सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यगतिवासना १४५ यह उदयान्तर गणित कर्म क्या है— अयनांश युक्त सूर्य स्पष्ट की युक्त राशियों के काल में वर्त्तमान राशि के अंशों को उस राशि के उदयासुओं से गुणा कर ३० से भाग देने से वर्त्तमान राशि तक सायन स्पष्ट सूर्य के भुक्त असु (पलों से अनुपात से पल) होते हैं । इस वस्तु का नाम मध्यमार्क भुक्तासु होता है । नक्षत्र दिनान्त के अन्तर उक्त समय के पश्चात् निरक्ष खमध्य में मध्यम सूर्य का उदय होता है, निश्चित यही सही समय है । अहर्गण से साधित ग्रह नक्षत्र दिनान्त के अनन्तर मध्यम सूर्य के कला तुल्य अधिक काल में निरक्ष क्षितिज में ग्रहों की साधनिका की गई है । यदि राशि की कला १८०० कला का उदयमान उसी राशि के असु १८०० के तुल्य होता तो भी गणित में कोई अन्तर नहीं आता । एक राशि के कलामानों से उत्पन्न असुमानों में विभिन्नता होने से अहर्गण से साधित ग्रह क्षितिज में नहीं होकर कभी क्षितिज के नीचे और कभी क्षितिज के ऊपर ही होगा । इसीलिये जहाँ पर अन्य सभी आचार्यों ने साधित ग्रहों को औदयिक या उदय कालिक शब्द से स्पष्ट किया है, वहाँ पर आचार्य भास्कर ने ग्रह गणिताध्याय में “क्षितिजे, या उदयकाले ग्रहा भवन्ति” ऐसा न कहकर “क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः” से साधित ग्रह उदय के समीप आगे पीछे होते हैं न कि क्षितिज में उदयकालिक होते हैं ऐसा स्पष्ट कहा भी हैं । असुओं और कलाओं से अन्तरित काल का नाम आचार्य ने “उदयान्तर” काल कहा है । उदयान्तर काल से गुणित ग्रह गति में अहोरात्रासु २१६५९ = सावन दिन से भाग देने पर लब्धफल को अहर्गण से साधित मध्यम ग्रहों में धन या ऋण कला से असु अधिक हों तो धन, न्यून हों तो ऋण करने से सही रूप से निरक्ष क्षितिज में ग्रहों का स्थान होने से ग्रह दृक्पथ में आते हैं । यह क्रिया निरक्षोदय मानों से की जाने पर ग्रह का निरक्ष- देशीय ग्रह स्थान ज्ञान स्पष्ट होता है । अब यदि अपने देशीय उदयमान वशेन यह मध्यम ग्रह वश यह कर्म किया गया है तो याम्योत्तरान्तरात्मक चर संस्कार भी ग्रहों में स्वतः हो जाता है । स्पष्टार्कस्वदेशोदय मान से किये गये उक्त संस्कार से देशान्तर भुजान्तर और याम्योत्तरान्तर संस्कार जन्य ग्रह स्वदेशीय क्षितिज में स्वयं दृष्ट हो जाते हैं । पूर्वाचार्यों ने ऐसे उत्तम ग्रह गणित संस्कार की उपेक्षा क्यों की ? पूर्वाचार्यों के प्रति सम्मान प्रदर्शनार्थ आचार्य भास्कर ने पूर्वाचार्यों की त्रुटि न कह कर “अत्यन्त अल्प अन्तर होने से उक्त उदयान्तर कर्म की पूर्वाचार्यों ने उपेक्षा की है” कह कर विश्राम किया हैं । सही अर्थ में भास्कराचार्य की यह ग्रह गोल ज्ञान की चमत्कारिक सूझ की देन है । १०