने पर उसकी पत्नी को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिए शुक द्वारा प्रतिदिन एक कहानी सुनाकर उसके पति के आने तक पथभ्रष्ट होने से रोका जाता है।
(3) "सूक्तियाँ" :
सूक्ति का अर्थ है, सु+उक्ति अर्थात् सुन्दर कथन। काव्य शास्त्रकारों ने काव्य के प्रयोजनों के अन्तर्गत "व्यवहाविदे" "कान्दासम्मिततयोपदेशयुजे"। इन दो प्रयोजनों का कथन किया है।¹ यदि यह कहा जाय कि इन दोनों प्रयोजनों की पूर्ति काव्य में प्रयुक्त सूक्तियों के माध्यम से होती है तो गलत न होगा, क्योंकि सूक्तियाँ व्यवहारिक ज्ञान तो प्रदान करती ही हैं, साथ ही "कान्तावत्" उपदेश भी देती हैं।
किसी भी कथन को सारगर्भित रुप से ऐसे सुन्दर ढंग से कहना कि उसका प्रभाव चिरस्थायी हो सके, सूक्ति कहलाता है। प्राचीन काल से कवि नैतिक, धार्मिक,
¹ काव्य यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।
आचार्य मम्मट, काव्य प्रकाश, प्रथम उल्लास, कारिका 2, पृ० स० 10
[ 179 ]
राजनैतिक, तथा लौकिक जगत से सम्बन्धित अपने कथन को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने के लिये सूक्तियों का आश्रय लेते आये हैं। यदि कथन को सामान्य रूप से कहा जाय तो समाज में उसका प्रभाव प्रायः नही पड पाता, किन्तु उसी कथन को यदि अलङ्कारिक या चमत्कारिक ढंग से कहा जाय तो व्यक्ति और समाज पर उसक प्रभाव निश्चित रुप से पडता है । ये सूक्तियाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार ही हैं।
सस्कृत-साहित्य की प्रत्येक विधा सूक्तियों से समृद्ध है। काव्य, नाटक, कथा एवं आख्यायिका में प्रचुर मात्रा में सूक्तियो का प्रयोग मिलता है। वस्तुतः ज्ञानी पुरुषों एव कवियों की वाणी से उद्भूत निष्कर्ष कथन ही सूक्तियों का रुप धारण कर लते हैं।¹ संस्कृत साहित्य में जीवन, जगत, समाज, राजनीति, भौतिक द्वन्द्वों, भाग्य, पुरुषार्थ, सज्जन, दुर्जन, मित्र, अमित्र, आदि विविध विषयों से सम्बन्धित सूक्तियों का प्रयोग देखा जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र पर इन सूक्तियों का प्रभाव देखा जा सकता है।²
शुकसप्तति में प्रचुर मात्रा मे सूक्तियों का प्रयोग हुआ है। कवि ने अपने कथन को अधिक प्रभावशाली एव शिक्षात्मक बनाने के लिये प्रायः प्रत्येक कथा के अन्तर्गत शुक के माध्यम से सारगर्भित कथनों का प्रयोग किया है। इस ग्रंथ में सूक्तियों की विविधता दर्शनीय है। मदनविनोद की पत्नी प्रभावती को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिये अनेक उपदेशात्मक, व्यवहारिक, नैतिक-आदर्शों से युक्त सूक्तियों का प्रयोग
1 'महापुरुषो की वाणियों मे अद्भुत शक्ति होती है। कठिनाई के समय और कर्तव्यगत द्वन्द उपस्थित होने पर ये सूक्तियाँ प्रकाश और प्रेरणा देती हैं। ससार की समृद्धि भाषाओं में सूक्तियों का बड़ा मान है।'
हजारी प्रसाद द्विवेदी
रमाशंकर गुप्त संग्रहीत "सूक्ति सागर", भूमिका पृ० 7, 1959
2 विधाता की मानव सृष्टि में सूक्तियाँ कल्प-तरु के समान हैं। उनकी सुविस्तृत सघन-छाया में जीवन-पंथ की थकान को ही दूर करने की शक्ति नहीं है, प्रत्युत भविष्य की दुर्गम-यात्रा को सुखपूर्वक समाप्त करने का इनमें अक्षय तथा दैवी सम्बल भी रहता है। किं बहुना, मानव-मन की कोई ऐसी अज्ञात दिशा अथवा अँधेरी गली नहीं है, जिसमें इन सूक्तियों के शुभ्र किरणों का प्रकाश न पड़ता हो। सुख-दुख, विपत्ति, अनुराग-विराग, सज्जन-दुर्जन, योग-भोग, प्रशंसा-निन्दा से भरे इस द्वन्द्वात्मक जगत में इन सूक्तियों की गति सर्वत्र है। ब्रह्मा की भाँति ये सर्वव्यापी बन गई हैं।
राम प्रताप शास्त्री, रमाशंकर गुप्त संग्रहीत-
'सूक्ति-सागर' पृ० 10, 1959
[ 180 ]
कवि ने किया है। ग्रन्थकार ने सूक्तियों का प्रयोग पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों रूपों में किया है।
