सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
मध्यगतिवासना १४५ यह उदयान्तर गणित कर्म क्या है— अयनांश युक्त सूर्य स्पष्ट की युक्त राशियों के काल में वर्त्तमान राशि के अंशों को उस राशि के उदयासुओं से गुणा कर ३० से भाग देने से वर्त्तमान राशि तक सायन स्पष्ट सूर्य के भुक्त असु (पलों से अनुपात से पल) होते हैं । इस वस्तु का नाम मध्यमार्क भुक्तासु होता है । नक्षत्र दिनान्त के अन्तर उक्त समय के पश्चात् निरक्ष खमध्य में मध्यम सूर्य का उदय होता है, निश्चित यही सही समय है । अहर्गण से साधित ग्रह नक्षत्र दिनान्त के अनन्तर मध्यम सूर्य के कला तुल्य अधिक काल में निरक्ष क्षितिज में ग्रहों की साधनिका की गई है । यदि राशि की कला १८०० कला का उदयमान उसी राशि के असु १८०० के तुल्य होता तो भी गणित में कोई अन्तर नहीं आता । एक राशि के कलामानों से उत्पन्न असुमानों में विभिन्नता होने से अहर्गण से साधित ग्रह क्षितिज में नहीं होकर कभी क्षितिज के नीचे और कभी क्षितिज के ऊपर ही होगा । इसीलिये जहाँ पर अन्य सभी आचार्यों ने साधित ग्रहों को औदयिक या उदय कालिक शब्द से स्पष्ट किया है, वहाँ पर आचार्य भास्कर ने ग्रह गणिताध्याय में “क्षितिजे, या उदयकाले ग्रहा भवन्ति” ऐसा न कहकर “क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः” से साधित ग्रह उदय के समीप आगे पीछे होते हैं न कि क्षितिज में उदयकालिक होते हैं ऐसा स्पष्ट कहा भी हैं । असुओं और कलाओं से अन्तरित काल का नाम आचार्य ने “उदयान्तर” काल कहा है । उदयान्तर काल से गुणित ग्रह गति में अहोरात्रासु २१६५९ = सावन दिन से भाग देने पर लब्धफल को अहर्गण से साधित मध्यम ग्रहों में धन या ऋण कला से असु अधिक हों तो धन, न्यून हों तो ऋण करने से सही रूप से निरक्ष क्षितिज में ग्रहों का स्थान होने से ग्रह दृक्पथ में आते हैं । यह क्रिया निरक्षोदय मानों से की जाने पर ग्रह का निरक्ष- देशीय ग्रह स्थान ज्ञान स्पष्ट होता है । अब यदि अपने देशीय उदयमान वशेन यह मध्यम ग्रह वश यह कर्म किया गया है तो याम्योत्तरान्तरात्मक चर संस्कार भी ग्रहों में स्वतः हो जाता है । स्पष्टार्कस्वदेशोदय मान से किये गये उक्त संस्कार से देशान्तर भुजान्तर और याम्योत्तरान्तर संस्कार जन्य ग्रह स्वदेशीय क्षितिज में स्वयं दृष्ट हो जाते हैं । पूर्वाचार्यों ने ऐसे उत्तम ग्रह गणित संस्कार की उपेक्षा क्यों की ? पूर्वाचार्यों के प्रति सम्मान प्रदर्शनार्थ आचार्य भास्कर ने पूर्वाचार्यों की त्रुटि न कह कर “अत्यन्त अल्प अन्तर होने से उक्त उदयान्तर कर्म की पूर्वाचार्यों ने उपेक्षा की है” कह कर विश्राम किया हैं । सही अर्थ में भास्कराचार्य की यह ग्रह गोल ज्ञान की चमत्कारिक सूझ की देन है । १०
