भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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भुवनकोशः ३१ आरामा उद्यानानि । निग्रामाः प्रसिद्धाः । गाराणि च । चैत्यं बौद्धदेवायतनम् । एतेषां समुदायैश्चितो व्याप्तोऽस्ति । ननु चेतनपदार्थाः स्वप्रलयैरपि यथाकथंचिद्भूगोले सर्वत्र स्थितिं कर्तुं समर्था नाचेतनपदार्थाः । पर्वतवृक्षादयस्तिर्यगूर्ध्वाधोभागे स्वव्यापाराभावेन कथं स्थिता इत्याशङ्कावारणाय दृष्टान्तमाह—कदम्बेत्यादि । केसरसमुदायैः कदम्ब- पुष्पग्रन्थिः समन्ताद्व्याप्ता । यथा कदम्बपुष्पग्रन्थावधस्तिर्यक्समन्तात्केसराणि स्थितानि तथैवास्मिन्पर्वतादिकं तिर्यगूर्ध्वाधोभागस्थितमस्तीति शङ्कावकाशो नेति भावः ॥३॥ केदारदत्तः—भूमि स्वरूप—मिट्टी, वायु, जल, आकाश और तेजो मय भूमि पिण्ड चन्द्रमा, बुध, शुक्र सूर्य मंगल बृहस्पति शनि और नक्षत्रों की कक्षाओं से आवृत्त है । पृथ्वी किसी आधार पर आधारित न होकर स्वयं अपनी शक्ति से आकाश में संस्थित है । भूपृष्ठ में चारों तरफ मानव दानव वन उपवन आदि सुशोभित हैं । पृथ्वी चारों तरफ उद्यान ग्राम नगर, देवस्थान आदि से व्याप्त है । जैसे कदम्बपुष्प ग्रन्थि के चारों तरफ केसर संस्थित हैं तद्वत् इस पृथ्वी में पर्वतादिक भी ऊपर नीचे सीधे खड़े हैं । प्राचीन आचार्यों का भू केन्द्राभिप्रायिक कक्षा वर्णन की तरह अर्वाचीन आचार्यों के सूर्य के केन्द्राभिप्रायिक कक्षा वर्णन से ग्रह गणित में किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ता है ॥२-३॥ इदानीं पुराणेषु भूमेराधारपरम्परा या पठिता तां निराकुर्वन्नाह— मूर्तो धर्त्ता चेद्धरित्र्यास्ततोऽन्यस्तस्याप्यन्योऽस्यैवमत्रानवस्था । अन्त्ये कल्प्या चेत्स्वशक्तिः