शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार समय बीतता रहा। बसन्तोत्सव के अवसर पर उसके मनोभाव को समझने वाली सखी ने कहा- भामिनि! रूप और यौवन व्यर्थ मत करो।
ऐसा कहने पर धनश्री बोली-मैं विलम्ब नहीं सह सकती। जो कुछ तुमसे हो सकता है, वह शीघ्र करो। तब उसने उसे परपुरूष से मिलाया। उस पुरुष ने उसे अपने मे आसक्त जानकर उसके सिर की वेणी काट ली। तत्काल पति विदेश से आ गया अपने को बचाने के लिए उसने पति से कहा नाथ! तब तक तुम घर के द्वार पर ठहर जाओ, जब तक मैं सब ठीक तैयार कर लूँ।
पति के ऐसा करने पर उस बीच में जाकर देवी का पूजन कर (देवी के) सामने वेणी रख दी और मैदे की विशेष प्रकार की रोटियों के सहित बाहर निकलकर पति को घर के भीतर देवी के सामने ले जाकर उसने कहा- नाथ! घर के इष्ट देवता की पूजा करो।
पूजन करते हुए उसने वेणी देखकर कहा- यह क्या है? उसने कहा- मैंने देवी से प्रार्थना की थी जब मेरा पति आयेगा तब हे स्वामिनी। मैं तुम्हारे आगे वेणी काटूँगी।
उस मुग्ध मूढ पति ने देवी को नमस्कार कर उस (धनश्री) का अत्यन्त सम्मान किया।
कथा- 15
(श्रिया देवी और सुबुद्धि की कथा)
शालिपुर नामक नगर में शालिग बनिया रहता था। उसकी पत्नी का नाम जयिका था और पुत्र का नाम गुणाकर था। उसकी पत्नी श्रिया देवी सुबुद्धि नामक दूसरे बनिये के साथ रमण करती थी। चारों तरफ बात फैल जाने पर भी उसका पति इस अफवाह पर विश्वास नहीं करता था।
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