सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभुवनकोशः ४१ तथा यदि पृथ्वा निरन्तर आकाश में गिरती जा रही है तो एक सूर्योदय के अनन्तर २४ घण्टा = ६० घटी—में दूसरे सूर्योदय का दिखाई देना असम्भव होगा, यह बात बौद्धों की बुद्धि में भी आ गई, इसलिये "पृथ्वी का निरन्तर आकाश में अधोःपतन कथन गलत होगा" ऐसा समझ कर ही बौद्धों ने तथा अनम्बरादि जैनों ने कल्पना की कि, आकाश में दो सूर्य, दो चन्द्रमा २७ x २ = ५४ नक्षत्र तथा समस्त ग्रह मण्डल की दृष्टिगत उपलब्धि को द्विगुणित सिद्ध करने की चेष्टा करते हुए, आज जिस सूर्य का उदय हुआ है कल इस सूर्य का उदय नहीं हो सकेगा क्योंकि स्थिर पृथ्वी पृष्ठ से आज के सूर्य केन्द्र तक की दूरी पृथ्वी के आकाश में गिरते रहने से द्विगुणित हो जावेगी अर्थात् अद्यतन सूर्य का उदय अग्रिम दिन नहीं होगा, सदा रात्रि की स्थिति हो जावेगी जो प्रत्यक्षतः असम्भव है। क्योंकि दूसरे दिन भी सूर्योदय देखा जाना प्रत्यक्ष है तब कैसे माना जाय कि पृथ्वी निरन्तर आकाश में गिरती जा रही है, इत्यादि यह विरोध सही समझ कर बौद्धों ने पुनः कल भी जो सूर्योदय हो रहा है वह आज का सूर्य बिम्ब नहीं है वह आज के सूर्य बिम्ब से भिन्न इसी प्रकार का दूसरा सूर्य है, इत्यादि दो सूर्य दो चन्द्र की जो दोषपूर्ण कल्पना को थी उस का श्रीभास्कराचार्य जोरदार शब्दों में युक्ति युक्त खण्डन कर रहे हैं ॥७॥८॥ इदानीं तेषां युक्तिभङ्गमाह— भूः खेऽधः खलु यातीति बुद्धिर्बौद्ध मुधा कथम् । जाता यातं तु दृष्ट्वाऽपि खे यत्क्षिप्तं गुरु क्षितिम् ॥९॥ वा० भा—यदि भूरधो याति तदा शरादिकमूर्ध्वं क्षिप्तं पुनर्भुवं नैष्यति । उभयोरधो गमनात् । अथ भूमेर्मन्दा गतिः शरादेः शीघ्रा । तदपि न । यतो गुरुतरं शीघ्रं पतति । उर्व्यतिगुर्वी । शरादिरतिलघुः । रे बौद्धैवं दृष्ट्वाऽपि भूरधो यातीति बुद्धिः कथमियं तव वृथोत्पन्ना ॥९॥ मरीचिः—अथ प्रतिज्ञातं विवक्षुस्तावत्पूर्वप्रतिपादितं भूम्यधोगमनात्मकं बौद्धमतम- नुष्टुभा खण्डयति—भूः ख इति । हे बौद्ध स्वीकृतप्रत्यक्ष ख आकाशे क्षिप्तं यद्गुरु वस्तु । तुकारात्तत् । भूमिं प्रति यातमागतं दृष्ट्वा भूराकाशेऽधो याति गच्छतीति प्रागुक्ता बुद्धिस्तव मुधा व्यर्था निर्हेतुका कथं जातोत्पन्ना । अपिशब्दादुत्क्षिप्तं गुरु वस्तु नो भूमिसंयोगानिश्चये भूम्यधोगमनं वक्तुं तव संभावितम् । तन्निश्चये तु प्रत्यक्षप्रमाणं बाधकमधोगमनस्येत्यर्थः । तथा च लघु- पतनापेक्षया गुरोः शीघ्रं प्रपात इति प्रत्यक्षसिद्धानुभवाद्भूमेरधोगमनं त्वदुक्तमयुक्तम् अन्यथा भूमेरतिगुरुत्वादतिशीघ्रपतनादुत्क्षिप्तगुरुतरवस्तुतस्तस्तल्लघुत्वेन मन्दपतनादुत्क्षिप्त- गुरुवस्तुनो भूमावपतनापत्तेः । न च भूमौ स्थिरत्वनिर्वाहिकाकृष्टिशक्तिर्भवत्कल्पितैत- दोषनिवारणार्थं स्वीक्रियत इति वाच्यम् । प्रथमं ब्रह्माण्डमध्याकाशे स्थापिताया भूमेर-