शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब राजा को उपाय सूझा। उसने विमल की दोनों पत्नियों को पृथक-पृथक कर पूछा। तुम दोनों को विवाह के समय पति ने कौन आभूषण और धन दिया था। विवाह के पश्चात् क्या बातचीत हुई थी? प्रथम सहवास के समय पति के साथ तुम्हारी क्या बातचीत हुई थी? तुम दोनो की माता-पिता कौन है? क्या कुल और जाति है? इस प्रकार पूछने पर दोनों ने जो पाया था, जो-जो बातें हुई थी, जिस प्रकार प्रथम सहवास के समय शयन किया था सबकुछ बता दिया। इसके बाद राजा ने वही बाते परस्पर विवाद करते उन दोनों पुरुषों से पूछा तो रूक्मणी एवं सुन्दरी नाम्नी दोनों भार्याओ का संवाद जो कहता है वही सच है। दूसरा धूर्त है, राजा ने उसे निकाल दिया। सच्चा विमल पत्नी समेत राजा से सत्कृत हुआ और अपने घर गया। यह कथा सुनकर प्रभावती सो गयी।
कथा-4
"विषकन्या-विवाह की कथा"
सोमप्रभ नामक ब्राह्मणों की एक बस्ती थी, वहाँ सोमशर्मा नामक एक विद्वान, धार्मिक ब्राह्मण था। उसकी पुत्री विषकन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु भय के कारण उससे कोई विवाह नहीं करता था। तब सोमशर्मा वर की तलाश में पृथ्वी पर घूमते हुए जनस्थान नामक ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँचा। वहाँ गोविन्द नामक मूर्ख एवं निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसे उसने कन्या दे दी। उसने रोकते हुए सुहृज्जनों की भी अवज्ञाकर रूपलावण्यवती मोहिनी विषकन्या से विवाह कर लिया। वह काम-कला प्रवीण थी एवं गोविन्द मूर्ख एवं अल्पवयस्क था। तब वह अपने रूप लावण्य एवं यौवन पर शोक करने लगी। कहा गया है कि-कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ़ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन- ये तीनों दुःखदायी होते हैं।$^1$
1 अविदग्धः पतिः स्त्रीणां, प्रौढाना नायकोऽगुणी
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्
शुक्सप्ततिः श्लोक सं० 23, पृष्ठ सं०- 24
[ 58 ]