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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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(ब) उपदेशात्मक सूक्तियाँ :

भूख से दुर्बल, बाँस की डलिया मे शरीर को सपिडित किये स्थित, भूख से म्लानेन्द्रिय सर्प के मुख मे रात के समय मूषक उसमें बिल बनाकर स्वयं चला गया। अतः तुम सब धैर्य रक्खो, मनुष्य की समृद्धि और विपत्ति, जीवन और मरण का कारण दैव है।¹

मनुष्य के पास आठ गुण कहे गये हैं इनके होने पर ही वह गुणी माना जाता है। वे ये हैं (1) तरुणी स्त्रियों के साथ मधुर व्यवहार (2) शिष्ट समुदाय के साथ अनुकूल व्यवहार, (3) शत्रुओं पर पराक्रम दिखाना, (4) पूज्य एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों से नम्रता, (5) सज्जनों के साथ धर्मिष्ठता, (6) रहस्य जानने वालों के साथ उनके मनोनुकूल आचरण करना (7) अभिमानियों के साथ बहुविध मान करना (8) शठों के साथ शठता का व्यवहार करना चाहिये।²

जो लोग कपटी जनों के साथ कपट पूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।³

दैव के प्रतिकूल होने पर साधनों का आधिक्य भी निष्फल होता है। अस्त को प्राप्त होने वाले सूर्य को उसकी सहस्र किरणें भी अवलम्ब नहीं दे सकीं।⁴


1 सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभा ।।
— शुकसप्तति., श्लोक स० 325, पृष्ठस० 274

2 माधुर्यं प्रमदाजने सुललितं दाक्षिण्यमार्ये जने शौर्यं शत्रुपु मार्दवं धर्मिष्ठता साधुषु।
मर्मज्ञेष्वनुवर्तनं बहुविध मान जने गर्विते शाठयं पापजने नरस्य कथिता. पर्यन्तमष्टौ गुणा.।।
— शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 119, पृष्ठसं० 104

3 व्रजन्ति ते मूढधिय. पराभव भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः।।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषव ।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 123, पृष्ठ सं० 106

4 प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ विफलत्वमेति बहुसाधनता।
अवलम्बनाय दिनभर्तुरमूर्न्न पतिष्यत. करसहस्रमपि।।
— शुकसप्तति. श्लोक स० 143, पृष्ठ सं० 118

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