शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
तब उसने कहा-मनोरम नामक गाँव में सरस्वती नदी के किनारे कुएँ में बिना समय के फला हुआ, तैरता हुआ, आम का फल मैंने देखा।
सुबुद्धि ने कहा-यदि यह बात सत्य है तो हमारे घर दोनों हाथों से जो कुछ तुम ग्रहण कर सको ग्रहण करो और मिथ्या होने पर तुम्हारे घर से मैं ग्रहण करूँ।
ऐसी शर्त लग जाने पर कुबुद्धि ने रात में कुएँ से उस फल को निकाल लिया जिस कारण से सुबुद्धि हार गया और कुबुद्धि ने उसकी भार्या के ग्रहण की कामना से शर्त पूरी करने को कहने लगा।
सुबुद्धि ने उस दुष्ट के दुर्विचार को जानकर अपने घर की सकल वस्तुओं तथा अपनी पत्नी को छत पर स्थापित कर सीढ़ी हटा दी और कुबुद्धि से कहा जो तुम्हें पसंद हो वह हमारे घर से ले लो।
उसने (कुबुद्धि) उसकी पत्नी को ग्रहण करने के लिए दोनों हाथों से सीढ़ी उठाई तभी सुबुद्धि ने कहा- मैंने पहले ही कह दिया है कि दोनों हाथों से जिसे तुम ग्रहण करोगे, वही तुम्हारा है, दूसरा नहीं। अतः वह लज्जित होकर बाहर निकल गया और लोगों से निन्दित हुआ।
कथा- 41
"राजपुत्री का रोग और ब्राह्मण की मन्त्र साधना की कथा"
पञ्चपुर नगर में शत्रुमर्दन नाम का राजा था अपनी पुत्री मदनरेखा के गले की ग्रन्थि को ठीक कराने के लिए राजा ने डुग्गी पिटा दी कि जो मेरी कन्या को निरोग कर देगा उसे मैं दारिद्रय रहित कर दूँगा। किसी दूसरे गाँव से आयी ब्राह्मणी ने ऐसा सुनकर कहा कि- मेरा पति मान्त्रिक इस राजकन्या को निरोग करेगा।
अतः मन्त्रादि न जानने पर भी वह मान्त्रिक धनालोभ के कारण अनुष्ठान की सामग्री और आचार्य के बैठने का आसन आदि ठीक कर अनेक हास्यपूर्ण मन्त्रोच्चारण करने लगा और मन्त्रों के उच्चारण से राजपुत्री हँस पड़ी। अधिक हँसने से उसकी
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गले की गाँठ फूट गई। उसके फूट जाने पर राजपुत्री को आराम हो गया और राजा से धनराशि पाकर कृतार्थ होकर ब्राह्मण अपने घर चला गया।
कथा- 42
"व्याघ्रमारी और सिंह की कथा"
देउल ग्राम में राजसिंह नाम का राजपूत था। उसकी पत्नी कलहप्रिया अपने पति से झगड़ा करके अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर पिता के घर चली गयी। क्रोधवश वह अनेक नगरो तथा वनो को लाँघती हुई मलयगिरि के समीप महावन में पहुँची।
वहाँ पर बाघ को अपनी ओर आता देखकर निर्भयतापूर्वक उसने दोनों पुत्रो को तमाचा मार कर कहा- तुम दोनों एक अकेले बाघ को खाने के लिए क्यों लड़ाई कर रहे हो? इस एक ही को पहिले बाँट कर खा लो। इसके बाद जब दूसरा दिखाई पड़ेगा तब खाना।
ऐसा सुनकर सिंह ने उसे बाघ मारने वाली स्त्री समझकर भय से आकुलचित्त होकर भाग गया।
कथा- 43
"व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा"
वन में भयातुर उस बाघ को भगा हुआ देखकर पशुओं में धूर्त शृगाल ने कहा-कि भय से बाघ भगा हुआ है।
बाघ ने शृगाल से कहा कि तुम भी किसी गुप्त स्थान को चले जाओ, क्योंकि जिस व्याघ्रमारी को शास्त्र मे सुनते है वही मुझे मारने जा रही थी कि मैं जान बचाकर शीघ्र ही उसके आगे से भागा।
जम्बुक ने व्याघ्र से कहा स्वामिन्! वह धूर्त स्त्री जहाँ है वहाँ चला जाय, यदि वहाँ चलने पर तुम्हारे सामने भी वह देखे तो आप अपनी शर्त के अनुसार मेरा वध कर दें।
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तब उस व्याघ्रमारी (राजपुत्र की पत्नी) ने सोचा कि धूर्त शृगाल ही इसे यहाँ लाया है, अतः उसी शृगाल को फटकारती और अंगुली से भय दिखाती हुई बोली-
रे धूर्त शृगाल! पहिले तो तूने तीन बाघ दिये थे और आज एक ही बाघ विश्वस्त कर, प्रस्तुत करके क्यो जा रहा है।
ऐसा कहकर भयंकर व्याघ्रमारी वेग से दौड़ी और इधर बाघ गले मे शृगाल बांधे सहसा भाग गया।
कथा- 44
"जम्बुक की मुक्ति की कथा"
व्याघ्रमारी के भय से अन्य प्रदेश में जाने का इच्छुक बाघ, सियार को गले मे बाँधकर लटकाये लिये जा रहा है जिससे सियार की पीठ और पैर बुरी तरह रगड़ खाकर छिल उठे तथा रूधिर बहने लगा तब भी वह अपने को छुड़ाने की कामना से पीड़ित होते हुए भी बड़े जोर से हँसने लगा।
बाघ ने कहा-तू क्यों हँसा?
