भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 276 में से

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पृष्ठ 222

२०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ जिस प्रकार सूर्य प्रकाशित होता है वैसे ही यह ऊपर, नीचे तथा इधर-उधर समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है । इस प्रकार वह द्योतनस्वभाव सम्भजनीय भगवान् अकेला ही कारणभूत पृथिवी आदिका* नियमन करता है ॥४॥

[संस्कृत-भाष्यम्] सर्वा दिश इति । सर्वा दिशः प्राच्याद्या ऊर्ध्वमुपरिष्टादधश्चा- धस्तात्तिर्यक्पार्श्वदिशश्च प्रकाशयन् स्वात्मचैतन्यज्योतिषा प्रकाशते भ्राजते दीप्यते ज्योतिषा यदु अनड्वान्यद्वदादित्यर्थः । यथानड्- वानादित्यो जगच्चक्रावभासने युक्त एवं स देवो द्योतनस्वभावो भगवानैश्वर्यादिसमन्वितो वरेण्यो वरणीयः संभजनीयो योनिः कारणं कृत्स्नस्य जगतः स्वभावान् स्वात्मभूतान्पृथ्व्यादीन्भावानथ वा कारणस्वभावान्कारणभूतान्पृ- थिव्यादीनधितिष्ठति नियमयति । एकोऽद्वितीयः परमात्मा ॥४॥

[हिन्दी-अनुवाद] ‘सर्वा दिशः’ इत्यादि। यह पूर्वादि समस्त दिशाओंको अर्थात् ऊपर- नीचे और इधर-उधरकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ अपने स्वरूप- भूत चित्प्रकाशसे भ्राजित् यानी दीप्त होता है जैसे कि अनड्वान् । और जिस प्रकार कि अनड्वान् यानी सूर्य जगच्चक्रको प्रकाशित करनेमें लगा हुआ है उसी प्रकार वह देव— द्योतनस्वभाव, भगवान्--ऐश्वर्यादि- सम्पन्न और वरेण्य—वरणीय— सम्भजनीय योनि यानी कारण एक अद्वितीय परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के स्वभाव यानी स्वात्मभूत पृथिवी आदि भावोंको [ अधिष्ठित करता है ] । अथवा [ ‘योनिखभावान्’ ऐसा समस्त पद माना जाय तो ] कारण- स्वभाव यानी कारणभूत पृथिवी आदिको अधिष्ठित–नियमित करता है ॥४॥

[पाद-टिप्पणी]

  • यह अर्थ मूलपाठ ‘योनिखभावान्’ मानकर किया गया है, जहाँ मूलमें ‘योनिः स्वभावान्’ ऐसा पाठ है वहाँ ‘योनिः’ शब्द भगवान्का विशेषण होगा और ‘स्वभावान्’ का अर्थ ‘स्वात्मभूतान् पृथिव्यादीन् भावान्’ ( अपने स्वरूपभूत पृथिवी आदि भावोंको ) होगा ।