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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 208 में से

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पृष्ठ 188

"संस्करण एवं सूक्तियाँ"

शुकसप्तति के प्रधान रूप से दो संस्करण प्राप्त होते हैं -

(1) सामान्य संस्करण :

इसका सम्पादन स्मिट नामक विद्वान ने किया है किन्तु इसका काल अनिश्चित है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इसे संक्षिप्त वाचनिका माना है। प्रसिद्ध इतिहासकार कीथ के अनुसार सामान्य और अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत दोनों संस्करणों का सम्पादन स्मिट ने किया है। यद्यपि श्वेताम्बर जैन की रचना प्रतीत होती है।¹ इनमें से साधारण संस्करण प्राचीन नहीं है। यह बहुत कुछ परिष्कृत-संस्करण का एक संक्षिप्त रूपान्तर है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि इसमें कहानियों के वास्तविक अभिप्राय को अस्पष्ट ही छोड़ दिया गया है। ऐसा लगता है कि जैन ग्रन्थकार हेमचन्द्र किसी न किसी रूप में इससे परिचित थे।

इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तिपरक पद्यों का निवेश किया गया रहा होगा और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन-परक पद्य रहे होंगे।

इस संस्करण में मूलकथा के रूप में हरिदत्त नामक व्यापारी का मदनसेन नामक एक मूर्ख पुत्र की कथा प्राप्त होती है। जो शुक और मैना के उपदेश के कारण सदाचारी बन जाता है। यहाँ तक कि जब वह व्यापार हेतु यात्रा पर जाने लगता है तब अपनी पत्नी को उन दोनों पक्षियों के सुपुर्द कर जाता है। बुद्धिमान शुक प्रतिदिन एक कथा को सुनाकर उसकी पत्नी के चरित्र की रक्षा करता है।


¹ संस्कृत-साहित्य का इतिहास-ए बी कीथ।
भाषान्तरकार (डा० मङ्गलदेव शास्त्री) पृष्ठ-345

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