सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ गोलाध्याये अन्तर मान मानिये 'अ' अक्षांशान्तर है । तथा दोनों नगरों की दूरी आधुनिक माप से, मीलों या किलोमीटरों में समझ कर उस दूरी का मान मानिये “क” है । तब इसी भास्कराचार्य से विरचित पाटीगणित (अंक गणित) लीलावती नामक ग्रन्थ के त्रैराशिकानुपात करिये कि यदि “अ” में दोनों नगरों की दूरी का मान 'क' मिलता है तो एक नगर से दूसरे नगर तक की परिधि के ३६० अंशों में भूपरिधि का मान यथेष्ट मान में क्या होगा ? वह भूपरिधि का अभीष्ट माप में मान हो जाता है । उक्त अनुपात संक्षेप करने के लिये निम्न भाँति लिखा जाता है, अतएव अनुपात परम्परा जहाँ भी होगी विद्यार्थियों को उसे निम्न भाँति लिखना चाहिए । दोनों नगरों के अक्षांशान्तर = अ दोनों नगरों की मापित दूरी = क क ३६०° अतः ————— = भूपरिधि का अभीष्ट माप में मान होता है । अ [चित्र:] याम्योत्तर वृत्त उ.ध्रुव इष्टनगर ल इष्ट नगर काशी का अधोखमध्य क काशी का ऊर्ध्व खमध्य अधोनिरक्षखमध्य अ ऊर्ध्व निरक्ष विषुवद्वृत्त नि द.ध्रुव अ ल - अ क = क ल = अक्षांशान्तर दो नगरों की याम्योत्तर वृत्त में दूरी क ल चाप का अभीष्ट मान दूरी = क उत्तर ध्रुव से दक्षिण ध्रुव तक की याम्योत्तर वृत्तीय अर्ध परिधि = १८० पूर्ण- परिधि अंश = १८० × २ = ३६०° क × ३६०° ———————— = भूपरिधि अल ध्यान देने की बात है दोनों देशों का खमध्य एक याम्योत्तर में होने से यही स्पष्ट भूपरिधि भी कही जावेगी ॥१४॥