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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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गिरता है उस पाप से देवशर्मा की तरह तुम्हारा भी पतन सम्भाव्य है। कहीं-कहीं पर यह पक्षी रूपधारी गन्धर्व थे ऐसी चर्चा भी प्राप्त होती है¹ बुद्धिमान शुक के उपदेश से कुमार्ग-गामी वह मदन विनोद सदाचार के मार्ग का अवलम्बन कर लेता है और अत्यन्त विनयशील बन जाता है। इसके बाद वह मदनविनोद माता-पिता की आज्ञा से एवं पत्नी की राय से व्यापार की दृष्टि से देशान्तर को चला गया। इसके अनन्तर पति विरह से दुःखी मदनविनोद की पत्नी कुछ समय निर्वाह करती है और व्यभिचारिणी अपनी सखियों के द्वारा प्रेरित होकर परपुरुष के प्रति अभिलाषवती हो जाती है, एव रमण के लिए श्रृङ्गार कर ज्योंही घर से निकलना चाहती है त्यों ही सारिका पक्षी ने उसे रोका और फटकारा तब उसने (प्रभावती) गला मरोड़ कर सारिका को विनष्ट करना चाहा, तत्काल वह उड़कर दूर चली गयी। इसके अनन्तर कुछ क्षण रूककर अपने इष्ट देवता को स्मरण कर एवं ताम्बूल आदि ग्रहण कर ज्यों ही चलती है उसी समय तथा कथित वह शुक बोल पड़ा कि आपका कार्य सिद्ध हो, कहाँ जा रही है? इत्यादि वाक्य से पूछा। शुक वचन को शकुन मानकर मुस्कराते हुए उसने कहा कि, किसी परपुरूष के पास जा रही हूँ। इस बात को सुनकर शुक उसके कार्य का अनुमोदन करते हुए कहता है कि—‘तुम परपुरूष के संगति के आनन्द का अनुभव करो यह तो ठीक है किन्तु यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, निन्दित है एवं कुल स्त्रियों के लिए बाधित है।’ प्रतिकूल एवं सङ्कट का अवसर पड़ने पर उससे बचने के लिए तुम्हारे पास बुद्धि होनी चाहिए। तभी जाओ क्योंकि-विपत्ति पड़ जाने पर दुष्ट लोग केवल तमाशा ही देखते हैं और अपमानित करते हैं। क्योकि एक मास तक भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लड़के के केश पकड़कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाशा ही देखती रह गयी।² यह सुनकर अपनी व्यभिचारिणी सखियों के साथ उस


1 ए०बी० कीथ–अनुवादित मङ्गलदेवशास्त्री, पृष्ठ–361
2 कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिकपुत्रकचग्रहे।।

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