१४६ गोलाध्याये मे. स्था वृ कदम्ब तारा ० स्था' मि. ध्रुव तारा स्था'' क. क्षेत्र देखिये । मे वृ मि क = क्रान्तिवृत्त या राशि वृत्त । मे स्था स्था' स्था'' = विषुवद्वृत्त । मे वृ = मेष राशि की कलाएँ = १८०० मे स्था = मेष राशि के उदय असु = १६७० इसी प्रकार मे मि = मे वृ = वृ मि प्रत्येक की कला १८०० तथा वृ मि० के विषुवांश = असु १७९५ तथा मे क — मे मि = मि. क. = मिथुन की कला १८०० एवं स्था' स्था'' = मिथुन राशि के असु १९३५ पदान्त में तीनों राशियों की कलायें = १८०० + १८०० + १८०० = ५४०० ,, ,, ,, ,, का असुमान = १६७० + १७९५ + १९३५ = ५४०० इससे सिद्ध होता है कि पदादि पदान्त में उदयान्तर का अभाव पदमध्य में उदयान्तर का परमत्व होता है । मध्य सावन मान के अहर्गण से ६० घटी + मध्यमगति कला के सावन दिन और स्पष्ट सावन प्रतिक्षण चल होने से ६० घटी + स्पष्ट रविगति उत्पन्न काल फल में अन्तर स्पष्ट हैं । अत एव मध्यम सावन अहर्गण से साधित ग्रह निरक्ष क्षितिज में न होकर आचार्य ने "क्षितिजसन्निधिगे सति मध्यमः" गणिताध्याय में उदयान्तर गणित का दिग्दर्शन कराते हुये, इस ग्रन्थ के इस गोलाध्याय में यहाँ पर उदयान्तर गणित साधनिका स्पष्ट कर दी है । भास्कराचार्य के पूर्ववर्त्ती ग्रह गणित सिद्धान्त मर्मज्ञों का ध्यान इस दिशा में नहीं गया या अत्यन्त स्वल्पान्तर से यह उदयान्तर गणित उपेक्षित हुआ है। वस्तुतः गणित विद्या के वर्षादि मानों में स्वल्पान्तर की उपेक्षा से दीर्घ काल में दृग्गणितैक्यता अन्तर आ जाने स सारा पञ्चाङ्ग कर्म पूर्णरूपेण दोषावह हो जाने का भय रहता है । वस्तुतः जैसा कि आज
होकर पुनः अपनी जगह पर"
Line 4: "ठीक आ जाती है ॥१९॥२०॥२१॥२२॥"
Line 5: "इदानीं देशान्तरस्वरूपमाह—"
Line 6: "येऽनेन लङ्कोदयकालिकास्ते देशान्तरेण स्वपुरोदये स्युः ।"
Line 7: "देशान्तरं प्रागपरं तथाऽन्यद्याम्योत्तरं तच्चरसंज्ञमुक्तम् ॥२३॥"
Line 8: "वा० भा०—य उदयान्तरकर्मणा लङ्कायामौदयिका ग्रहा जातास्ते देशान्तर-"
Line 9: "कर्मणा स्वपुरौदयिकाः स्युः । तच्च देशान्तरं द्विविधम् । एकं पूर्वापरमन्यद्याम्यो-"
Line 10: "त्तरम् । तच्चरसंज्ञमुक्तम् ॥२३॥"
Line 11: "तत्र तावत् पूर्वापरमाह—"
Line 12: "यल्लङ्कोज्जयिनीपुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशत्"