वह बोला-देव! मैंने उस व्याघ्रमारी को धूर्त समझा था तुम्हारी कृपा से दूर देश पहुँचकर जीवित बच गया। किन्तु हमारे गिर रुधिर बिन्दुओं से चिन्हित् मार्ग का अनुसरण करती वह पीछे-पीछे आ रही हो तो कैसे जीवित बचेंगे।
इसके बाद उस वचन को सुनकर व्याघ्र सियार को छोड़ सहसा भाग खड़ा हुआ। सियार भी सुख से स्थित हुआ।
कथा- 45
"विष्णु ब्राह्मण और रतिप्रिया गणिका की कथा"
विलासपुर नामक नगर में अरिन्दम नाम का राजा था। उसी गाँव में विष्णु नामक एक रति लोलुप ब्राह्मण जो पत्नी विहीन रति कर्म में सब स्त्रियों से पराजित न होने वाला प्रसिद्ध था। उसी गाँव में रतिप्रिया नाम की गणिका थी। उसने सोलह द्रम्म
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लेकर उसे अपने घर बुलाया। अन्य कार्यों से निवृत्त रति कर्म में मन दिये उस ब्राह्मण ने उसे जीतने के लिए रति आरम्भ की। द्रव्य के कारण उसे हराने के लिए उस वेश्या ने दो पहर तक उस रति लोलुप ब्राह्मण को सहा, किन्तु आधीरात को नीचे उतर कर उसने कुटनी से निवेदन किया और कहा कि इसका धन इसे वापस कर दो।
कुटनी ने कहा-जब मैं पीपल पर चढकर दो सूपों से पंख के फड़फड़ाने की ध्वनि करती हुई मुर्गे की बोली बोलूँ तब 'प्रभात हो गया' यह कहकर उसे निकाल देना। गणिका ने वैसा ही किया।
जब ब्राह्मण ने कुक्कुट की ध्वनि वाले स्थान को देखा तो दो सूप सहित उसे कुटनी दिखायी दी। उसने उसे ढेलों से आहत कर भूमि पर गिरा दिया। स्त्रियों ने उस कुटनी को बहुत धिक्कारा। वह ब्राह्मण शुल्क रूप में गृहीत धन का दूना धन लेकर नगर के बीच गणिका को निन्दित करके अपने घर गया।
कथा- 46
"करगरा और करगरा नाथ की कथा"
वत्सोम नामक नगर में एक दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी पत्नी करगरा नाम के अनुसार गुणी, सब जीवों को इतना उद्विग्न करने वाली थी कि उसके गृहद्वार के वृक्ष पर रहने वाला भूत और ब्राह्मण उसके भय से वन को चले गये। भूत ने डरे हुए ब्राह्मण से कहा कि- हे अतिथि! तुम मुझसे भयभीत न हो, हे द्विज! मदन नामक भूपति की राजधानी मृगावती जाकर मैं उसकी पुत्री मृगलोचना को पकड़ लूँगा। तुम्हारे आने पर तुम्हारे दर्शन मात्र से ही मैं उसे छोड़ दूँगा।
तब भूत के न छोड़ने पर ब्राह्मण ने कहा- मैं करगरा का स्वामी, विश्वास कर यहाँ आकर स्थित हुआ, हे धूर्त भूत! तू अपने वचन का पालन कर। देव! क्या मुझसे छल करना तुझे उचित है?
