शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक दिन उस परपुरुष को सोते हुए उसके ससुर ने देखा और उसके पैर से नुपुर उतार लिया और उसे पता न चला। तब उसने उपपति को भेजकर पति को वहाँ लाकर उसके साथ, सोयी और निद्रा के बीच में पति को उठाकर कहा- तुम्हारे पिता ने हमारे पैर से नूपुर उतार लिया। उसने कहा प्रातः पिता से लेकर तुम्हें दे दूँगा। पिता ने कहा- परपुरुष के साथ सोयी देखकर मैंने नूपुर ले लिया था।
उस (श्रिया देवी) ने कहा- मैं तुम्हारे पुत्र के साथ सोयी थी यदि आपको विश्वास नहीं है तो गाँव में उत्तर की ओर यक्ष है जो कोई सच्चा होता है वही उसकी जाँघों की बीच से निकल पाता है।
ऐसा करने के लिए ससुर से स्वीकार कर लेने पर वह उपपति के घर जाकर बोली-मै प्रातः यक्ष की जाँघों के बीच से निकलूँगी तुम वहाँ पागल बनकर मेरा कण्ठ पकड़ लेना।
प्रातः यक्ष पूजा के लिए आती हुई उसके कण्ठ में पागल बने उपपति ने अपनी दोनों भुजाएँ डाल दीं।
तब पुनः स्नान कर यक्ष के पास आकर सब लोगों को सुनाकर कहा-हे भगवान यक्ष! मेरे पति तथा इस पागल के अतिरिक्त यदि और किसी पुरूष ने मेरा स्पर्श किया हो तो तुम्हारी जाँघों के बीच से मेरा निष्क्रमण न हो सके। ऐसा कहकर सबके सामने जाँघों के मध्य प्रवेश कर निकल गयी और लोगों के द्वारा सती मानकर सम्मानित की गयी।
कथा-16
"मुग्धिका की कथा"
विदिशा नामक नगरी में जनवल्लभ वणिक् रहता था। उसकी पत्नी मुग्धिका अत्यन्त चञ्चल और व्यभिचारिणी थी। जब उसने पति को कलंकित कर दिया तब पति ने विरादरी के लोगों से बताया कि वह परपुरुषगामिनी है।
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