Line 13: "सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः ।"
Line 14: "आदौ प्रागुदयोऽपरत्र विषये पश्चाद्धि रेखोदयात्"
Line 15: "स्या
१४८ गोलाध्याये संज्ञम् । अन्यत् । द्वितीयं याम्योत्तरम् । तथा देशान्तरम् । तदप्रसिद्धिं परिहरति— तद्याम्योत्तरसंबन्धिदेशान्तरं फलं चरसंज्ञमुक्तं पूर्वैः । कालभेदेन भिन्नत्वात् । अतएव चञ्चलत्वाच्चरम् । पूर्वापरसंबन्धिदेशान्तरं फलं स्थिरत्वाद्देशान्तरसंज्ञम् । उभयोर्देश- संबन्धाद्देशान्तरत्वम् । तथा च रेखायां पूर्वापरप्रसिद्धदेशान्तराभावेऽपि याम्योत्तरचररूप- देशान्तरप्रसिद्धेस्तेनैव तत्सूर्योदये भवन्तीति भावः । अत एव लङ्कात् पूर्वापरनिरक्षदेशे देशान्तरेण पूर्वापरेणैवार्कोदयकाले भवन्ति । रेखाभिन्नस्वदेशे तु देशान्तराभ्यामिति लङ्कातः पूर्वापरयाम्योत्तरदेशेषु क्षितिजानां भेदसिद्धेर्भूर्मेर्गोलकत्वादित्युक्तं सम्यगेव ॥२३॥ अथ पूर्वापरदेशान्तरं तच्चरेखादेशसंबन्धीति स्पष्टं रेखादेशकथनव्याजेन मध्याधि- कारोक्तश्लोकार्धेन संसूचय
मध्यगतिवासना १४९ ग्रहगति × देशान्तर काल ──────────────────────── = देशान्तर फल ६० घटी इस क्षेत्रात्मक फल को पूर्वापर देश सम्बन्ध से क्रमशः ऋण और धन करने से पूर्वापर- देशीय सूर्योदय कालिक ग्रह होते हैं ॥२३॥२४॥ इदानीं भूगोले स्फुटपरिधिप्रदेशं स्फुटताऽनुपातं चाऽऽह— स्वदेशमेर्वन्तरयोजनैर्यल्लम्बांशजैर्मेरुगिरेः समन्तात् । वृत्तं स्फुटो भूपरिधिर्यतः स्यात्त्रिज्याहृतो लम्बगुणः कृतोऽस्मात् ॥२५ वा० भा०—स्वपुरस्य मेरुगर्भस्य चान्तरे यावन्ति योजनानि तावन्ति लम्बांशजानि । यतो निरक्षदेशस्वपुरान्तरयोजनान्यक्षांशजानि । भागेभ्यो योज- नानि च व्यस्तमित्युपपद्यत इत्यर्थः । तैर्लम्बांशजैर्योजनैर्मेरुगिरेः समन्ताद्यद्वृत्त- मुत्पद्यते स स्फुटो भूपरिधिः । यो मध्यपरिधिः पठितः स निरक्षदेशोपरि । अयं तु स्वपुरोपरि । अतः किञ्चिन्न्यूनो भवति । अथ तदानयनम् । मध्यपरिधेरभीष्टं त्रिज्यातुल्यं व्यासार्धं प्रकल्प्य तस्मिन् व्यासार्धे स्वपुरे यावती लम्बज्या तावत् स्फुटपरिधेर्व्यासार्धं भवितुमर्हति । अतस्तेन त्रैराशिकम् । यदि त्रिज्याव्यासार्धे मध्यमः परिधिर्लभ्यते तदा लम्बज्यामिते क इति । फलं स्फुटपरिधिरित्यु- पपन्नम् ॥२५॥ इति गोलाध्याये मध्यगतिवासना । मरीचिः—ननु देशान्तरफलानयनं स्पष्टभूपरिध्युपजीव्यम् । तत्र भूगोलिकत्वात्सर्वत्र भूपरिधेस्तुल्यत्वेन स्पष्टभूपरिधिस्त्वयुक्त इत्यतस्तत्स्वरूपप्रतिपादनपूर्वकं तदानयनोपपत्ति- मुपजातिकयाऽऽह—स्वदेशेति । स्वदेशो मेरुर्मेरुमध्यसमसूत्रेण भूपृष्ठस्थानं तयोरन्तरयोजनैर्भू पृष्ठस्यैर्मेरुगिरेर्मेरुम- ध्यसम्बन्धिभूगोलपृष्ठस्थानादित्यर्थः । समन्तात्तत्तत्केन्द्रकल्पनेन तद्योजनैर्भू गोलपृष्ठे तदभितो यद्वृत्तं भवति । ननु तद्योजनज्ञानाभावात्कथमिदमत आह—लम्बांशजैरिति । यथा भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तमित्युक्त्या निरक्षस्वदेशयोरन्तरयोजनान्यक्षांशेम्य- स्तथाऽक्षांशोननवतिरूपलम्बांशेभ्यस्तद्योजनानि भवन्ति । स स्पष्टो भूपरिधिर्यतः कार- णात्स्यात् । अतः कारणान्निरक्षदेशसंबन्धिपरमः स्पष्टपरिधिरूपस्वरूपस्त्रिज्या तुल्यलम्ब- ज्ययोक्तो भूपरिधिस्तदा स्वदेशलम्बज्यया क इत्यनुपातेन लम्बज्यागुणितो भवेत्कुपरिधिः स्पष्टस्त्रिज्याहृत इत्यनेन पूर्वोक्तेन त्रिज्याहृतो लम्बगुणाः स्पष्टपरिधिसिद्ध्यर्थं कृतः ॥२५॥ ननु खेटोऽनुपातेन यः स्यात्तस्यास्फुटना कथमिति मौलिकभूतप्रश्नस्योत्तरं न दत्तमित्यतः फक्किकयोत्तरमाह—इति मध्यमगतिवासनेति । अत्राहर्गणाद्युक्तं वासनया मध्यममानेति ।
१५० गोलाध्याये मध्यमाधिकारोक्तं मुख्यपदार्थानां निर्णयः कृतः । तदुत्तरं च स्पष्टज्ञानोपजीव्यं स्पष्टीकरण- वासनायां वक्तुमुचितमिति भावः ॥ दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीमद्रङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । यातः शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं मध्याधिकारगदितार्थसुवासनोऽयम् ॥ इति श्रीसकलसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वर- गणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये मध्यमगति- वासनाध्यायः ॥ केदारदत्तः—अपने भू-पृष्ठीय स्थान विशेष बिन्दु पर, भूपरिधिज्ञान— अपने स्थान और मेरु नाम ध्रुव स्थान के अन्तर योजन लम्बांश मान से ध्रुव स्थान से समान अन्तरित वृत्त की परिधि अपने देश की स्फुट भूपरिधि होती है । ध्रुव से स्वदेशीय याम्योत्तर में निरक्ष खमध्य तक त्रिज्या होने से पूर्व में पठित भूपरिधियोजन में त्रिज्या से भाग देकर लम्बज्या से गुणा करने से अपने देश की भूपरिधि होती है । उपपत्तिः—ध्रुवद्वय और अपने खमध्यद्वय गत याम्योत्तर वृत्त का नाडी वृत्त से जो सम्पात होता है उस सम्पात का नाम निरक्ष खमध्य होता है । निरक्ष खमध्य से अपने खमध्य तक याम्योत्तर वृत्त में अक्षांश चाप की ज्या का नाम अक्षज्या है । अक्षांश को ९० में घटाने से ध्रुव से अपने खमध्य तक लम्बांश की ज्या का नाम लम्ब-ज्या है और ध्रुव से निरक्ष खमध्य तक ९० अंश की ज्या का नाम त्रिज्या है । उ. ध्रु. अपना खमध्य पश्चिम पूर्व निरक्ष देशीय परिधि निरक्ष मध्य द. ध्रु. अतः अनुपात से—(क्षेत्र देखिये) ध्रु० पू० ध्रु० प० = ध्रुव का याम्योत्तर वृत्त । ध्रु० ख, नि० ध्रु० = अपने देश में याम्योत्तर वृत्त ।