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तब भूत छोड़कर चला गया। यह भूत से मुक्त हो गयी ऐसा कह कर राजा ने ब्राह्मण को कन्या और आधा राज्य दे दिया। ब्राह्मण भी पूर्णमनोरथ होकर (अपने घर) गया।
कथा- 47
"करगरानाथ की कथा"
करगरा का पति राजकन्या के साथ राजलक्ष्मी का उपभोग करने लगा। इसी समय भूत ने 'कर्णावती' नगर पहुँचकर वहाँ के राजा की भार्या सुलोचना, जो मृगावती नगर के राजा मदन की बुआ थी, को पकड़ लिया। शत्रुघ्न राजा की भार्या सुलोचना ने अपनी पीहर के केशव मान्त्रिक को बुलाया। अनिच्छुक केशव को विनय पूर्वक लाने के लिए राजा मदन ने अपने दूतों को भेजा। तब वह करगरापति भार्या के अनुरोध पर गया। वहाँ पहुँचने पर शत्रुघ्न राजा से सम्मानित हो सुलोचना के महल गया। भूत ने कठोर वाक्यों में ब्राह्मण से कहा- मैंने अपना वचन निभाया अब तुम अपनी रक्षा करो। तुम मन्त्र-तन्त्र कुछ नहीं जानते।
ब्राह्मण ने भूत से कहा मैं करगरा पति हूँ, करगरा भी यहाँ आयी है। यह सुनकर भूत चला गया। सुलोचना के स्वस्थ होने पर ब्राह्मण मृगावती नगर को चला गया।
कथा- 48
"मन्त्री शकटाल व दो घोड़ियों की कथा"
पाटलिपुर नगर में नन्द नाम का चक्रवर्ती राजा था, शकटाल उसक मुख्य सचिव था। उसने राजा को धर्म का विनाश तथा पृथिवी को द्रव्यहीन करने से रोका जिसके कारण उस मूर्ख राजा ने उस मन्त्री को पुत्रों समेत अन्धकूप में डलवा दिया।
तब बंगाल के राजा ने, शकटाल की मृत्यु हुई या नहीं इसका पता लगाने के लिए अपने सेवकों को दो घोड़ियाँ देकर नन्द के पास भेजा और उन्हें आदेश दिया
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कि इन दोनो मे कौन माता है और कौन पुत्री। इसका पता नन्द के यहाँ से कराके आओ। जब कोई भी नन्द के राज्य में घोडियों के विषय मे निर्णय न कर सका तब राजा ने नौकर से कहा-शकटाल के वंश का कुएँ के अन्दर कोई बचा है या नहीं।
उसने कहा- कोई तो अवश्य बचा है क्योकि कुएँ के अन्दर का कोई मनुष्य पूर्वोदिष्ट भात ग्रहण करता है।
तब उसे कुएँ से निकलवाकर राजा ने शकटाल से कहा इन दोनों में माता और पुत्री कौन है इस सन्देह को दूर करो।
तब मन्त्री ने दोनों घोडियों पर काठी रखवाकर विस्तृत मैदान में खूब दौड़ा कर, उनके थक जाने पर काठी उतरवा कर उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद माता पुत्री को जीभ से चाटने लगी और पुत्री उसके प्रति अतिवत्सला-स्नेह युक्त हो गयी। तब मन्त्री ने माता और पुत्री का भेद (कौन माता है, कौन पुत्री) राजा के सामने बता दिया जिसके कारण मन्त्री को बहुत सा धन और प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
कथा- 49
"मन्त्री शकटाल और छड़ी की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने दुबारा चातुर्यपूर्ण काम किय था, वैसे ही संकट में चातुर्यपूर्ण उत्तर देना जानती हो तो जाओ। शुक ने यह कथा सुनाते हुए कहा-
बङ्गाल के राजा ने सुवर्ण हीरकों से जड़ी अत्यन्त गोल आकार वाली छड़ी अपने सेवकों को देकर कहा कि-नन्द के राज्य में जाकर इस छड़ी का आदि और अन्त भाग जानकर आओ। इस आदेश से नन्द के पास आकर छड़ी उसके आगे रखकर उसका आदि और अन्त उन लोगों से पूछा। उनका प्रश्न सनुकर मुख्य-मुख्य कलावैत्ता, बनियों ने उसे तौला, अन्य पण्डितों ने उसे देखा, किन्तु कोई उसका आदि और अन्त भाग नहीं बता सका।
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तब राजा ने शकटाल को आदेश दिया कि तुम इसका आदि और अन्त भाग बताओ। उस बुद्धिमान मन्त्री ने छडी को जल मे डाल दिया और अन्तभाग जान लिया क्योकि जो मूल-भाग था वह थोडा सा जल मे डूब गया। उत्तर सुनकर उन सेवकों ने जाकर अपने राजा से बताया।
कथा- 50
"धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की कथा"