सज्जनो का व्यवहार किस तरह होता है इस तरह की भी सूक्तियाँ कुछ श्लोकों में दृष्टव्य हैं-
सज्जनों के प्रति :
सज्जन तीर्थरुप होते हैं, सज्जनों का दर्शन पवित्रकर होता है। सज्जन तीर्थों से भी बढकर होते है क्योकि तीर्थ तो कुछ समय मे फलदायी होते हैं परन्तु सज्जनों का समागम तत्काल फल देता है।¹
दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायों को हरने के लिये गये थे।²
इसी प्रकार मनुष्य को एक दूसरे के प्रति किस प्रकार का व्यवहार रखना चाहिये इसके लिये भी विभिन्न प्रकार की सूक्तियाँ शुकसप्तति ग्रन्थ में कही गयी हैं।
यथा-
(अ) व्यवहारिक सूक्तियाँ :
सत्कर्म के बल से गर्वयुक्त धीर सदा निर्दोष एवं भय रहित होते हैं और कुकर्म में संलग्न सत्रस्त पापी-जन सदा सर्वत्र शंका युक्त ही होते हैं।³
1 साधुना दर्शनं पुण्य तीर्थभूता हि साधवः।
तीर्थं फलति कालेन सद्य साधुसमागमः।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 316, पृष्ठ स० 264
2 असता सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 336, पृष्ठ स० 279
3 सर्वत्र शुचयो धीरा सुकर्मबलगर्विता ।
कुकर्मभयसन्त्रस्ताः पापाः सर्वत्र शङ्किता ।।
— शुकसप्तति, श्लोकसं० 323, पृष्ठसं० 272
[ 181 ]
अविश्वस्त पर विश्वास न करें, विश्वास पर भी विश्वास न करें, क्योंकि विश्वास से उत्पन्न भय समूल विनष्ट कर देता है।¹
बिना दूसरों के मर्मस्थल का छेदन किये, बिना दुष्कर कर्म किये, बिना किसी को मारे, मत्स्यघाती (मछुआ) की भाँति कोई महालक्ष्मी को नहीं पाता है।²
भूखा क्या पाप नहीं करता? भूख से पीड़ित जन निष्करुण हो जाते हैं। ये जीवन के लिये (पाप–कर्म) करते हैं। सज्जनों का जो मत (पुण्य–कर्म) है वह इन्हें मान्य नहीं हैं।³
हे भीरु! प्राणियों की बुद्धि बलवती है, पराक्रम नहीं। (जैसे) अल्प बल वाले शशक ने पराक्रमी सिंह को मार डाला।⁴
राजन ! प्रिय बोलने वाले पुरुष तो सदा सुलभ होते हैं किन्तु अप्रिय तथा हित की बात कहने वाला और सुनने वाला ये दोनों दुर्लभ होते हैं।
व्यवहारिक सूक्तियो के अतिरिक्त इस कथा–ग्रन्थ में उपदेशप्रद सूक्तियों की भी अनुपम छटा दर्शनीय है। यथा–
1
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्न मूलादपि निकृन्तति।।
शुकसप्तति, श्लोक स० 120, पृष्ठ स० 105
2
नाभित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम्।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम्
शुकसप्तति, श्लोक सं० 156, पृष्ठ सं० 125
3
बुभुक्षितः किं न करोति पाप क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति।
प्राणार्थमेते हि समाचरन्ति मतं सता यन्न मत तदेषाम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 59, पृष्ठ सं० 45
4
बुद्धिर्बलवती भीरु सत्त्वानां न पराक्रमः।
शशकेनाल्पसत्त्वेन हतः सिंह पराक्रमी।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 178, पृष्ठस० 147
[ 182 ]
(ब) उपदेशात्मक सूक्तियाँ :
भूख से दुर्बल, बाँस की डलिया मे शरीर को सपिडित किये स्थित, भूख से म्लानेन्द्रिय सर्प के मुख मे रात के समय मूषक उसमें बिल बनाकर स्वयं चला गया। अतः तुम सब धैर्य रक्खो, मनुष्य की समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण का कारण दैव है।¹
मनुष्य के पास आठ गुण कहे गये हैं इनके होने पर ही वह गुणी माना जाता है। वे ये हैं (1) तरुणी स्त्रियों के साथ मधुर व्यवहार (2) शिष्ट समुदाय के साथ अनुकूल व्यवहार, (3) शत्रुओं पर पराक्रम दिखाना, (4) पूज्य एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों से नम्रता, (5) सज्जनों के साथ धर्मिष्ठता, (6) रहस्य जानने वालों के साथ उनके मनोनुकूल आचरण करना (7) अभिमानियों के साथ बहुविध मान करना (8) शठों के साथ शठता का व्यवहार करना चाहिये।²
