सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० गोलाध्याये भपञ्जरस्य भ्रमणावलोकादित्याद्यर्धस्य विरोधापत्तेः । न च मतद्वयं बौद्धभेदाद्भिन्नमिति वाच्यम् । भूस्थितिप्रसङ्गे पूर्वमतप्रतिपादनस्य युक्तत्वेऽपि द्वितीयमतप्रतिपादनस्यात्रासंगत- त्वापत्तेः । अग्रे मध्यगतिवासनायां तन्मतोक्तेः संगतत्वाच्च । ननु युक्त्यनुभवसिद्धबौद्ध- मतात्समे समन्तात् पतत्वियं ख इति भवन्मतमनुभवविरोधादयुक्तमित्यत आह— ब्रवीमीति । अतोऽनुभवविरोधात् । तान्बौद्धान् प्रति युक्तियुक्तं दूषणं समनन्तरमेवाहं वदामि । तेषां मतमनुभवविरोधादयुक्तमस्मन्मतमुक्तरीत्याऽनुभवाविरुद्धमुक्तमेवेति भावः ॥८॥ केदारदत्तः—पृथ्वी आधार शून्य है—नक्षत्र चक्र की भ्रमणशीलता प्रत्यक्ष दृश्य है कि अपने दृश्य क्षितिज में उदित कोई भी नक्षत्र हो, ६० घटी अर्थात् २४ घण्टे में उस नक्षत्र का क्षितिज में प्रत्यक्ष द्वितीय उदय देखा जाता है । यदि पृथ्वी को धारण करने वाला पृथ्वी के नीचे कोई पदार्थ या बिम्ब होता तो वह पदार्थ, नक्षत्र चक्र के भ्रमण में बाधक होता और नक्षत्र चक्र के भ्रमण में अवश्य व्यवधान करता । इसलिए नक्षत्रचक्र की दैनन्दिन परिभ्रमणशीलता जो प्रत्यक्ष दृश्य हो रही है, इस प्रत्यक्षता से स्पष्ट है कि पृथ्वी आधारशून्य है । अर्थात् आकाश में यथा स्थान स्थित है । बौद्ध दार्शनिकों का मत है कि आकाश में कोई भी गुरु पदार्थ स्थिर न रह कर बराबर नीचे गिरता रहता है । कल्पना कीजिए कि किसी ऊँची जगह आकाश से एक पत्थर जमीन में गिरा, वह पत्थर जमीन में कैसे गिरा ? क्योंकि पत्थर में तो कोई गति नहीं है तो कहना उचित होगा कि पृथ्वी ने पत्थर को अपनी तरफ खींच लिया, ठीक है पृथ्वी के आकर्षण ने पत्थर को अपने में मिला दिया । अब पृथ्वी को भी आकाश में जो एक पत्थर की अपेक्षा अत्यधिक महान शक्ति सम्पन्न पत्थर की तरह से है तो निरन्तर आकाश में गिरते रहना चाहिए, क्योंकि पृथ्वी के नीचे मात्र आकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, अर्थात् पृथ्वी का कोई आधार नहीं है । इत्यादि विचार से बौद्ध सम्प्रदाय का यह मत युक्ति युक्त सा लगता है कि पृथ्वी निरन्तर आकाश में नीचे गिर रही है इत्यादि । बौद्धों की इस कल्पना का खण्डन श्री भास्कराचार्य बहुत सरल युक्ति से कर रहे हैं कि यदि पृथ्वी प्रतिभ्रमण आकाश में नीचे गिर रही है तो उस पूर्व कथित पत्थर का पृथ्वी से संयोग नहीं होना चाहिए क्योंकि पत्थर के आकाश से नीचे गिरने की गति (वेग) पृथ्वी के नीचे गिरने के वेग से अत्यन्त न्यून है । पृथ्वी और पाषाण के अनन्त अधिक अन्तर में होने से पत्थर और पृथ्वी का आपस में संयोग होना असम्भव है, किन्तु हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि पत्थर का भूमि से संयोग हो गया है अतः बौद्धाचार्यों का उक्त कथन कि "निरन्तर पृथ्वी आकाश में नीचे गिरती जा रही है" सुतरां गलत है यह बौद्धों का भ्रम है । अतः बौद्धों का उक्त कथन कि "पृथ्वी निरन्तर आकाश में नीचे गिरती जा रही है" यह तथ्य से बाहर है, और भ्रम ही भ्रम है ।