जाङ्गल नामक गाँव में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र थे जो धन की आशा से परदेश गये। वहाँ से प्रचुर धन अर्जन कर जब वे लौटे तो कुछ धन पीपल के पेड़ के नीचे गाडकर शेष धन लेकर अपने-अपने घर चले गये। उस दुष्टबुद्धि ने खोदकर उस धन को लेकर अपने घर ला रखा। कुछ समय बाद दोनों मिले और पीपल के नीचे स्थित द्रव्य को लेने गये। जब देखा तो वहाँ धन नही था। धर्मबुद्धि ने यह सारा वृतान्त मन्त्री से बताया। मन्त्री द्वारा बलपूर्वक पूछे जाने पर उसने (कुबुद्धि) सिर्फ इतना बताया कि मैंने सहस्र पण छोड़ दिया था, इसके लिए शपथ दिलाऊँगा।
धर्मबुद्धि ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया तो मन्त्री ने दोनों की जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये। तब दुष्टबुद्धि ने यह सारा वृतान्त अपने पिता को बताकर उस वृक्ष के कोटर में बिठा दिया। प्रातः दोनों वादी, मन्त्री और कौतूकाकृष्ट लोग उस पीपल के पास गये। स्नान किये दुष्टबुद्धि ने हाथ जोड़कर सत्य-शपथ कर कहा हे वृक्षोत्तम्! सच-सच कहना-यदि मैंने धन चुराया हो तो हाँ बोलना, यदि नहीं चुराया हो तो नहीं बोलना। ऐसा सुनकर सबके सामने उसके पिता ने कहा-इसने नहीं चुराया। तब धर्मबुद्धि ने उसके पिता का शब्द जानकर कोटर में आग लगा दी। चिल्लाते, अधजले उसके पिता को कोटर से गिरा देखकर मन्त्री ने दुष्टबुद्धि को दण्डित कर धर्मबुद्धि को सुखी किया।
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कथा- 51
"ब्राह्मण गाङ्ग्लि की सेना की कथा"
चमत्कार पुर नामक नगर में चारों वेद को जानने वाले, चारों वर्ण वाले, चारों आश्रम वाले, लोग रहते थे। एक बार वहाँ के ब्राह्मण बल्लभनाथ का दर्शन करने के लिए गाड़ियों, घोड़ो आदि पर सवार हो, भोजन सामग्री लेकर और अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहिनकर पुत्रकलत्र समेत चल दिये गये। रास्ते में चोर लूटमार करने लगे। जिससे वे सभी भयभीत होकर भाग गये लेकिन गाङ्ग्लि नामक लंगड़ा ब्राह्मण उन सभी के साथ भाग नहीं सका। चोरों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। गाङ्ग्लि ने डरे हुए अपने भाई से साहसी मनुष्यों की भाँति कहा भ्रातः! कितने हाथी और घोडे हैं? शीघ्र ही बताओ और धनुष दो जिससे इन्हें दिव्य अस्त्र से एक साथ मारूँ। यह सुनकर सभी चोर भाग गये। अतः जो धर्म-अर्थ-काम के विषय में बोलना जानता है उसे पुरूषो में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है अर्थात् कोई नहीं।
कथा- 52
"जयश्री की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- भूतल पर प्रतिष्ठान नामक नगर में सत्त्वशील नाम का राजा था। उसके पुत्र का नाम दुर्दमन था। वह पैतृक सम्पत्ति को त्याग कर सम स्वभाव वाले मित्रों ब्राह्मण, बढ़ई तथा वणिक् पुत्र के साथ परदेश को चला गया और चारों ने मिलकर विचार किया कि हमें रत्न भूमि समुद्र की सेवा करनी चाहिए। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर समुद्र ने उन चारों को चिन्तामणि के समान गुण वाले चार रत्न दिये घर लौटते समय विश्वास कर सबने चारों रत्नों को बनिये को सौंप दिया।
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तब उस दुष्ट ने चारों रत्नो को जांघ के भीतर डालकर सी लिया और मार्ग मे चिल्लाने लगा कि मैं तो मूस लिया गया (ठगा गया)।
उसके ऐसा करने पर उन सबने यह समझ लिया कि यह कपट कर रहा है और विवाद करते-करते वे सब ऐरावती पुरी में नीतिसार राजा के यहाँ गये और अपनी समस्या को बताया। जब यह सब बात राजा के मन्त्री को पता चली तो उसने अपनी पुत्री से बताया। पुत्री ने उन सबको स्नान, भोजन कराके शृङ्गार, करके क्रम से प्रत्येक से अपना उपभोग करने के लिए कहा और सौ स्वर्ण मुद्राएँ मांगा। क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं बढई ने धनाभाव दर्शाया किन्तु जब वह बनिये के पास गयी तो उसने कहा स्वामिनि! चार रत्न लेकर मेरा उपभोग करो।