जो लोग कपटी जनों के साथ कपट पूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।³
दैव के प्रतिकूल होने पर साधनों का आधिक्य भी निष्फल होता है। अस्त को प्राप्त होने वाले सूर्य को उसकी सहस्र किरणें भी अवलम्ब नहीं दे सकीं।⁴
1 सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभा ।।
— शुकसप्तति., श्लोक स० 325, पृष्ठस० 274
2 माधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने शौर्यं शत्रुपु मार्दवं धर्मिष्ठता साधुषु।
मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविध मान जने गर्विते शाठयं पापजने नरस्य कथिता. पर्यन्तमष्टौ गुणा.।।
— शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 119, पृष्ठसं० 104
3 व्रजन्ति ते मूढधिय. पराभव भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः।।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषव ।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 123, पृष्ठ सं० 106
4 प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ विफलत्वमेति बहुसाधनता।
अवलम्बनाय दिनभर्तुरमूर्न्न पतिष्यत. करसहस्रमपि।।
— शुकसप्तति. श्लोक स० 143, पृष्ठ सं० 118
[ 183 ]
हे गजयूथनाथ! यूथ से वियोग होने के कारण मुँदे नेत्र वाले। इस प्रकार चिन्ता क्यो कर रहे हो? जो कुछ प्राप्त रहा है वह ग्रास ग्रहण करो और जल पियो। दुःख-सुख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।¹
जो कोई जैसा करे उसके साथ वैसा ही करो-कोई उपकार करता है तुम भी प्रत्युपकार करो, हिंसा करता है तुम प्रतिहिंसा करो। तुमने पंख नोच डाले, मैंने सिर को रोमहीन कर दिया अर्थात् जो कोई जैसा व्यवहार करे उसके साथ वैसा व्यवहार करो।²
बुद्धिमान बिना प्रयोजन समझे अथवा प्रयोजन समझ लेने पर सहसा कोई बात न कहे क्योंकि विधाता अथवा दैव न जाने क्या करना चाहता हो।³
(स) शिक्षाप्रद सूक्तियाँ :
राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीडा में चारो भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते है।⁴
अवश्य तुम जाओ-ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है, क्योंकि प्रिय की ओर जाते मन को तथा नीची भूमि की ओर बहते जल को कौन रोकने में समर्थ है।⁵ संकेत रुप से
1 चिन्तामिमा वहसि कि गजयूथनाथयूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म।
पिण्ड गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपद किल सम्पदो वा।।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 159, पृष्ठ सं० 127
2 कृते प्रतिकृतं कुर्या हिंसिते प्रतिहिंसितम्।
त्वया लुञ्चापिता पक्षा मया लुञ्चापित शिर ।
शुकसप्तति, श्लोक स० 331, पृष्ठ स० 277
3 प्रयोजनमविज्ञाय ज्ञात्वा चाथ मनीषिणा।
सहसैव न वक्तव्यमचिन्त्यो विधिनिर्णयः।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 331, पृष्ठ स० 277
4 रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टय च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽयनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 64, पृष्ठसं० 49
5 अवश्यमेव गन्तव्यं त्येत्थ मम निश्चय ।
मनोऽभीष्टे पयो निम्ने गच्छत्क. प्रतिवारयेत्।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 84, पृष्ठसं० 69
[ 184 ]
व्यक्त किए भाव को पशु भी ग्रहण कर लेता है। घोडे–हाथी संकेत द्वारा प्रेरित हो (मनुष्य अथवा भार को) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाते हैं पडित बिना कहे भाव को तर्क द्वारा जान लेता है क्योकि दूसरो के संकेतित अभिप्राय को जानना ही बुद्धि का फल है।¹
