शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहँसने का कारण है। इस प्रकार राजा ने सभा विसर्जित कर दी और उस रानी को महल से निकाल दिया।
कथा-10
"शृङ्गारवती की कथा"
राजपुर नामक स्थान पर देवसाख्य नामक एक गृहपति था, उसके शृङ्गारवती और सुभगा नाम की दो पत्नियाँ थी।
वे दोनों परपुरुष मे आसक्त और एक दूसरे की रक्षा के उपाय में तत्पर रहती थी।
एक दिन जब सुभगा उपपति के साथ घर के भीतर विद्यमान थी तभी कहीं बाहर से पति कटसरैया हाथ में लिए गृहद्वार पर आ गया।
तभी तुरन्त शृङ्गारवती ने उस सुभगा को नंगीकर घर से बाहर निकाल दिया। पति ने 'यह क्या है?' पूछा तो शृङ्गारवती ने अत्यन्त, आदर से कहा– देवी जी के उपवन से जो तुमने ये कटसरैया ग्रहण किये उसी के बाद से ही देवी जी से यह आविष्ट हो गयी, अतः जाकर यथा स्थान इसे रख आओ जिससे यह स्वस्थ्य हो जाय।
जब तक वह मूढ ऐसा करने बाहर गया तब तक उसने उपपति को घर से निकाल दिया।
कथा-11
(रम्भिका और ब्राह्मण की कथा)
दाभिल नामक गाँव में विलोचन नाम का मुखिया रहता था। उसकी पत्नी रम्भिका को परपुरुष बहुत प्रिय थे परन्तु उसके पति के भय से कोई उसका भोग नहीं करता था।
तब वह जल के बहाने से घड़ा लेकर बावली पर गयी। वहाँ उसने एक सुन्दर ब्राह्मणपुत्र को देखकर रतिक्रीडा के लिए नेत्र संकेत से कहा और उसने कहा– तुम मेरे पीछे लगे मेरे घर चलो तथा मेरे पति को नमस्कार करना और सब मैं कर लूँगी।
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