भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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भुवनकोशः ५९ नगरी और पश्चिम क्षितिजिय भू खमध्य में रोमकपत्तन नाम की नगरी, एवं इसी विषुवद्वृत्त धरातल के अधो भूगोल खमध्य में सिद्धपुर नाम का नगर, एवं भू निरक्ष खमध्य गत लंका नगरी से नब्बे उत्तरदक्षिण में ९० अंश दूरी पर उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव स्थित हैं। आचार्य को यहां पर पौराणिक मत के साथ सहमत होना पड़ रहा है, दक्षिण ध्रुव न कहकर बड़वानलः बड़वानलस्थाने नरकाः, पुराणप्रसिद्धाः पापपुरुषदाहकाः सदैत्या दैत्यसहिता दैत्या अपीत्यर्थः आचार्य इसका नाम दक्षिण बड़वानल कह रहा है । इस प्रकार भूपृष्ठ के निरक्ष स्थान अर्थात् अक्षांश शून्य स्थान, और साक्ष अक्षांश सत्तायुक्त नगर की स्वदेशीय भूपरिधि स्थान से प्रत्येक ९० अंश की दूरी पर (१) अपना नगर ग्राम, (२) अपने स्थान से पूर्व का नगर, (३) पश्चिम का नगर और (४) अपने नगर से १८०° की दूरी पर अधो खमध्य के नगर के साथ उत्तर में (५) भूपृष्ठगत ध्रुव बिन्दु और नीचे (६) भूपृष्ठगत दक्षिण ध्रुव विन्दु सिद्ध होते हैं । जैसे क्षेत्र दर्शन से स्पष्ट होता है— निरक्षखमध्य रोमकपत्तन उ. ध्रु. द. ध्रु. यम कोटि सिद्धपुर युग महायुग, कल्प कल्पान्तर के दीर्घसमयों में पृथ्वी में होते आ रहे परिवर्तनों से समुद्र की जगह स्थल, स्थल की जगह समुद्र हिमालय जैसे पहाड़ की समुद्र गत स्थिति इत्यादि प्राकृतिक परिवर्त्तनों के होते रहने से, पृथ्वी के कितने नगर देश ध्वस्त हो गये और अनेक नये नगर देशों का निर्माण होता जा रहा है । तदनुसार वर्त्तमान की भौगो- लिक स्थिति के अनुसार—भूमध्य रेखा गत स्थानों के नाम निम्न भांति है । मलएशिया में Bormes Singpus. उत्तर मेरु (ध्रुव) में देव योनि दक्षिण ध्रुव में दैत्यों का निवास है ।