नीच व्यक्ति के ससर्ग से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। क्योंकि दुष्ट अत्यन्तप्रिय के विषय में भी अपना विकार ही दिखाता है।²
मन से विपरीत किए गये को जो सह सकता है और अर्थ त्याग कर सकता है वह मन के अनुकूल कार्य करता हुआ, कभी सज्जनों द्वारा निन्दित नहीं होता।³
(द) राजधर्म सम्बन्धी सूक्तियाँ :
ग्रन्थकार द्वारा "राजनियम" से सम्बन्धित सूक्तियाँ भी दर्शायी गयी हैं। यथा-राजा के प्रसन्न होने पर श्वेत छत्र, मनोरम अश्व, मदशाली गज प्राप्त होते हैं।⁴
राजा कोई साधारण व्यक्ति नही होता, यह अलौकिकरुप धारी होता है और तुम तो हे शत्रुओ को सन्ताप देने वाले! विक्रमादित्य (विक्रम में आदित्य से) यथार्थनामा हो।⁵
-
उदीरितोऽर्थ पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति नोदिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धय ।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 86, पृष्ठ स० 70. -
न नीचजनससर्गान्नरो भद्राणि पश्यति।
दर्शयत्येव विकृति सुप्रियेऽपि खलो यतः।।
शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 126, पृष्ठसं० 109 -
सोढु त्यक्तुं च यः शक्तो मनसा कृतमन्यथा।
मनोऽनुकूलता कुर्वन्न् स निन्यः सदा सताम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 114, पृष्ठस० 96 -
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः।
सदा मताश्च मातङ्गा प्रसन्ने सति भूयतौ।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 46, पृष्ठसं० 38 -
इन्द्रात्प्रभुत्व ज्वलनात्प्रताप क्रोध यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञ क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 49, पृष्ठ सं० 39.
[ 185 ]
राजदण्ड तथा विषय कार्य की सिद्धि में संशय होने पर जो सन्दिग्ध मन वाले राजाओं के संशय को दूर करने में समर्थ होते हैं वे प्रधानता (महत्ता) को प्राप्त होते हैं।¹ इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि ग्रंथकार को सामाजिक, राजनीतिक, शिक्षात्मक इत्यादि पक्षों का बहुत ही सूक्ष्मज्ञान था।
(य) <u>अन्य पद्यात्मक सूक्तियाँ :</u>
न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यन्न मानयन्ति ये।
जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।²।।
जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्य जन का सम्मान नहीं करते, वे (संसार में) निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।
व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृह्मात्मनः।
अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्तिभाजनम्।।³।।
इस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया (तदनुसार माता-पिता की सेवा कर) ससार में कीर्तिमान हुआ और मरने के बाद भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।
तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।
मृतो मृत इति ज्ञात्वा श्रणात्स्नेहो निवर्तते।।⁴
1 राजग्रहे समायाते विमये कार्यसंशये।
सन्दिग्धमनसां राज्ञा प्रधानाः संशयच्छिदः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 47, पृष्ठ सं० 38
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 5, पृष्ठ सं० 6
3 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 7, पृष्ठ सं० 7
[ 186 ]
जब तक मनुष्य जीता रहता है तभी तक उसके पिता तथा बन्धु हैं-इन सबका स्नेह तभी तक रहता है। मनुष्य मर गया तो मृत जानकर (पिता बन्धु आदि का) स्नेह तत्क्षण समाप्त हो जाता है।
सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरुत्वम्।
तं भुवनत्रय तिलकं जननी जनयति सुत विरलम्।।¹
जिसे समृद्धि में हर्ष, विपत्ति में विषाद, रण में कापुरुषता न हो, ऐसे त्रिभुवन श्रेष्ठ विरले पुत्र को माता पैदा करती है।
विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम्।
सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना।।²।।
विद्वानों, महत्वाकाङ्क्षियों, शिल्पियों, पवराक्रमशालियों, सेवावृत्ति के जानकार व्यक्तियों का, राजा के बिना आश्रय नहीं, राजा ही इनका आश्रय होता है।
ये जात्यादिमहोत्साहा नोपगच्छन्ति पार्थिवम्।
तेषामामरण भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम्।।³।।
उच्चकुल में उत्पन्न जो शक्तिशाली राजा के समीप नहीं जाता-उसे आश्रय नहीं बनाता, ऐसे व्यक्तियो का मरण पर्यन्त भिक्षा माँगना ही प्रायश्चिश्चत विहित है।
दृष्टिपूतं न्सेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मन पूतं समाचरेत्।।⁴।।
आगे का स्थल नेत्र से देखकर पैर रखना चाहिए, वस्त्र से छना शुद्ध जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र वचन बोलना चाहिए और मन को जो अभीष्ट हो वही करना चाहिए।
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 31, पृष्ठ स० 32
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 41, पृष्ठ स० 36
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 42, पृष्ठ स० 36
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 111, पृष्ठ सं० 93
[ 187 ]
सोपचाराणि वाक्यानि शत्रूणामिह लक्षयेत्।
अविचारितगीतार्था मृगा यान्ति पराभवम्।।$^1$।।
संसार में शत्रुओं के सत्कारपूर्वक वचनों को समझना चाहिए। गीत का प्रयोजन न सोचने के कारण ही मृग विपत्ति में फँस जाते है।
चन्दनं शुचिवस्त्रं च पानीयं शुचि शीतलम्।
सेव्यमानोऽपि मधुरः शुचिर्जयति नान्यथा।$^2$
ग्रीष्म ऋतु को सेवन किया जाता हुआ चन्दन, उज्जवल शीतल वस्त्र, पवित्र एवं शीतल जल, ओदन तथा चन्द्रमा ही जीतता है, अन्यथा वह जीता नहीं जा सकता।
नासाहसं समालम्ब्य नरो भद्राणि पश्यति।
साहसी सर्वकार्येषु लक्ष्मीभाजनमुत्तमम्।$^3$
बिना साहस का आश्रय लिए मनुष्य का कल्याण नहीं होता। जो सब कामों में साहसी होता है वही लक्ष्मी को प्राप्त कर पाता है।
भूमेश्च देशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमread बुद्धिमतः प्रणाशे।
भृत्यप्रणाशे मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा न भृत्याः।$^4$
देश की भूमि तथा गुणशाली एवं बुद्धिमान् सेवक के विनाश में (भूमि का विनाश ठीक है किन्तु ऐसे सेवक का नहीं क्योंकि) ऐसे भृत्य का विनाश होने पर राजा का ही विनाश हो जाता है और नष्ट हुई भूमि पुनः मिल सकती है किन्तु ऐसे भृत्यों का विनाश होने पर पुनः मिलना सम्भव नहीं।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 122, पृष्ठ स० 106
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 141, पृष्ठ स० 117
3 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 155, पृष्ठ स० 124
4 शुकसप्तति., श्लोक सं० 231, पृष्ठ स० 199
[ 188 ]
न वक्तव्यं ध्रुवं देवि पापं दृष्टं श्रुतं मया। कथापि खलु पापानामलम श्रेयसे यतः।।¹
मैने जो पाप देखा या सुना है, निश्चय रुप से उसे नहीं कहना चाहिए क्योंकि पापों की चर्चा भी निश्चय अहितकारक होती है।
तस्माद्यो भाषितु वेत्ति धर्मे चार्थे स्मरे तथा। कस्तं धर्षयितु शक्तो नरेषु कमलानने।।²
हे कमलमुखि! धर्म–अर्थ–काम के विषय में जो मनुष्य बोलना जानता है उसे पुरुषों में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है? अर्थात कोई नहीं।
मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः। तुण्डे तुण्डे नवा वाणी गेहे गेहे पतिव्रता।।³
प्रत्येक मस्तिष्क में भिन्न–भिन्न मति होती है, विभिन्न जलाशय में विभिन्न जल होता है, विभिन्न मुख मे विभिन्न वाणी होती है, विभिन्न घर में विभिन्न पतिव्रता होती है।