इस प्रकार मन्त्री की पुत्री अपने शील की रक्षा करती हुई चारों रत्नों को अपने पिता को सौंप दिया। मंत्री ने उन्हें बुलाकर प्रत्येक को दे दिया। वे भी अपना-अपना धन पाकर कृतकृत्य हो अपने-अपने घर गये।
कथा- 53
"चर्मकार की पत्नी की कथा"
शुक ने कहा चर्मण्वती के किनारे चर्मकूट नामक गाँव है। वहाँ दोहड नाम का चमार था उसकी पत्नी देविका परपुरुषों मे आसक्त रहती थी। एक बार चमार चमड़ा खरीदने बाहर गया तो वह उपपति को अपने घर लाई। जब दोनों सुरत कर चुके तभी उसका पति घर के बाहर आ गया। जब उसने पति को आया हुआ जाना तो निरर्थक वाक्य बड़-बड़ाती हुई बाहर आयी। उसका वाक्य सुनकर मूर्ख डर गया और मन्त्रवेत्ता को बुलाने चला गया तब तक उसने उस उपपति को भाग दिया।
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कथा- 54
"विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– शक्रावती नामक नगर में धर्मादिगुणों से युक्त धर्मदत्त नामक राजा था। उसका मन्त्री सुशील था। उस मन्त्री का पुत्र विष्णु परराष्ट्र मन्त्री था। जब उस पद से उसे हटा दिया गया तो वह धनहीन होकर भी मैं राज–कुल का अमात्य हूँ ऐसा अहंकार युक्त और कठोर हो गया। मन्त्री ने राजा से कहा कि विष्णु के ऊपर आपकी कोई कृपा नहीं है वह आपका भक्त, अनुरक्त और दूतकर्म में प्रवीण है, तो देव? कहीं भेजकर इसकी परीक्षा लें। तब राजा ने भस्म रूप भेट सामग्री पर अपनी मुहर लगाकर उसे विदिशा नगर में शत्रुदमन नामक राजा के पास भेजा। राजा ने जब उस अमङ्गलकारी भस्म को देखा तो कुपित हो गया। विष्णु ने राजा को क्रोधित देखकर कहा कि– अश्वमेघ यज्ञ कुण्ड का भस्म है जो त्रेता की अग्नि से उत्पन्न पवित्र पापनाशक तथा कल्याणकारक है। ऐसा कहकर सहसा उठकर हाथ पर भस्म रख, राजा को समर्पित कर दिया। राजा ने उसके वचन से प्रसन्न हो भस्म का वन्दन किया। उस तुष्ट राजा ने उसके बदले मूल्यवान उपायन भेजा और विष्णु को सम्मानित कर विदा किया।
कथा- 55
"श्रीधर ब्राह्मण की कथा"
चर्मकूट नामक गाँव में श्रीधर ब्राह्मण था। वहीं पर चन्दन चमार भी रहता था। श्रीधर ने उस चमार से एक जोड़ी जूता बनवाया और पैसे नहीं दिया। वह चमार रोज पैसे मांगता लेकिन श्रीधर यही कहता कि मैं तुम्हें प्रसन्नचित कर दूँगा। बहुत दिन बाद चमार ने ब्राह्मण को पकड़ लिया। उसी समय ग्रामपाल के घर पुत्र हुआ था। तब ब्राह्मण ने छलपूर्वक चमार से कहा मैंने तुम्हें प्रसन्नचित करने को कहा था इस पुत्र के पैदा होने पर तुम प्रसन्न हो या नहीं। चमार यदि नहीं कहता है तो राजा
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का दण्ड पात्र बने अन्यथा धन जाता है। उसने कहा मैं प्रसन्न हूँ। अतः छलपूर्वक मुक्त होकर ब्राह्मण अपने घर गया।
कथा- 56
"सन्तक्त वणिक् की कथा"
त्रिपथ गाँव में सान्तक नाम बनिया बड़ा धनी किन्तु कृपण दुःस्वभाव था और उसे अपना गाँव नही अन्य-अन्य गाँव प्रिय थे। एक दिन वह अन्य गाँव से वसूली करके आ रहा था तो उसे चारों ओर से चोरों ने घेर लिया। चोरों से घिरा जानकर उसने गलग्रह नामक यक्ष के आगे द्रव्य रखकर हाथ में खरिया मिट्टी लेकर कहा-देव! मैने तुम्हारी सबसे वसूली की, यह धन जो कुछ वृद्धि (व्याज) समेत मुझे मिला है इसे लीजिए।
यह देखकर कि 'यह तो यक्ष का धन है' उसे प्रणाम कर चोर चले गये और वह भी धन लेकर कुशल पूर्वक घर गया।
कथा- 57
"शुभङ्कर की कथा"
अवन्तीपुरी में विक्रमार्क राजा था। उसकी पत्नी का नाम चन्द्रलेखा था। मदनातुरा उसने शुभङ्कर नामक राजपण्डित को चाह लिया और अपने स्थान पर अपनी दासी को अपना परिधान पहनाकर स्वयं दासी का वेष बनाकर कामुक के घर जाकर रतिक्रीडा नित्य इच्छा भर करती। एक दिन राजा ने रानी की चोरी पकड़ ली।
