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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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हे गजयूथनाथ! यूथ से वियोग होने के कारण मुँदे नेत्र वाले। इस प्रकार चिन्ता क्यो कर रहे हो? जो कुछ प्राप्त रहा है वह ग्रास ग्रहण करो और जल पियो। दुःख-सुख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।¹

जो कोई जैसा करे उसके साथ वैसा ही करो-कोई उपकार करता है तुम भी प्रत्युपकार करो, हिंसा करता है तुम प्रतिहिंसा करो। तुमने पंख नोच डाले, मैंने सिर को रोमहीन कर दिया अर्थात् जो कोई जैसा व्यवहार करे उसके साथ वैसा व्यवहार करो।²

बुद्धिमान बिना प्रयोजन समझे अथवा प्रयोजन समझ लेने पर सहसा कोई बात न कहे क्योंकि विधाता अथवा दैव न जाने क्या करना चाहता हो।³

(स) शिक्षाप्रद सूक्तियाँ :

राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीडा में चारो भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते है।⁴

अवश्य तुम जाओ-ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है, क्योंकि प्रिय की ओर जाते मन को तथा नीची भूमि की ओर बहते जल को कौन रोकने में समर्थ है।⁵ संकेत रुप से


1 चिन्तामिमा वहसि कि गजयूथनाथयूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म।
पिण्ड गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपद किल सम्पदो वा।।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 159, पृष्ठ सं० 127

2 कृते प्रतिकृतं कुर्या हिंसिते प्रतिहिंसितम्।
त्वया लुञ्चापिता पक्षा मया लुञ्चापित शिर ।
शुकसप्तति, श्लोक स० 331, पृष्ठ स० 277

3 प्रयोजनमविज्ञाय ज्ञात्वा चाथ मनीषिणा।
सहसैव न वक्तव्यमचिन्त्यो विधिनिर्णयः।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 331, पृष्ठ स० 277

4 रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टय च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽयनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 64, पृष्ठसं० 49

5 अवश्यमेव गन्तव्यं त्येत्थ मम निश्चय ।
मनोऽभीष्टे पयो निम्ने गच्छत्क. प्रतिवारयेत्।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 84, पृष्ठसं० 69

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