शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगई। वह पुरूष घर जलता देखकर मन्दिर छोड़कर आग देखने चला गया जिससे वह उपभोग नहीं कर सकी। अतः उसका न घर रहा न बाहर का आनन्द ही।
कथा-9
"पुष्पहास और रानी की कथा"
शुक ने कहा देवि। बालपण्डिता ने राजा से कहा यदि मेरा कहा हुआ आप नहीं समझ है तो सुनिये– सब मन्त्रियों में श्रेष्ठ पुष्पहास मंत्री बिना अपराध बन्दी है। वह क्यो बन्दी बनाया गया है?
राजा बोला– यह पुष्पहास जैसा नाम से है वैसा गुण से भी है। जब यह मेरी सभा में हँसता है तो इसके मुख में पुष्पों की झडी लग जाती है। यह बात अन्य राज्य मण्डलों में फैल गयी। तब उन राजाओं ने अपने आदमी इस कुतूहल की सत्यता का पता लगाने के लिए भेजे। उनके आने पर वह नहीं हँसा और पुष्पों का ढेर भी नहीं लगा। इस कारण उसे कारागार में बन्द कर दिया गया है।
तब बालपण्डिता ने कहा– वह मन्त्री ही अपने हँसने और मत्स्यों के हँसने का कारण कहेगा तब राजा ने पुष्पहास मंत्री को वस्त्रादि देकर मन्त्रिपद पर स्थापित कर मत्स्यहास का कारण पूछा।
मन्त्री बोला राजन्! मेरी पत्नी अन्य पुरूष में रत् हो गयी ऐसा जान लेने के कारण में नहीं मैं नहीं हँसा था।
राजा ने ऐसा सुनकर फूलों के गुच्छों से रानी को प्रताडित कर उसके मुख की ओर देखा। उस प्रहार से उसने मिथ्या मूर्छा का अभिनय किया। पुष्पहास उस रानी को देखकर हँसने लगा और पुष्पों का ढेर लग गया। राजा ने मन्त्री से कहा– हमारे दुःख मे क्यों हँस रहे हो? मन्त्री ने कहा–राजन्! तुम्हारी रानी रात में सेवक जनों द्वारा छड़ी से आहत होकर भी मूर्छित नहीं होती, इस समय मूर्छित हो गयी– यही
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