अगले दिन राजा ने प्रातः क्रियाओं को समाप्त कर पण्डित शुभङ्कर और रानी को बुलाया। पण्डित को सिंहासन पर बिठाकर बात-चीत के सिलसिले में राजा ने हँसते हुए कहा- 'कृतकं मन्ये भयं योषिताम्' यह वचन सुनकर उसका हृदय अपने दोष से विस्मत हो गया और पण्डित ने कहा-
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हे मदनावतार!, तुम्हारी कीर्ति समुद्र के भयंङ्कर ग्राहों से व्याप्त जल को लाँघ जाती है, निराधार आकाश में स्थित होती है, दुर्गम पर्वतों के शिखर पर चढ़ जाती है, विषैले सर्पों से व्याप्त पाताल लोक को अकेले चली जाती है, अतः मैं समझता हूँ कि स्त्रियो का भय कृत्रिम होता है।
ऐसा सुनकर राजा ने रानी को उस पण्डित के हाथ पकड कर सौप दिया। अब पण्डित राजा की कृपा से उसके साथ सुख भोगने लगा।
कथा- 58
“दुःशीला पति और गणपति की कथा“
लोहपुरी नामक नगर मे राजड नाम का एक नीची जाति का व्यक्ति था। उसकी पत्नी दुःशीला पर पुरुषों में अत्यन्त आसक्ति रखती थी। वह पद्मावती पुरी सूत बेचने जाया करती थी। एक दिन उन सभी ने गणेश जी को मनौती मानी। उसने चुम्बन की मनौती मानी। गणेश जी ने सभी का लाभ कराया। तब सभी ने अपनी-अपनी मनौती गणेश जी को दिया। जब दुःशीला की बारी आयी तो विनोद प्रिय गणेश जी ने उसका अधर धर लिया। यह सारा कथा सखियों ने उसके पति को जाकर सुनाया। यह सुनकर उसने गणेश जी के सामने एक गधा के साथ रमण करना प्रारम्भ कर दिया। तब गणेश जी को हँसी आ गयी। उनके हँसने से दोनों होंठ शिथिल हो गये। इस प्रकार वह छूटकर गणेश जी को प्रणाम कर अपने पति के घर चली गयी।
इस प्रकार जो समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख रखने वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता।¹
1 समयोचितमारम्भं कुरुते यस्तु कृत्यवित्।
सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।
शुकसप्तति' श्लोक सं० 278, पृ०सं० 237
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अधिक देर तक इधर-उधर घूमता रहा तब उसने मनमानी रति किया और पति से इस प्रकार कहा-
हे मूर्ख! तुम्हारे सामने मैंने मनमानी रति की तुम शूर किन्तु मेरे अहित हो अत. मै तुम्हारे यहाँ से जा रही हूँ और उपपति द्वारा लाये गये घोडे पर चढकर चली गयी। उसको जाते देख राहड भी लज्जित हो मुख छिपाकर रह गया। अतएव स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता। क्योकि-
(स्त्री के वश में होकर) प्राचीन काल मे शङ्कर को नाचना पड़ा। श्रीकृष्ण ने रास किया और ब्रह्म पशुता को प्राप्त हुये, स्त्रियो से किसकी विडम्बना नहीं हुई?¹
शुक का यह वचन सुनकर प्रभावती ने कहा स्त्री, जन्म का, वृद्धि का तथा सुख का कारण है, उसकी तुम कैसे निन्दा करते हो?²
शुक ने कहा-तुम्हारी यह बातें पतिव्रता के विषय से सम्बन्धित हैं, अन्य स्त्रियों के विषय में यह बात नहीं लागू होती।
कथा- 60
"राजदूत हरिदत्त की कथा"
वीर नामक राजा की सभा के विषय में कच्छ देश के राजा ने सुना कि वह आश्चर्यमय, देवनिर्मित तथा सकल रत्नों से विभूषित है। उसने अपने दूत हरिदत्त को सुन्दर रत्न तथा घोड़े एवं हजार उपायन देकर भेजा। वह दूत उसकी पुरी में जाकर राजा से बोला-मेरे स्वामी ने आपकी विचित्र सभा को देखने के लिए मुझे भेजा है।
1 आननर्त पुरा शम्भुर्गोविन्दो रासकृत्तथा।
ब्रह्मा पशुत्वमापन्नः स्त्रीभिः को न विडम्बितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 284, पेज सं० 241-42
2 उत्पत्तिकारणं तन्वी तन्वी वृद्धेश्च कारणम्।
सुखस्य कारणं तन्वी सा कथ कीर दुष्यते।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 287, पेज सं० 242
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कथा- 63
"शकटाल और चाणक्य की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए उत्पन्न दुःख को चाणक्य के द्वारा नन्दकुल को उच्छिन्न कर दुःख का शमन किया उसी प्रकार यदि तुम भी करना जानती हो तो जाओ। अन्यथा तुम्हारा दूसरे के घर जाना युक्त नहीं है।
