भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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१४६ गोलाध्याये मे. स्था वृ कदम्ब तारा ० स्था' मि. ध्रुव तारा स्था'' क. क्षेत्र देखिये । मे वृ मि क = क्रान्तिवृत्त या राशि वृत्त । मे स्था स्था' स्था'' = विषुवद्वृत्त । मे वृ = मेष राशि की कलाएँ = १८०० मे स्था = मेष राशि के उदय असु = १६७० इसी प्रकार मे मि = मे वृ = वृ मि प्रत्येक की कला १८०० तथा वृ मि० के विषुवांश = असु १७९५ तथा मे क — मे मि = मि. क. = मिथुन की कला १८०० एवं स्था' स्था'' = मिथुन राशि के असु १९३५ पदान्त में तीनों राशियों की कलायें = १८०० + १८०० + १८०० = ५४०० ,, ,, ,, ,, का असुमान = १६७० + १७९५ + १९३५ = ५४०० इससे सिद्ध होता है कि पदादि पदान्त में उदयान्तर का अभाव पदमध्य में उदयान्तर का परमत्व होता है । मध्य सावन मान के अहर्गण से ६० घटी + मध्यमगति कला के सावन दिन और स्पष्ट सावन प्रतिक्षण चल होने से ६० घटी + स्पष्ट रविगति उत्पन्न काल फल में अन्तर स्पष्ट हैं । अत एव मध्यम सावन अहर्गण से साधित ग्रह निरक्ष क्षितिज में न होकर आचार्य ने "क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः" गणिताध्याय में उदयान्तर गणित का दिग्दर्शन कराते हुये, इस ग्रन्थ के इस गोलाध्याय में यहाँ पर उदयान्तर गणित साधनिका स्पष्ट कर दी है । भास्कराचार्य के पूर्ववर्त्ती ग्रह गणित सिद्धान्त मर्मज्ञों का ध्यान इस दिशा में नहीं गया या अत्यन्त स्वल्पान्तर से यह उदयान्तर गणित उपेक्षित हुआ है। वस्तुतः गणित विद्या के वर्षादि मानों में स्वल्पान्तर की उपेक्षा से दीर्घ काल में दृग्गणितैक्यता अन्तर आ जाने स सारा पञ्चाङ्ग कर्म पूर्णरूपेण दोषावह हो जाने का भय रहता है । वस्तुतः जैसा कि आज