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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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प्रभावती ने शुक का बहुत समादर किया और घबराकर उपर्युक्त आख्यान सुनने के लिए प्रार्थना किया।

इसके अनन्तर वह शुक निरन्तर मनोरञ्जक कहानी सुनाता है और बीच-बीच मे वैसी-वैसी विपत्ति आने पर कैसा आचरण करना चाहिए इस प्रकार का प्रश्न करता है और समाधान में 70 कहानियाँ सुनाते हुए उसके शील की रक्षा करता है और कुछ ही दिनों में उसका पति परदेश से मदन विनोद आ जाता है और दोनों (पति-पत्नी) सुखपूर्वक अपने जीवन का समय व्यतीत करते हैं।

शुकसप्तप्ति की यह आधारभूत कथा अन्य 70 कथाओ को जन्म देती है। जो प्रभावती के चरित्र की रक्षा करने में पर्याप्त सक्षम है।

(3) शुकसप्तति की कथाओं का परिचय :

कथा- 1
"देशशर्मा की कथा"

शुकसप्तति की प्रथम कथा मदनविनोद को सद्ज्ञान देने हेतु शुक द्वारा कही गयी है-

पञ्चपुर नगर मे सत्यशर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धर्मशीला और पुत्र देवशर्मा के साथ रहता था। उस (पुत्र) ने विद्याध्ययन के बाद पिता से छिपाकर अन्य देश में गङ्गा के तट पर तप किया।

एक दिन वह तपस्वी गङ्गा के तट पर जप कर रहा था कि उसी समय एक उड़ती बगुली ने उसके शरीर पर मलत्याग कर दिया। क्रोध से रक्तनेत्र उस तपस्वी ने ज्यों ही ऊपर देखा त्यों ही अपनी क्रोधाग्नि से भस्म हुई बगुली को भूमि पर गिरी देखकर (बगुली को भस्म कर) वह नारायण नामक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने गया। उसकी पत्नी अपने पति के सेवा में लगी थी उसके (स्त्री) विलम्ब करने से वह क्रुद्ध


शुकसप्ततिः श्लोक सं० 8 पृ० सं० १

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