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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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तब शशिप्रभा ने उसके गले से लिपट कर रोकर कहा- 'कल्याणि! मुझे भी पर पुरूष से मिलाओ।'

तब यशोदेवी ने उसे सान्त्वना देकर पति की जानकारी में उसे अपने घर ले जाकर अपने पुत्र से मिलाया पति ने भी उसे सखी समझकर जाने से नहीं रोका।

हे कामिनि! यशोदेवी ने इस प्रकार राजशेखर और उसकी पत्नी को धोखा देकर अपनी महती बुद्धि से अपना कार्य पूरा कर लिया। अतैव यदि तुम्हारे पास ऐसी बुद्धि हो तो परपुरूष के पास जाओ अन्यथा नहीं।

कथा-3

"राजा सुदर्शन की कथा";

विशाला नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। वहीं पर विमल नाम का एक बनिया था उसकी दो पत्नियों को सुन्दर रूप सम्पन्न देखकर कुटिल नामक धूर्त ने उन्हें प्राप्त करने के लिए अम्बिका देवी की आराधना कर विमल का रूप माँगा। उसका आकार प्रकार पाकर 'विमल' के बाहर जाने पर उसके घर जाकर वह धूर्त अपना आधिपत्य जमा लिया। उसने पुरस्कार रूप में धन प्रदान कर समस्त भृत्य वर्ग को अपने अधीन कर लिया। वह विमल की दोनों पत्नियों को अत्यन्त सम्मान दान आदि से संतुष्ट कर उनका सम्भोग करता रहा।

कुछ समय पश्चात् वास्तविक विमल भी द्वार पर आया तो कुटिल की आज्ञा से द्वारपाल ने उसे भीतर प्रविष्ट होने से रोक दिया, तब वह जोर से चिल्लाने लगा कि 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया।' इस प्रकार चिल्लाते हुए उसे देखकर कौतुक वश उसके कुल गोत्र वालों एवं बनियों का समुदाय एकत्र हो, नगरपालों एवं मुख्यमन्त्री के सामने चिल्लाने लगा- राजन्! 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया'।

तब राजा ने उस धूर्त को देखने के लिए अपने आदमी भेजे, उस धूर्त ने उन्हें भी धन देकर अपने अनुकूल कर लिया। धन प्राप्त कर राजा के आदमी कहने लगे, स्वामी! विमल तो घर में है, यह द्वार पर स्थित व्यक्ति ही महान धूर्त है।

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