सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ गोलाध्याये वारणाय । अन्त्ये । पुरा पुराणसंमतान्तिमाधारे वराहे स्वशक्तिः । अन्तरिक्षावस्थानरूपा कल्प्येति चेद्वदसि तर्ह्याद्ये ऽत्राधारे शेषे किं कथं ना कल्प्या । देहलीदीपन्यायेनाग्रिमस्य नोकारस्यान्वयात् । वराहे शक्तिकल्पनायाः शेषशक्तिकल्पनस्य लघुभूतत्वेन शेष एव स्वशक्तिः कल्प्यतामित्याधागधारयोः कूर्मवराहयोर्व्यर्थत्वापत्तेः । नन्विष्टापत्तिः । पुराणोक्ताधाराणां भूमेर्निराधारत्वनिवारकत्वेन भूम्याधारनिर्णायकत्वतात्पर्यादित्यत आह—किमिति । शेषेऽन्तरिक्षावस्थानशक्तिः कल्प्यते तर्हि भूमेः किं कथं नो साऽन्तरिक्षा- वस्थानशक्तिः कल्प्या । अतिलाघवात् । भूमेरेवान्तरिक्षावस्थानशक्तिः कल्प्यताम् । शक्तेः प्रत्यक्षावगम्यत्वानियमस्य त्वदुक्त्यैवासिद्धेरित्यर्थः । तथा च भूमेर्मूर्त्तौ नाऽऽधारः । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमामिति श्रुतिप्रामाण्येनेश्वरस्य जगदाधारत्वेन चामूर्तेश्वराधारत्वं भूमेर्नान्याधार इत्यनेनाङ्गीकृतं तत्तु निराधारतुल्यमेवेति भावः । ननु शेषादीनामीश्वरांश- तयाऽन्तरिक्षावस्थानशक्तिकल्पनं युक्तम् । भूमेस्तदभावादयुक्तं शक्तिकल्पनमित्यत आह— अष्टमूर्तेरिति । चकारात्सा भूमिरष्टमूर्तेः पृथिवीजलाग्निवाय्वाकाशसूर्यचन्द्रयजमानात्म- कस्य महेश्वरस्य मूर्तिः शरीरम् । तथा च भूमेरीश्वरमूर्तित्वादन्तरिक्षावस्थानशक्तिकल्पनं युक्तमेवेति भावः । एतेन जले भूमिगोलस्तुम्बिकावत्तरतीति यवनमतमपास्तम् । सलिले विलयो मृदो भवेदिति गोरप्सु न युज्यते स्थितिः । अथ पात्रगतेति तत्कथं न भवेद्या- वदिलेव पार्थिवम् । यदि वाऽम्भसि संस्थिता मही सलिलं तत्क्व वदप्रतिष्ठितम् । गुरुणोऽम्भसि चेत्स्थितिर्भवेत्क्षितिगोलस्य न किं विहायसि । इति लल्लोक्तेर्भूमाविदं जलेमिति सार्वजनीनप्रतीतेर्भूमिजलयोराधाराधेयभावप्रसिद्धेश्च ॥४॥ केदारदत्तः—पृथ्वी वस्तुतः अपने अक्ष में यथा स्थान और ग्रहों की तरह आकाश में स्थित है। पृथ्वी अपनी ही शक्ति से अपने स्थान पर स्थित है। यदि पृथ्वी को धारण करने वाला कोई शक्ति विशेष अन्य पदार्थ माना जाय तो उस पदार्थ को धारण करने वाला कोई और पदार्थ होना चाहिए इस प्रकार की कल्पनाओं में (धारक एवं धार्य पदार्थों की स्थिति) अनवस्था दोष स्वयं उत्पन्न हो जाता है। अन्ततः धार्यधारक पदार्थों की कल्पना में आदि और अन्त का मान हो नहीं हो सकता है तो कहना पड़ता है पृथ्वी को धारण करने वाला कोई है उसको धारण करने वाला अन्य शक्ति पिण्ड है उसका भी धारण करने वाला वह अन्य पिण्ड है इस प्रकार कहाँ तक क्या कहा जावेगा अन्त में कहना पड़ेगा कि वह जो अन्तिम पिण्ड है वह अपनी शक्ति से आकाश में स्थित है तो इस प्रकार की कल्पना से तो अच्छा यही होगा कि पृथ्वी आकाश में अपने कक्ष पर अपनी शक्ति से स्थिर है, अर्थात् यहाँ आधाराधेय कल्पना अनावश्यक है । इसो अभिप्राय से हमारे पुराणाचार्यों ने शक्ति विशेष का नाम शेषनाग, कहते हुये पृथ्वी को शेष नाग ने अपने शिर में धारण किया है जो आकाश में यथा स्थान अनन्तकाल से अनन्त काल तक स्थिर रही है रहेगी। पृथ्वी का धारक कोई अन्य आधार नहीं है अपनी ही शक्ति से पृथ्वी आकाश में यथा स्थान स्थित है।