गजाः सन्ति हयाः सन्ति विचित्राः सन्ति सम्पदः। त्वदीये च मदीये च दुर्लभं भस्म याज्ञिकम्।।⁴
तुम्हारे तथा हमारे हाथी, घोड़े तथा विचित्र सम्पत्तियाँ हैं किन्तु यज्ञ का भस्म दुर्लभ होता है।
समयोचितमारम्भ कुरुते यस्तु कृत्यवित्। सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।।⁵।।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 237, पृष्ठ सं० 205
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 239, पृष्ठ स० 208
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 245, पृष्ठ सं० 213–214
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 249, पृष्ठ सं० 219–220
5 शुकसप्तति, श्लोक स० 278, पृष्ठ स० 237
[ 189 ]
इस प्रकार जो कृत्यवित् समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता सदा जीवित रहता है।
गच्छ देवि न कर्तव्यो विलम्बः पुण्यकर्मणि
यदि वेत्सि भये कर्तुं सुबुद्धिर्हंसराडिव।¹
देवि। यदि भय आ पड़ने पर सुबुद्धि हंसाधिपति की भाँति करना जानती हो तो जाओ, सत्कर्म में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।²
(श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसंद नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।
समुद्रवीचीव चलस्वभावा. सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्तरागाः।।
स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थ निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति।।³
समुद्र के तरङ्ग के समान चञ्चलस्वभाव वाली सायंकालीन बादल के समान क्षणिक अनुराग रखने वाली स्त्रियाँ स्वार्थ सिद्ध करने के बाद अर्थ-शून्य पुरुष को निचोडे हुए महावर की भाँति त्याग देती हैं।
एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणां ।
किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।।⁴
ये स्त्रियाँ पुरुषों के दयालु हृदय मे प्रवेश कर मोहती हैं मतवाला बना देती हैं, तिरस्कार करती है, फटकारती हैं, सुख देती हैं, विषाद उत्पन्न करती हैं, ये कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ क्या नहीं करती ?
1 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 310, पृष्ठ सं० 261
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 314, पृष्ठ सं० 263
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 329, पृष्ठ सं० 275
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 276.
[ 190 ]
तरुणी रमणी रतिरम्यतरा प्रमदा सुखदा च सदा समदा।
यदि सा सुभगा हृदये निहिता क्व जयः क्व जय. क्व जयः क्व जयः।¹
युवावस्था को प्राप्त, रमण करने योग्य, रति से भी अधिक रम्य, सुख देने वाली, सदा काम-मद से युक्त सुन्दरी प्रमदा यदि हृदय में बस गयी तो फिर जय कहाँ? (तब तो महान व्यक्ति की भी पराजय निश्चित है)।
(र) गद्यात्मक सूक्तियाँ :
निजशरीरस्य कतिचिद्दिनस्थायियौवनस्य पुराषान्तररमणाद् गृहाण फलम्।²
अन्य पुरुष के साथ रमण करती हुई अपने शरीर, जिसका यौवन कतिपय दिनों तक ही स्थिर रहेगा का फल प्राप्त कर ले।
युक्तमिदं कर्तव्यमेव परं दुष्करं निन्दितं च कुलस्त्रीणाम्।³
कुल स्त्रियों (उच्चकुल में उत्पन्न हुई) के लिये यह कर्म दुष्कर एवं निन्दित है।
व्यसनागमे, यदा कस्यचिदुपरि विपद् आपतति तदा दुर्जना. दुष्टाः नित्यम्।⁴
विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता)।
यो दान कुर्यात्स भवेत्सर्वसम्पदां स्थानम्।⁵
जो दान करता है वह सकल सम्पत्तियों का आगार होता है।
यतो राज्ञां दुष्टनिग्रह. शिष्टपालनं च स्वर्गाय।⁶
1 शुकसप्तति., श्लोक स० 338, पृष्ठ स० 280.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 7.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 8.
