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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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ज्यों ही कुटनी ने हाथ से सन्दूक को पीटा त्यों ही वणिक् पुत्री मन्दोदरी ने वितर्क पूर्वक कहा-मातः जब तक मैंने ऐसा किया तब तक रात बीत चुकी थी और मैं जग गयी। इसके आगे स्वप्न मे और कुछ नहीं देखा। यदि कोई इस विषय में मेरा प्रमाण हो तो बताएँ।

ऐसा सुनकर मन्त्री सन्दूक का ढक्कन खोलकर बहार निकला और मन्दोदरी का सम्मान किया और उस कुटनी को निर्वासित कर दिया।

कथा-22

"माढुक की कथा"

दम्भिला गाँव में सोढाक नाम का किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम माढुका था। जब वह अपने पति के लिए प्रतिदिन खेत में भात लेकर जाती थी उसी बीच मार्ग में बाहर एक सूरपाल नामक मनुष्य उसका उपभोग करता था। एक दिन जब वह भात अलग रखकर उस सूरपाल के साथ स्थित थी तभी मूलदेव नामक धूर्त ने उस भात के भीतर ऊँट की शक्ल का मदिरा पात्र रख दिया। जब पति ने ऊँट के भीतर उष्ट्रिका देखा तो पूछा यह क्या है? तब उसने अत्यन्त चतुराई से कहा स्वामी! आज रात मैने स्वप्न में देखा कि एक ऊँटनी तुम्हें खा गयी। अतः विघ्न को दूर करने के लिए यह विपरीत किया। यह सनुकर अनुरक्त उसने उष्ट्रिका भी खा लिया।

कथा-23

"धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा"

पद्मावती नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। उसकी पत्नी का नाम शृङ्गारसुन्दरी था। उसके साथ उस राजा के क्रीडा करते-करते ग्रीष्मकाल आ गया ऐसे ग्रीष्मकाल में चन्द्रनामक वणिक् अपनी पत्नी सहित घर की छत पर आरूढ़ हुआ। इस प्रकार सन्ध्याकाल में वह वणिक् उस प्रभावती के साथ क्रीडा किया करता था।

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