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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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तब उसने कहा-मनोरम नामक गाँव में सरस्वती नदी के किनारे कुएँ में बिना समय के फला हुआ, तैरता हुआ, आम का फल मैंने देखा।

सुबुद्धि ने कहा-यदि यह बात सत्य है तो हमारे घर दोनों हाथों से जो कुछ तुम ग्रहण कर सको ग्रहण करो और मिथ्या होने पर तुम्हारे घर से मैं ग्रहण करूँ।

ऐसी शर्त लग जाने पर कुबुद्धि ने रात में कुएँ से उस फल को निकाल लिया जिस कारण से सुबुद्धि हार गया और कुबुद्धि ने उसकी भार्या के ग्रहण की कामना से शर्त पूरी करने को कहने लगा।

सुबुद्धि ने उस दुष्ट के दुर्विचार को जानकर अपने घर की सकल वस्तुओं तथा अपनी पत्नी को छत पर स्थापित कर सीढ़ी हटा दी और कुबुद्धि से कहा जो तुम्हें पसंद हो वह हमारे घर से ले लो।

उसने (कुबुद्धि) उसकी पत्नी को ग्रहण करने के लिए दोनों हाथों से सीढ़ी उठाई तभी सुबुद्धि ने कहा- मैंने पहले ही कह दिया है कि दोनों हाथों से जिसे तुम ग्रहण करोगे, वही तुम्हारा है, दूसरा नहीं। अतः वह लज्जित होकर बाहर निकल गया और लोगों से निन्दित हुआ।

कथा- 41

"राजपुत्री का रोग और ब्राह्मण की मन्त्र साधना की कथा"

पञ्चपुर नगर में शत्रुमर्दन नाम का राजा था अपनी पुत्री मदनरेखा के गले की ग्रन्थि को ठीक कराने के लिए राजा ने डुग्गी पिटा दी कि जो मेरी कन्या को निरोग कर देगा उसे मैं दारिद्रय रहित कर दूँगा। किसी दूसरे गाँव से आयी ब्राह्मणी ने ऐसा सुनकर कहा कि- मेरा पति मान्त्रिक इस राजकन्या को निरोग करेगा।

अतः मन्त्रादि न जानने पर भी वह मान्त्रिक धनालोभ के कारण अनुष्ठान की सामग्री और आचार्य के बैठने का आसन आदि ठीक कर अनेक हास्यपूर्ण मन्त्रोच्चारण करने लगा और मन्त्रों के उच्चारण से राजपुत्री हँस पड़ी। अधिक हँसने से उसकी

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