सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभुवनकोशः ५१ पृथ्वीपरिधि / ९६ यह चाप सीधा नजर आने से हम लोग गोलाकार पृथ्वी को सरल सीधा समझते हैं। जैसे किसी हथ गोले में चींटी चल रही है या किसी छोटे गेंद अनार अंगूर- आम के दाने में चींटी चल रही है या अत्यन्त लघु पदार्थ सरसों या राई आदि का बीच भी छोटे से छोटे गोल में अतिसूक्ष्म जीव भी स्थिर रहते हैं उसी प्रकार विशाल भूगोल परिधि में मानव पशु पक्षी, नगर, जंगल पहाड़ यथास्थान स्थित हैं जो स्पष्ट हैं। [चित्र: वृत्त, केन्द्र 'के', परिधि पर बिन्दु 'अ' और 'क'] अ विन्दु से पृथ्वी पृष्ठ का क बिन्दु जिसे चापाकार में अ क प्रदेश कहते हैं वह प्रदेश ३६०° / ९६ इस अंशात्मक प्रदेश का सूक्ष्म कलात्मक भाग = ३६० × ६० / ९६ = २१६०० / ९६ = २२५ कलात्मक चाप और सरल रेखा में अभेद होने से हमारी दृष्टिगत पृथ्वी का सूक्ष्म गोल प्रदेश भी सरल सोधी जमीन की तरह दिखाई देता है। वस्तुतः पृथ्वी का यह एक अ क चाप खण्ड, यह गोल एक गोलाकार होते हुये भी सरल सीधा मैदान सा दीखता है ॥१३॥ विषुवद्वृत्त (भूमध्य रेखा) धरातलगत भूपृष्ठ देशों में अक्षांश का अभाव है। उत्तर ध्रुव या दक्षिण ध्रुव स्थान से ९० अंश चाप से क्रियमाणवृत्त का नाम विषुवद्वृत्त या भूमध्य रेखावृत्त होता है। अपने देश से विषुवद्वृत्त धरातलीय भूपृष्ठ देश उत्तर या दक्षिणध्रुवाभिमुख होने से वहाँ उसे साक्ष देश या अक्षांशीय प्रदेश कहेंगे। दोनों खमध्यों और दोनों ध्रुवों पर गये हुये वृत्त का नाम स्वदेशीय याम्योत्तर वृत्त कहा जाता है। जहाँ अक्षांश नहीं होते उसे निरक्ष देश और उसके खमध्य का नाम निरक्ष खमध्य कहा जाता है। बाँस का खगोल व गोल बनाइये उस गोल के मध्य में उस माप की पृथ्वी का केन्द्र स्थापित कर एक पृथ्वी गोल बिम्ब वहाँ करिये। सिद्धान्तमर्मज्ञ खगोलज्ञ गुरु मुख और क्रिया से ही यह विषय स्पष्टतया समझ में आवेगा। वेध से इस प्रकार किसी नगर का उत्तर या दक्षिण अक्षांश ज्ञान कर उस नगर के उससे उत्तरीय या दक्षणीय अक्षांशों का ज्ञान करिये। तब दोनों नगरों के अक्षांशों का