श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 223, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 223
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ जगत्का कारणभूत जो परमात्मा [ प्रत्येक वस्तुके ] स्वभावको निष्पन्न करता है, जो पाच्यों ( परिणामयोग्य पदार्थों ) को परिणत करता है, जो अकेला ही इस सम्पूर्ण विश्वका नियमन करता है, और जो [सत्त्वादि] समस्त गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है [ वह परब्रह्म है ] ॥५॥
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यच्च स्वभावमिति । यच्च | 'यच्च स्वभावम्' इत्यादि । [ यहाँ |
| यश्चेति लिङ्गव्यत्ययः । स्वभावं | वैदिक-प्रक्रियानुसार ] 'यश्च' इस |
| यदग्नेरौष्ण्यं पचति निष्पादयति | पुँल्लिङ्गके स्थानमें 'यच्च' इस प्रकार |
| विश्वस्य जगतो योनिः । पाच्यांश्च | लिङ्गव्यत्यय हुआ है। जो स्वभावको |
| पाकयोग्यान्पृथिव्यादीन्परिणाम- | यानी अग्निके उष्णत्वको पचाता-निष्पन्न |
| येद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठति | करता है, विश्व-जगत्का कारण है |
| नियमयत्येकः । गुणांश्च सत्त्वरज- | और पाच्य यानी पाक (परिणाम) योग्य |
| स्तमोरूपान्विनियोजयेद्यः । एवं- | पृथिवी आदिका परिणाम करता है, |
| लक्षणः ॥५॥ | जो अकेला इस सम्पूर्ण विश्वको |
| अधिष्ठित—नियमित करता है तथा | |
| जो सत्त्व, रज एवं तमोरूप गुणोंको | |
| नियुक्त करता है—ऐसे लक्षणोंवाला | |
| परमात्मा है ॥५॥ |
किञ्च— | तथा— तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् ।