4 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 9.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 16.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 20.
[ 191 ]
दुष्टों का दमन करना तथा शिष्टजनो का पालन करना राजा का धर्म है—इससे उसे स्वर्ग मिलता है।
यतो बालकादपि हितं वाक्य ग्राह्यम्।¹
बालक से भी हितवाक्य ग्रहण करना चाहिए।
विद्वद्भिर्विपद्यप्युच्चैः स्थातव्यम्।²
विद्वानो को विपत्ति में भी प्रसन्न रहना चाहिये।
परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।³
राजा के बिना मनुष्य की कहीं पूंजा (सक्रिया, प्रतिष्ठा) नहीं होती।
यतो जनो धनमित्राः।⁴
धन के होने से ही उसके सब मित्र बनते हैं।
यतो हीनपुण्यो बुद्ध्या मुच्यते।⁵
जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है उसे बुद्धि छोड़ देती है।
पित्रार्जित द्रव्यं भोगिनं कं न करोति।⁶
पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता।
एकोऽपि त्वदीयः सुतः श्लाघ्यः।⁷
तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।
1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 22.
2 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 31.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 34.
4 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 43.
5 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 49.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 52.
7 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 120
[ 192 ]
कृतक मन्ये भयं योषिता।¹
स्त्रियो का भय कृत्रिम मानता हूँ।
दुर्लभोऽय बुधः। सुलभाः खलु नार्य।²
यह विद्वान दुर्लभ है, नारियाँ तो सुलभ होती हैं।
ततः स्त्रीणां वशगः को न विडम्बितः।³
स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता।
यतः सता सन्नतगात्रि सङ्गतं मनीषिभिः।⁴
सज्जनो के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।
य. कश्चिद्धितं वाक्यं शृणोति करोति च स शर्मभाग्भवति।⁵
जो कोई हितवाक्य सुनता है और तदनुसार कार्य करता है वह इस लोक तथा परलोक मे कल्याण का भागी होता है।
सत्यस्य वाचो वक्ता श्रोता च न लभ्यते।⁶
सत्य की बात कहने वाला और सुनने वाला दोनो नहीं मिलते।
(ल) ‘‘पद्यात्मक सूक्तियाँ ‘‘प्राकृत भाषा में’’ :
छिज्जउ सीसं अह होउ बन्धणं चअउ सव्वहा लच्छी।
पडिवण्णपालणे सुपुरिसाणं जं होउ तं होउ।¹
1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 233.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 234.
3 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 241
4 शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 265.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 272.
6 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 273.
[ 193 ]
सहायक पुस्तकों की सूची
शीर्षं छिद्यताम् अपभवतु बन्धनं चलतु सर्वथा लक्ष्मीः।
प्रतिपन्नपालने सुपुरुषाणां यद् भवतु तद् भवतु।
अर्थात् स्वीकार किये गये कार्य को पूरा करने में सत्पुरुषों का जो हो वह हो, चाहे शिर कट जाय, बन्धन में पड जायें अथवा लक्ष्मी चली जायें परन्तु स्वीकृत का पालन करते हैं।
पिअर विढत्तइ दव्वइ चुड्डिरि को ण करेइ।
सइँ बिढवइ सइँ भोजअइ विरला जणणि जणेइ।।$^२$पित्रार्जितं द्रव्य भोगिनं कं न करोति।
स्वयमर्जयति स्वयं भुङ्क्ते विरला जननी जनयति।।
पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता। जो स्वयं धन पैदा कर उसका स्वयम् उपभोग करता है ऐसे पुत्र को कोई विरली माता ही पैदा करती है।
महिलारत्ता पुरिसा छेआ वि ण संभरन्ति अप्पाणं
इअरे उण तरुणीणं पुरिसा सलिलं व हत्थगअं।।"(महिलारक्ता. पुरुषाश्छेका अपि न सम्भरन्ति आत्मानम्।
इतरे पुनस्तरुणीनां पुरुषा. सलिलमेव हस्तगतम्।।)
स्त्रियो में अनुरक्त नागरिक भी पुरुष अपने पर अधिकार नहीं रख पाते (स्त्री के वश में रहते हैं) और अन्य पुरुष स्त्रियों को हस्तगत जल ही होते हैं-जैसे अञ्जलिगत जल धीरे-धीरे बह जाता है उसी प्रकार वे स्त्रियों के हाथ में नहीं आते और स्वाधीन होते हैं।
1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 11, पृष्ठ स० 11.
