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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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नदीनां नखिनाञ्चैव शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ।।¹

इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि नदियों, नखधारी, सिंहादि, शृंगधारी, भेडा आदि पशुओं, शस्त्रधारी पुरूषो, स्त्रियों एवं राजाओ का विश्वास नहीं करना चाहिए।

भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः।
दुःखोपसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव।।²

इस अनुष्टुप छन्द मे यह दर्शाया गया है कि भोगी, कञ्चुकावृत, क्रूर, कुटिलगामी, राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय होते हैं।

आरोहन्ति शनैर्भृत्या धुन्वन्तमपि पार्थिवम्।
कोपप्रसादवस्तूनां विचिन्वन्ति समीपपगाः।।³

इन अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि जिस प्रकार से वृक्ष पर चढ़ने वाला व्यक्ति गिरने का भय त्यागकर धीरे-धीरे उस पर चढ़ जाता है और यथाभाग्य मधुर फलो का चयन करता है उसी प्रकार अप्रसन्न राजा के पास अपनी पहुँच बनाने वाले व्यक्ति यथाभाग्य प्रसादफल प्राप्त करते हैं।

रोगैर्ग्रहैर्नृपर्यस्तो या न वेत्ति जडक्रियः।
मध्यमन्त्रमुपायं च सोऽवश्यं तात न स्थिरः ।।⁴

उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि जो व्यक्ति आलसी एवं दीर्घसूत्री रोगग्रस्त होने पर युक्ताहार-विहार, ग्रहग्रस्त होने पर मन्त्र, और नृपग्रस्त होने पर साम-दानादि उपाय नही करता वह नष्ट हो जाता है।


1 शु० स०, श्लोक स० 34, पृष्ठ स० 33
2 शु० स०, श्लोक स० 35, पृष्ठ स० 33
3 शु० स०, श्लोक स० 39, पृष्ठ स० 35
4 शु० स०, श्लोक स० 43, पृष्ठ स० 37

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