कहा गया है- जिसका परिवार तारागण है, जो औषधियों का स्वामी है, शरीर जिसका अमृतमय, जो कान्ति से युक्त है- ऐसा चन्द्रमा भी सूर्यमण्डल में जाकर कान्तिरहित हो जाता है। अतः यह सत्य है कि दूसरे के घर जाकर सभी लघुता को प्राप्त होते हैं।¹
कथा- 64
"मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि-कूटपुर नामक गाँव में सोमराज नामक राजपूत था। जिसकी पत्नी मण्डुका बड़ी सुन्दर तथा परपुरुषों में आसक्त रहती थी। उसका उपभोग, संकेतित एक मनुष्य, घण्टा लिए, रात मे घर के आँगन में किया करता। एक दिन उसके पति ने घण्टे का शब्द सुनकर बैल के आने का सन्देह कर हाथ में लाठी लेकर दौड़ा।
मण्डुका के पति को घण्टा के शब्द का अनुसरण कर आता देखकर देविका नामक सखी ने उसे भगाकर घण्टा हाथ में ले लिया और कहा-
1 उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना-
ममृृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः।
भवति विकलमूर्तिमण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम् ।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 307, पेज सं० 257
[ 104 ]
कामुक बैल घबड़ाकर भाग गया। वह लौटकर पत्नी से अपने पौरूष का वर्णन करने लगा।
कथा- 65
"श्रावक श्रीवत्स की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– जनस्थान नामक नगर में नन्दन नामक राजा नाम के अनुसार गुणवाला था। उसी नगर में परम शिव भक्त श्रीवत्स नामक साधु था। एक बार वह शिष्यों समेत वाराणसी नगर को जा रहा था। रास्ते में एक शिष्य को मांस लाने के लिए भेजा। अन्य साधुओं ने उसे ऐसा करते देख लिया। जब सभी साधु बैठ गये तब वह साधु हँसने लगा और सभी साधुओं से पूछने पर कहा– यह ऐसा विचित्र शिष्य है। मैंने कहा–"मां संवर्तते" इति, इसने नासमझी से इस वाक्य के 'मां' के साथ संवर्तते के सम् को मिलाकर वाक्य का विच्छेद यों कर दिया–'मांसं वर्तते'। तदुनसार व्यवहार में प्रवृत्त हुआ।
कथा- 66
"हंसराट् शङ्खधवल की कथा"
भूतल पर निर्जन, पक्षियों को रुचिकर एवं प्रिय, दशयोजन विस्तृत एक रम्य वन है। उसमें दो कोस विस्तृत शीतल छाया वाले, जलाशय के तीर पर स्थित बरगद के वृक्ष पर हंसधवल नामक हंसराज कुटुम्ब समेत दिन भर विचरण करके शाम को विश्राम करता था। एक दिन वे हंस शिकारी की जाल में फँस गये। अपने कुटुम्ब को उस प्रतार जाल में बंधा जानकर शंखधवल ने कहा–पुत्रों! जब वह व्याध प्रातः तुम लोगों को देखे तो तुम सब मुर्दे के समान श्वांस छोड़कर लेट जाना और वह तुम्हें मरा हुआ समझकर भूमि पर फेंक देगा तो तुम सब उड़ जाना। बहेलिया प्रातः आया और उसने उनको मरा हुआ समझकर फेंक दिया और वे सब उड़कर अभीष्ट देश को चले गये।
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कथा- 67
"मकर और प्लवङ्गम (बन्दर) की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- पुष्पाकर वन में वनप्रिय नाम का एक बौना वानर था। उसने समुद्र सीमा के जल में लोटते-पोटते घड़ियाल को देखकर कहा हे मित्र! क्या तुम जीवन से ऊब गये हो जो पृथ्वी तल पर आये हो।
उसने कहा- हे वानर! विधाता ने जिसके लिए जो स्थान और जो आजीविका विदित कर दी है, उसका मन उसी में रमता है अन्यत्र नहीं।¹
कहा भी गया है- (श्री रामचन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्ण निर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।²
यह सुनकर उसने कहा-स्थल पर उत्पन्न प्राणी धन्य हैं जहाँ आप सरीखे प्रियवादी मित्र हैं। यह सुनकर वानर ने कहा-आज से तुम मेरे प्राणो से भी अधिक प्रिय मित्र हुए और उसे अमृत सदृश पके फल दिये।
मकर की पत्नी ने जब पके फलों का वृतान्त जाना तो उसने गर्भ के प्रभाव से वानर के हृदय का मांस खाने की अभिलाषा व्यक्त की।
मकर ने वानर से कहा-मित्र! मेरी पत्नी ने तुम्हें बुलाया है जरा चलकर मेरे घर की परिचर्या का भी अनुभव कीजिए। ऐसा विश्वास दिलाकर उसे पीठ पर बिठाकर चल दिया। शङ्कित वानर ने कहा-मित्र! वहाँ चलकर मुझे क्या करना होगा।