मध्यगतिवासना १५१ ख० नि० = अक्षांश = ध्रु नि = ९०° । अतः ध्रु नि-नि ख = ध्रु ख = लम्बांश ९०° ज्या = त्रिज्या, ख० नि० ज्या = अक्षांश ज्या तथा ध्रु० ख० ज्या = लम्ब ज्या । पठित भूपरिधि योजन × लम्बज्या अतः अनुपात से --------------------------- = स्वदेशीय भूपरिधि मान उपपन्न त्रिज्या होता है ।२५।। इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के ग्रह गोलाध्याय के मध्यगतिवासनाध्यायः-४ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदार- दत्त:” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।
अथ छेद्यकाधिकारः इदानीं गोलं विवक्षुरादौ ज्योत्पत्तिकथने कारणमाह— पटो यथा तन्तुभिरूर्ध्वतिर्यग्रूपैर्निबद्धोऽत्र तथैव गोलः । दोःकोटिजीवाभिरमुं प्रवक्तुं ज्योत्पत्तिमेव प्रथमं प्रवक्ष्ये ॥१॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥१॥ मरीचिः — अथ मौलीभूतप्रश्नोत्तरदानरूपस्पष्टीकरणवासनाऽऽरब्धा व्याख्यायते । तत्र विना गोलस्थित्यवगमं तज्ज्ञानमशक्यमतो गोलस्वरूपं विवक्षुस्तदुपजीव्यां ज्योत्पत्तिमप- जातिकया प्रतिजानीते—पट इति । अत्र जगति पटो वस्त्रं यथोर्ध्वतिर्यग्रूपैर्दीर्घविस्तारयोनिवेशितैस्तन्तुभिर्निबद्धं तत्संनिवे- शात्मकं भवति तथा दोःकोटिज्याभिरूर्ध्वतिर्यक्स्थाभिः । एवकारोऽप्यर्थे । तेन कर्णसूत्रे- णेत्यर्थः । निबद्धो ग्रहाधिष्ठिताकाशगोलः । ग्रहस्पष्टीकरणार्थं दोःकोटिजीवानां ज्यासाधन- प्रकारेण साधनात्तद्युक्त्युक्तिरिति ध्येयम् । अमुं ग्रहादिगोलं प्रवक्तुं स्वरूपेण प्रतिपादयितुं प्रथममादौ ज्योत्पत्ति जीवासाधनप्रकारोपजीव्यखेटात्मकसिद्धजीवामुपपत्तिमित्यर्थः । एव- कारोऽप्यर्थे । तेन स्पष्टीकरणवासनात्मकं गोलाश्रितं तच्छोधकं चेत्यर्थः । प्रवक्ष्ये सूक्ष्म- त्वेनाहं कथयिष्ये । तथा च विना तन्तुस्वरूपज्ञानं पटस्वरूपज्ञानं तथा विना ज्यास्वरूप- ज्ञानं तदात्मकं गोलस्वरूपज्ञानमशक्यमिति प्रथमं ज्योत्पत्तिरुच्यत इति भावः ॥१॥ केदारदत्तः—गोल बन्धन की उपमा वस्त्र से दी जा रही है— जिस प्रकार, पूर्वापरयाम्योत्तरादि अनेक सूत्रों से वस्त्र का निर्माण कर वह उपयोग में आता है उसी प्रकार भुजज्या कोटिज्या उत्क्रम-कोट्युत्क्रम आदि अनेक ज्या और कोटिज्या रेखाओं से संवृत्त पिण्ड का नाम गोल होने से ग्रहगोलीय इस प्रकरण में सर्व प्रथम ज्योत्पत्ति बताई जा रही है ॥