सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यगतिवासना १२५ जातकशास्त्रे पुरुषाकारग्रहस्वरूपोक्तिः संगच्छते। तस्मात्पश्चिमदिग्गतिवायुप्रवहनिबद्धे भपञ्जरे शीघ्रम्। भ्रमति खखचरे सत्यपि खेटा गतितः प्रयान्ति पूर्वदिशमिति वृद्धवसिष्ठो- क्तेश्च। यान्तो भचक्रे लघुपूर्वगत्या खेटा इति न किंचदप्यनुपपन्नमिति वदन्तीत्यलं पल्लवितेन ।।४।। केदारदत्तः—ग्रहों की पूर्वाभिमुखी गति यदि दृष्ट नहीं होती तो कैसे समझा जाय कि ग्रहों में गमनशीलता अर्थात् गतिशीलता है, यह बात दृष्टान्त से स्पष्ट की जा रही है— पश्चिमाभिमुख गति की कुम्हार की चक्की में बैठा हुआ एक अत्यन्त लघु कीट जो पूर्व- गति से चक्की के पाटल में भ्रमण कर रहा है किन्तु द्रष्टा लोगों की दृष्टि में कीट की गति का कुछ भी आभास तक नहीं हो पाता है, मात्र चक्की का भ्रमण ही दृष्टिपथ में होता है उसी प्रकार निरन्तर पश्चिमाभिमुख भ्रमणशील भचक्र में नक्षत्र मण्डल युक्त ग्रह कक्षा स्थित ग्रह जो अपनी गति से पूर्व की ओर चल रहा है नक्षत्र मण्डल में अति अधिक वेग होने से भी गमनशील नक्षत्रमण्डलस्थ ग्रह की भी गति दृष्टिगोचर नहीं हो सकती है । विशेष युक्ति या उपपत्ति—वर्तमान में उपलब्ध सूर्य सिद्धान्त के मध्यमाधिकार में “ग्रहों की प्राक् पूर्व की गति कैसे ज्ञात हुई ?” “ग्रह पूर्वाभिमुख चल कर भगण भोग करते हैं” इस विषय पर विशेष युक्ति सूर्य सिद्धान्त ने बताई है, जैसे— “पश्चाद् व्रजन्तोऽपिजवान्नक्षत्रैः सततं ग्रहाः” (सूर्य सिद्धान्त) इस प्रसंग में अनेक ग्रहवेध यन्त्रों के द्वारा की गई ग्रहवेध प्रक्रिया ही प्रामाणिक होती है । उपपत्ति—भूपृष्ठीय अपने पृष्ठ स्थान से सूर्योदय के समय में क्षितिज में किसी नक्षत्र और ग्रह का एक ही समय में अस्त देखा गया । दूसरे दिन के सूर्यास्त के समय में नक्षत्र के अस्त के अनन्तर सूर्यास्त देखा गया या उक्त नक्षत्र के अस्त के अनन्तर उक्त ग्रह का अस्त देखा गया । तो इससे सिद्ध हुआ कि नक्षत्र अपनी ही जगह पर स्थिर है और ग्रह पूर्व- दिनीय अपने स्थान से पूर्व की ओर चलायमान होने से नक्षत्रास्त के अनन्तर ही ग्रह का अस्त देखा गया है। यह वेध सूर्योदय काल में भी किया गया तो दूसरे दिन नक्षत्र के उदय के पश्चात् ही ग्रह का उदय देखे जाने से प्रत्यक्षतः सिद्ध होता है कि ग्रह अपनी गति से पूर्व की ओर चला गया। सिद्ध हुआ कि आकाश में दृश्यमान नक्षत्र यथास्थान भचक्र के साथ भ्रमण करते हैं किन्तु नक्षत्र बिम्बों से सम्बन्धित गतिमान ग्रह पिण्ड पूर्वाभि- मुख चलते हैं। अतः गतिमान बिम्बों को ग्रह और अचल तेज पुञ्ज तारा बिम्ब का नाम नक्षत्र कहा गया है।