ऐसा सुनकर मगर ने सोचा अब तो मैं इसे उस स्थान पर ला चुका हूँ जहाँ से यह समुद्रतट, को वापस नहीं जा सकेगा इसलिए साफ-साफ बता दिया।
1 यस्य यद्विहितं स्थानं यस्य यद्वेतनं कृतम्।
तत्रैव रमते चित्त तस्य नान्यत्र वानर।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 313, पृ०सं० 263
2 सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितुक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 314, पृ०सं० 263
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वानर ने कहा—मगर! तो तुम मुझे बेकार ले जाते हो क्योंकि मैं हृदयहीन हूँ। मेरा हृदय गूलर अथवा बरगद के पेड़ पर रहता है, उसे लेकर मैं पुनः जल में वापस आता हूँ।
ऐसा कहने पर मूर्ख मगर समुद्र के किनारे वापस आया। वानर भी उसकी पीठ से उछलकर वृक्ष पर चढ़ गया और मगर से बोला— अब पेड़ पर स्थित मुझे तुझ ऐसे लोग नही ग्रहण कर सकते।
कथा- 68
"वचचेवति की कथा"
विद्यास्थान नामक एक ब्राह्मणों का गाँव है। जहाँ पर केशव नामक ब्राह्मण ने स्नान के लिये गये हुए सरोवर पर एक सुन्दर बनिये की पुत्री देखी। वह उसके साथ रति करना चाहता था। वणिक् पुत्री ने ब्राह्मण से सिर पर दूसरा घड़ा रखने को कहा। घड़ा रखते समय उसने उसके ओठ चूम लिए। ऐसा करता हुआ वह उसके पति द्वारा देख लिया गया और राजा के पास लाया गया। उसका वितर्क नामक मित्र था। उसने उसके पास आकर यह कहा—मित्र!—राजा के पास पहुँचकर 'वचचेवति' वाक्य ही कहना और कुछ नहीं। वैसा करने पर मन्त्री ने कहा— यह निर्दोष है। इसकी ऐसी प्रकृति ही है। उसी उत्तर से लेकर लोक में विर्तक की सहायिका बुद्धि से वह सज्जनता को प्राप्त माना गया।
कथा- 69
"वेजिका की कथा"
कलास्थान नामक स्थान है, वहाँ एक बनिया था जिसकी भार्या वेजिका अत्यन्त प्रिय थी। एक दिन जब वह पति को स्नान करा रही थी तो उपपति को मार्ग पर जाता देखकर यहाँ काफी पानी नहीं है— ऐसा बहाना बनाकर पानी लेने घर से निकल पड़ी और उपपति के साथ बहुत समय लगा दिया। तब जार से उपभोग की
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गयी उसने अपने पति को धोखा देना सोचकर कुएँ में कूद गयी। बहुत शोरगुल मचा। कुएँ मे स्त्री गिर गयी-ऐसा प्रवाद फैल गया। उसके पति ने यह प्रवाद सुनकर अवश्य मेरी पत्नी कुएँ में गिर गयी होगी। वह जल्दी से आया और अपनी पत्नी को कुएँ में से निकाला और सम्मान किया।
कथा- 70
"प्रभावती और मदन की कथा"
इतनी कथाओ के अन्त होते-होते उसका पति मदन विनोद विदेश से आ गया। उसके आ जाने वह उसी प्रकार पूर्ववत् उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करने लगी। और बोली-आर्यपुत्र! आप वन्दनीय है जिनके घर में त्रिविक्रम के लाये हुए दो पक्षियों में से एक शुक सब लोगों का हितभाषी है, विशेषतः मेरा तो बन्धु के समान है, ज्यों-ज्यो वह शुक की प्रशंसा करती त्यों-त्यों शुक लज्जित होता जाता था।
तब मदन उसका वचन सुनकर बोला-शुक ने तुम्हारा क्या उपकार किया है। यह कैसे इस प्रकार गुणशाली हो गया।
उसने कहा-स्वामिन्! तुम्हारे विदेश चले जाने पर कुछ समय तक मैंने तुम्हारा वियोग सहा, बाद में दुष्ट सखियों की सङ्गति में पड़ गयी। अन्य पुरूष से रमण करने की इच्छा वाली मेरे गमन में बाधा डालने वाली सारिका को मैंने मारना चाहा, लेकिन वह उडकर दूर चली गयी। इस शुक ने अपने वाग्रपञ्च से मुझे सत्तर दिनों तक रोक रक्खा, अतः मैने कर्म से तो पाप नही किया केवल मनसा पाप किया।¹ आज से तुम मेरे जीवन-मरण के स्वामी हो-मेरा जीवन मरण आपके हाथ में हैं। ऐसा सुनकर मदनविनोद ने शुक से पूछ तो उसने कहा-
¹ अतो मया कर्मणा पापं नं विहितं मनसा तु कृतम्।
शुकसप्ततिः पेज सं० 276,
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