१॥ इष्टां त्रिज्यां सा श्रुतिर्दोर्भुजज्या कोटिज्या तद्वर्गविश्लेषमूलम् । दोःकोट्यंशानां क्रमज्ये पृथक् ते त्रिज्याशुद्धे कोटिदोरुत्क्रमज्ये ॥२॥ ज्याचापमध्ये खलु बाणरूपा स्यादुत्क्रमज्या त्रिभमौर्विकायाः । वर्गार्धमूलं शरवेदभागजीवा ततः कोटिगुणोऽपि तावान् ॥३॥ त्रिभज्यकार्धं खगुणांशजीवा तत्कोटिजीवा खरसांशकानाम् । क्रमोत्क्रमज्याकृतियोगमूलाद्दलं तदर्धांशकशिञ्जिनी स्यात् ॥४॥
त्रिज्योत्क्रमज्यानिहतेर्दलस्य मूलं तदर्द्धांशकशिञ्जिनी वा । तस्याः पुनस्तद्दलभागकानां कोटेश्च कोट्यंशदलस्य चैवम् ॥५॥ एवं त्रिषट्सूर्यजिनादिसंख्या अभीष्टजीवाः सुधिया विधेयाः । त्रिज्योत्थवृत्ते भगणाङ्किते वा ग्राह्या अभीष्टा विगणय्य जीवाः ॥६॥ वा० भा०—अत्र त्रिज्योत्थवृत्ते भगणाङ्किते वेत्येतदन्त्यवृत्तस्योत्तरार्धमादौ व्याख्यायते । ज्योत्पत्तावभीष्टा त्रिज्या कल्प्यते समायां भूमौ त्रिज्यामिताङ्गुलेन सूत्रेण वृत्तं विलिख्य दिगङ्कितं चक्रांशकैश्चाङ्कितं कृत्वा तत्रैकस्मिन्नेकस्मिन् वृत्त- चतुर्थांशे नवतिर्नवतिर्भागा भवन्ति । ततो यावन्ति ज्यार्धानि कार्याणि तावद्भि- विभागैरेकैकं वृत्तचतुर्थांशं विभज्य तत्र चिह्नानि कार्याणि । तद्यथा । यत्र चतुर्विं- शतिर्जीवाः साध्यास्तत्र चतुर्विंशतिर्भवन्ति । एवं द्वितीयचतुर्थांशेऽपि । ततो दिक्- चिह्नादुभयतश्चिह्नद्वयोपरि गतं सूत्रं ज्यारूपं भवति । एवं चतुर्विंशतिर्ज्या भवन्ति । तासामर्धानि ज्यार्धानि । तत्प्रमाणान्यङ्गुलेर्मित्वा ग्राह्याणि । अथाऽऽदितो व्याख्यायते । येष्टा त्रिज्या स कर्णः कल्प्यः । या भुजज्या स भुज- स्तयोः कर्णभुजयोर्वर्गान्तरपदं कोटिः । कोटिज्येत्यर्थः । तत्र ये भुजकोटिज्ये ते भुज- कोट्यंशानां क्रमज्ये ज्ञातव्ये । भुजज्या त्रिज्यातो यावद्विशोध्यते तावत् कोट्यं- शानामुत्क्रमज्याऽवशिष्यते । एवं कोटिज्योना त्रिज्या भुजांशानामुत्क्रमज्या स्यात् । अथोत्क्रमज्यास्थानं दर्शयति । तत्र पूर्वलिखिते वृत्ते चिह्नयोरुपरि गतं सूत्रं किल ज्या । तदुपरि तयोश्चिह्नयोर्मध्ये यद्वृत्तखण्डं तच्चापं धनुः । चापमध्यस्य ज्यामध्यस्य च यदन्तरं बाणाकारं सोत्क्रमज्येत्युच्यते । त्रिभमौर्विकाया इत्यग्रे संबन्धः । एवं साधारण्येन ज्याक्षेत्रं दर्शयित्वाऽथ निर्दिष्टांशानां गणितेन ज्यानयनम् । त्रिभमौर्विकाया यद्वर्गार्धस्य मूलं सा पञ्चचत्वारिंशदंशानां ज्या स्यात् । तस्या यावत् कोटिज्या साध्यते तावत् तावत्येव भवति । यतस्तत्र कोट्यंशा अपि पञ्चचत्वारिंशत् । अत्रोपपत्तिः । त्रिज्या