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 67, पृष्ठ स० 52.
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 109, पृष्ठ स० 87-88.
[ 194 ]
अहरं करं कवोलं थणजुअल णाहिमण्डलं रमणं । इत्थिअजणसामण्णं हिअअं जं जस्स तं तस्स ।।$^1$
(अधरः करः कपोलः स्तनयुगलं नाभिमण्डल रमणम् । स्त्रीजनसामान्य हृदयं यद् यस्या तत् तस्याः ।।)
अधर, कर, कपोल, स्तनयुगल, नाभिमण्डल और जघन प्रदेश ये सब तो सभी स्त्रियों में समान होते हैं किन्तु हृदय जो है वह जिस किसी के ही होता है—हृदय से प्रेम करने वाली प्रेयसी कोई ही होती है।
अचला चलन्ति पलए मज्जाअं साअरा विलंघन्ति । गरुआ वि तह विकाले पडिवण्ण साध सिढिलेन्ति ।$^2$
(अचलाश्चलन्ति प्रलये मर्यादां सागरा विलङ्घन्ते गुरुका अपि तथा विकाले प्रतिपन्नसाधनं न शिथिलयन्ति ।।)
प्रलय मे पर्वत चलते हैं, सागर भी मर्यादा त्याग देते हैं, किन्तु विपत्ति में भी महान व्यक्ति स्वीकृत के पालन को शिथिल नहीं करते।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 153, पृष्ठ स० 122. 2 शुकसप्तति, श्लोक स० 165, पृष्ठ स० 130.
[ 195 ]
सहायक पुस्तकों की सूची
| क्रसं० | पुस्तक | लेखक व प्रकाशक |
|---|---|---|
| 1 | साहित्य दर्पण | विश्वनाथ, स० डा० निरूपण विद्यालंकार, साहित्य भंडार सुभाष बाजार, मेरठ |
| 2. | काव्यालंकार | भामह |
| 3. | काव्यालंकार | रूद्रट, व्याख्याकार श्री रामदेव शुक्ल 1966, चौखम्भा प्रकाशन |
| 4 | काव्यानुशासन | हेमचन्द्र 1964, श्री महावीर जैन विद्यालय, मुम्बई |
| 5 | काव्यादर्श | दण्डी |
| 6 | काव्यालंकार सूत्रवृत्ति | वामन व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर 1954, रामलालपुरी आत्माराम एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली – 6 |
| 7 | ध्वन्यालोक | चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी |
| 8. | काव्यप्रकाश | आचार्य मम्मट, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |
| 9. | नाट्य शास्त्र | भरत, चौखम्भा प्रकाशन |
| 10 | पुराण विमर्श | बलदेव उपाध्याय, द्वितीय संस्करण 1978, चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी |
| 11. | पुराण पर्यालोचनम् | डा० श्रीकृष्ण त्रिपाठी, प्रथम संस्करण 1976, चौखभा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी |
| 12. | भविष्य पुराण | खेमराज श्रीकृष्ण दास 1959, श्री वेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई |
| 13. | मार्कण्डेय पुराण- एकसांस्कृतिक अध्ययन | डा० वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रथम संस्करण 1961, हिन्दुस्तानी ऐकेडमी, इलाहाबाद |
| 14. | महाभारत | गीता प्रेस, गोरखपुर |
[ 196 ]