श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ ईश्वर ही [ कल्पान्तरके आरम्भमें ] प्रजापतियोंको पुनः उत्पन्न कर सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ एकैकमिति । सुरनरतिर्यगा- | 'एकैकम्' इत्यादि । यह देव दीनां सृजति जालमेकैकं प्रत्येकं | इस मायामय क्षेत्रमें सृष्टिके समय बहुधा नानाप्रकारं विकुर्वन्सृष्टि- | देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादिके एक- कालेऽस्मिन्मायात्मके क्षेत्रे संहर- | एक जालको नाना प्रकारसे विकृत त्येष देवः । भूयः पुनर्य लोकानां | करके रचता है और फिर संहार | कर देता है। फिर यह ईश्वर महात्मा, पतयो मरीच्यादयस्तान्सृष्ट्वा तथा | जिस प्रकार इसने पूर्वकल्पमें मरीचि यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सृष्टवानीशः | आदि जो लोकाध्यक्ष हैं उन्हें रचा सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ | था उसी प्रकार पुनः रचकर उन | सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ किञ्च— | तथा— सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्य- क्प्रकाशयन्भ्राजते यद्दनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४॥ भाष्यकारने इसका कोई अर्थ नहीं किया । श्रीशङ्करानन्दजी लिखते हैं—'जालं महेन्द्रजालं संसाररूपं प्रतिप्राणिव्यवस्थितमित्यर्थः' अर्थात् 'जाल शब्दका तात्पर्य है प्रत्येक प्राणीसे सम्बन्ध रखनेवाला संसाररूप महान् इन्द्रजाल ।' श्रीनारायणतीर्थ कहते हैं—'जालं कर्मफललक्षणं बन्धम्' अर्थात् 'कर्मफलरूप बन्धन ही जाल है ।' तथा विज्ञानभगवान्का कथन है—'जालं समष्टिरूप कार्यकारणलक्षणानि जालानि पुरुष- मत्स्यानां बन्धनत्वाज्जालवज्जालम्' अर्थात् 'समष्टिरूप भूत और इन्द्रियवर्गरूप जाल ही पुरुषरूप मत्स्योंको बाँधनेवाले होनेसे जालके समान जाल हैं ।'