भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

कथा-19

‘‘सन्तिका और स्वच्छन्दा की कथा’’

करहड नगर में गुणप्रिय नामक राजा था। वहीं पर सोढाक नाम का सेठ था। उसकी पत्नी सन्तिका अत्यन्त पतिव्रता थी। वहीं एक दूसरा बनिया भी था। उसकी भार्या स्वच्छन्दा व्यभिचारिणी थी। वह सोढाक को नित्य चाहती परन्तु वह उसकी इच्छा पूर्ति नहीं करता। एक दिन वह (सोढाक) मनोरथ नामक यक्ष को प्रणाम करने गया। तभी स्वच्छन्दा भी उसका अनुसरण करती हुई हावभावादि से उसे अनुकूल बनाकर उसके साथ रति क्रीडा की।

उन दोनों (सोढाक , स्वच्छन्दा ) को पकडने के लिए राजपुरुष ने मन्दिर घेर लिया। सन्तिका ने पति की निर्दोषता को बचाने के लिए रात को जोर-जोर से मृदङ्ग बजवाती यक्ष मन्दिर के पास गयी और पहरेदारों से कहा-मैं आज दिन-भर यक्ष परायण थी, अतः यक्ष का दर्शन एकान्त में करके ही भोजन ग्रहण करूँगी कुछ धन लेकर मुझे अन्दर जाने दिया जाय।

उन लोगों ने वैसा ही किया। तब उसने स्वच्छन्दा को अपना वेष धारण कराकर बाहर निकाल दिया और स्वयं भीतर रह गयी। प्रातः सोढाक को अपनी पत्नी सहित देखकर पहरेदार अत्यन्त लज्जित हुए।

कथा-20

‘‘केलिका की कथा’’

साभ्रमती नदी के किनारे शङ्खपुर नगर में सूर नामक एक धनी किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम केलिका था जो अत्यन्त कुटिल तथा कुलटा थी। वह नदी के दूसरे तट पर बसे सिद्धपुर में रहने वाले ब्राह्मण के साथ भोग-विलास करती थी। जब पति को यह वृतान्त ज्ञात हुआ तो वह उसके चरित्र का पता लगाने के लिए वहाँ गया। लेकिन नदी के किनारे केलिका ने पति को देख लिया।

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