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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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(2) परिष्कृत संस्करण :

इस संस्करण का सम्पादन चिन्तामणि भट्ट नामक एक ब्राह्मण द्वारा किया गया है। इसमें चिन्तामणि भट्ट ने पञ्चतन्त्र के पूर्णभट्ट कृत (1999) जैन संस्करण का उपयोग किया था। ऐसा भी विचार प्रकट किया गया है कि बहुत सम्भव है कि कुलटा पत्नियो की कम से कम कुछ कहानियाँ शुकसप्तति के एक प्राचीनतर रुप से ली गयी थी। इसका समय लगभग 12 वीं शताब्दी के आस-पास है।

इस संस्करण मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता से यह सम्भावना प्रकट की जा सकती है कि यह संग्रह अपने मूलरुप में प्राकृत भाषा में रहा होगा।

इस संस्करण में 70 कहानियाँ प्राप्त होती हैं। जिसमें कथा के रुप में हरिदत्त व्यापारी के मूर्खपुत्र की कथा प्राप्त होती है जिसके विदेश जाने पर उसकी पत्नी को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिए शुक द्वारा प्रतिदिन एक कहानी सुनाकर उसके पति के आने तक पथभ्रष्ट होने से रोका जाता है।

(3) "सूक्तियाँ" :

सूक्ति का अर्थ है, सु+उक्ति अर्थात् सुन्दर कथन। काव्य शास्त्रकारों ने काव्य के प्रयोजनों के अन्तर्गत "व्यवहाविदे" "कान्दासम्मिततयोपदेशयुजे"। इन दो प्रयोजनों का कथन किया है।¹ यदि यह कहा जाय कि इन दोनों प्रयोजनों की पूर्ति काव्य में प्रयुक्त सूक्तियों के माध्यम से होती है तो गलत न होगा, क्योंकि सूक्तियाँ व्यवहारिक ज्ञान तो प्रदान करती ही हैं, साथ ही "कान्तावत्" उपदेश भी देती हैं।

किसी भी कथन को सारगर्भित रुप से ऐसे सुन्दर ढंग से कहना कि उसका प्रभाव चिरस्थायी हो सके, सूक्ति कहलाता है। प्राचीन काल से कवि नैतिक, धार्मिक,


¹ काव्य यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।
आचार्य मम्मट, काव्य प्रकाश, प्रथम उल्लास, कारिका 2, पृ० स० 10

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