भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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अतः उसने घड़े को जिसके सहारे वह नदी पार करती थी, पानी से भरकर पडोसिनी के घर के अन्दर देवी को सजाकर जल से स्नान कराकर पहले से ही संकेत द्वारा दिखाई गई दूती को लक्ष्य कर बोली-स्वामिनी! आप ही ने तो कहा था कि तुम सिद्धेश्वरी को स्नान नहीं कराओगी तो पाँच दिन के अन्दर तुम्हारे पति की मृत्यु हो जायेगी।

यह सुनकर पति प्रसन्न हुआ और अलक्षित ही चला गया।

कथा-21

"मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा"

प्रतिष्ठान नगर में हेमप्रभ नामक राजा और श्रुतशील मन्त्री रहता था यशोधरा नामक सेठ की पत्नी मोहिनी और उन दोनों की पुत्री मन्दोदरी थी। मन्दोदरी कान्तिपुर से आये श्रीवत्सनामक वणिक् को दी गयी। मन्दोदरी प्रतिदिन कुटनी द्वारा मिलाये गये राजपुत्र का उपभोग करती थी तथा गर्भिणी होने पर उसने राजा के प्रिय मयूर को मरवा कर खा लिया। राजा मयूर के आने पर ही भोजन करता ऐसा नियम था। उस दिन भोजन वेला पर मयूर के न मिलने पर डुग्गी पिट जाने पर कुटनी ने बताया कि किसी गर्भवती ने दोहद के कारण उसे खा लिया है।

तब कुटनी मन्दोदरी के घर गयी और उसने सारा मयूर वृतान्त बता दिया। विश्वासघातिनी कुटनी ने सब कुछ जानकर मन्त्री को और मन्त्री ने राजा को बताया। राजा ने कहा वणिक् वधू को बिना देखे उस पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।

तब कुटनी मन्त्री को सन्दूक में रखकर उस मन्दोदरी के घर छोड़ आयी और कुछ समय बाद उसके घर जाकर उससे बोली-मुग्धे तुमने बहुत अच्छा किया जो मयूर का भक्षण कर लिया।

उसने सारा वृतान्त वणिक् वधू से फिर से पूछा-जिससे कि पेटी में स्थित मन्त्री सभी बात को सुन सके।

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