शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमा वृकोदर पादेन एकादशचमूपतिम्।
पञ्चानामपि यो भर्ता नासाप्रकृतिमानवी।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पाँच आदमियों का पोषण करने वाला भी महान होता है दुर्योधन के पास तो ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी।।
प्रदोषसमयेऽन्यस्मिन्कामिनी काममोहिता।
विनयेन शुकं प्राह गच्छामि यदि मन्यसे।।²
विरञ्चिरपि कामार्तःस्वसुतामभिलाषुकः।
दृश्यतेऽद्यापि वियति हारिणीं तनुमाश्रितः।।³
यह अनुष्टुप छन्द यह उपदेश देता है कि कामपीडित व्यक्ति किसी में भी साभिलाष हो सकता है इससे उसे पाप या कलङ्क नहीं लगता।
तयैवं बोधितो मूर्खः स यावद्रमते न ताम्।
फूत्कृतं मुषितास्मीति त्रायतां त्रायतामहो।।⁴
व्रज देवि सुखं भुङ्क्ष्व अर्धभुक्ते पतौ यथा।
कृत राजिकया चित्तमुत्तरं धूलिसयुतम्।।⁵
युक्तमेव विशालाक्षि पर रन्तुं यदृच्छया।
यद्यायाते पतौ वेत्सि धनश्रीरिव भाषितुम।।⁶
न स्नाति न च सा भुङ्क्ते न जल्पति सखीसमम्।
निरस्ताशेषसस्कारा स्वदेहेऽपि पराङ्मुखी।।⁷
मलयानिलमारूढ कोकिलालापडिण्डिमः।
1 शु० स०, श्लोक स० 50, पृष्ठ स० 40
2 शु० स०, श्लोक सं० 83, पृष्ठ स० 69
3 शु० स०, श्लोक स० 96, पृष्ठ स० 76
4 शु० स०, श्लोक स० 98, पृष्ठ स० 76
5 शु० स०, श्लोक स० 100, पृष्ठ स० 80
6 शु० स०, श्लोक स० 101, पृष्ठ स० 82
7 शु० स०, श्लोक स० 102 , पृष्ठ स० 83
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