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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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९८ गोलाध्याये केदारदत्तः—आचार्य द्वारा यहाँ वृत्त फल, गोल पृष्ठ फल एवं गोलघन फल साधन का सही गणित बताया जा रहा है— किसी गोल पदार्थ की परिधि का आधा तुल्य व्यास मान कल्पना के तुल्य कोई वस्त्र (कपड़े का टुकड़ा) से उस गोल को ढक देने से वस्त्र से आधा गोल के ढांके जाने पर भी वस्त्र में वस्त्र का कुछ अंश शेष रह जाता है। इस प्रकार गोलव्यास के वृत्तक्षेत्रफल से वस्त्र का क्षेत्रफल २ १/२ = ५/२ के तुल्य होता है। इस प्रकार एक गोल का अर्द्धपृष्ठ फल को द्विगुणित कर देने से ५/२ × २ = ५ गुणित वस्त्र क्षेत्रफल = गोल पृष्ठफल सिद्ध होता है तो लल्लाचार्य ने “वृत्तफलं परिधिघ्नं समन्ततो भवति गोलपृष्ठफलम्” वृत्तफल को परिधि से गुणा करने से गोल का पृष्ठ फल हो जाता है, इत्यादि गणित कैसे कह दिया है ? लल्लाचार्य के गोलपृष्ठ फल साधन की त्रुटि प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रही है। आचार्य युक्तिपूर्वक गोलपृष्ठ फल साधनप्रकार स्वयं बता रहे हैं कि—किसी भी वृत्त की ३६० अंशों में ३६० × ६० = २१६०० की कलात्मक परिधि होती हैं। शाकल्य संहिता में “वृत्तस्य षण्णवत्यंशो दण्डवत्परिदृश्यते” किसी भी वृत्त की परिधि का सूक्ष्म विभाग अर्थात् कम से कम ९६वाँ विभाग चापाकार न होकर सरल रेखाकार होता है। अतः २१६०० ÷ ९६ = २२५ कला चाप और कला चाप की ज्या में अभेद हो जाने से एक वृत्तपाद की २१६०० ÷ ४ = ५४०० कलाओं के ५४०० ÷ २२५ = २४ ज्याखण्ड होते हैं। अतः प्रत्येक चाप खण्ड का व्यास = २२५, अन्तिम वृत्त की व्यासार्ध रेखा = ३४३८ इस प्रकार (ज्यार्ध खण्ड × २१६००) / (त्रि = ३४३८) प्रथमादि २४ वृत्त होते हैं। प्रत्येक वृत्तों के मध्य में एक वलयाकार क्षेत्र होता है। इस प्रकार के २४ वलय एक-एक गोलपृष्ठ में होते हैं। २२५ कला से कम सूक्ष्म चाप और ज्या के अभेद कल्पना में २४ की जगह यथेष्ट ज्या कल्पनया अनेक कल्पित संख्या तुल्य वलय क्षेत्र होंगे। इस प्रकार के २४ चतुर्भुजों के आकार में प्रथमादि....चतुर्विंशति ज्यार्ध खण्ड = लम्ब, ऊर्ध्व वलय = मुख अधो वलय = आधार “लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्” आचार्य के इसी प्रथम लीलावती गणित ग्रन्थ के सूत्र से ((मुख + आधार) / २) लम्ब = वलय क्षेत्रफल इस प्रकार के सभी वलयों के क्षेत्र फलों का योग गोलार्ध पृष्ठ फल होता है। अर्द्धगोल पृष्ठफल × २ = समग्र गोल पृष्ठ फल = व्यास × परिधि के तुल्य ही गोल पृष्ठ फल युक्ति और उपपत्ति से सिद्ध हो रहा है तो गोल पृष्ठ फल = व्यास + परिधि इस सही गणित की जगह वृत्तफल × परिधि = गोल पृष्ठफल कैसे माना जाय ?

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