शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार कहने पर बैल पर स्थित धन ग्रहण करने की इच्छा से उस कुटनी ने उसे ठहरा लिया। वह भी बैल को बाँधकर विलासिनी के पास प्रेमासक्त होकर रात मे वहीं रह गया और सुबह सबसे पहले उठकर सोने की जंजीर लेकर चला गया।
उसके जाने के बाद एक दासी उठी और बैल को न देखकर कुटनी से बोली-आर्ये! यह क्या ?
तब विलासिनी के पास से गया हुआ जानकर वह मौनधारण कर ली और एक दिन जुए में हारा गुणाढ्य वेश्या द्वारा पकडा गया।
तब उसने उपाय सोचा-'शम्बली-शम्बली' (कुटनी) ऐसा कहने लगा।
तब राजभय से उसने गुणाढ्य को छोड दिया। चलती हुई उस कुटनी के पीछे लगा गुणाढ्य 'शम्बली' यह शब्द कहता चला और एकान्त में उसे ले जाकर प्रसन्न कर हाथ से सोने का आभूषण निकालकर दिया।
कथा-18
''सर्षपचौर की कथा''
शुभस्थान नगर में दरिद्र बनिया रहता था। एक दिन उसके घर में चोर घुसा जब उसे कुछ नहीं मिला तो वह सरसों लेकर निकला और सिपाहियों ने उसे घेर लिया। गले में सरसों बाँधे हुए वह राजा के पास लाया गया और पूछे जाने पर कहता है- अहो सरसों में कुछ नहीं रह गया।
तब राजा ने सभा में बुलाकार कहा- तुम्हारी बात का अभिप्राय समझ में नही आ रहा है। तब उसने कहा-
बलि के वर्ष दिन पर लोग अपनी रक्षा के लिए हाथ में सरसों के दानें बाँधते हैं, वह आज से निश्चय ही (अप्रमाण) असत्य होगा।
क्योंकि मैं गले में इतनी सरसों बाँधे भी बन्दी हूँ। यह सुनकर राजा हँसते हुए उसे छोड़ दिया।
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