भुजस्त्रिज्या च कोटिस्तद्वर्गयोगपदं वृत्तान्तःसमचतुर- स्रस्य भुजः स्यात् । सैव नवतिभागानां ज्या । तदर्धं ग्राह्यम् । अतो वर्गयोगस्य चतुर्थांशः कृतः । तदेव त्रिज्यावर्गार्धमतस्तन्मूलं शरवेदभागज्येत्युपपन्नम् । अथ त्रिंशद्भागानां ज्या त्रिज्यार्धमिता स्यात् । तस्याः कोटिज्या षष्टिभागानां ज्या स्यात् । अत्रोपपत्तिः । वृत्तान्तःपातिसमषडस्रस्य भुजो व्यासार्धमितः स्यादिति प्रसिद्धं गणितेऽपि कथितम् । अतस्त्रिज्यार्धं त्रिंशद्भागज्येत्युपपन्नम् ।
$1 \cdot versin^2$
उत्रिभा २ = $2 \cdot versin \cdot R$ (भा = ? no, "उ त्रि भा २" = उत्क्रमज्या × त्रिज्या × भावन? भा = 2? No, त्रि = त्रिज्या, भा = भावित?)
Yes! In Indian algebra, 'भा' stands for भावित (product of two unknowns)!
"उ त्रि भा २" = उत्क्रमज्या and त्रिज्या product, coefficient 2! But here "उत्रिभा २" has a minus sign?
Wait, in Indian algebra, a dot above a number indicates negative.
Look at line 8: above 'उत्रिभा २', is there a dot over '२'?
Wait! Look above '२' in 'उत्रिभा २':
There is a dot! Look above '२': yes, a dot! That means negative!
Wait, user said: "Do NOT output LaTeX math syntax."
Can we use Unicode dot or just write it as printed?
Wait, is it "उत्रिभा २" or "उत्रिभा २̇"? Usually in transcription, people transcribe the text literally, but let's see if the dot is visible:
Look at: "उव १ उत्रिभा २ त्रिव १ ।"
Wait, above '२' in line 8, there is a dot: उत्रिभा २ं or उत्रिभा २̇. But wait, in standard Devanagari text, it's often
मध्यसूत्रादुभयतस्तुल्यपरिध्येकदेशयोः संलग्नऋज्वी रेखा संपूर्णज्या। तत्सं- बद्धोऽस्य परिध्येकदेशः संपूर्णं चापम्। अनयोर्मध्येऽन्तराले मध्यसूत्रान्तर्गतरेखैकदेशा या रेखा बाणरूपाऽवगता सोत्क्रमज्या स्यात् । खल्वित्यनेनोत्क्रमज्यायाः स्वरूपावगमे तदुपपत्तिः सुज्ञेया । तद्यथा—पूर्वमध्यसूत्राद्या भुजज्या तत्तुल्यमेव पूर्वकेन्द्रादितरमध्यसूत्रे कोटिज्या- मूलपर्यन्तमन्तरम् । तदूनं व्यासार्धं कोट्युत्क्रमज्या । एवमितरमध्यसूत्राद्या कोटिज्या तत्तुल्यमेव पूर्वमध्यसूत्रे भुजज्यामूलपर्यन्तं तदूनात्रिज्या भुजोत्क्रमज्या । अथ ज्योत्पत्तौ पञ्चचत्वारिंशद्भागानां ज्यानयनमाह—त्रिभमोर्विकाया इति । त्रिज्याया वर्गस्यार्धितस्य मूलं पञ्चचत्वारिंशद्भागानां जीवा । ततोऽनन्तरमियं भुजज्या त्रिज्याकर्ण इति प्रागुक्त्या तद्वर्गविश्लेषमूलमित्यनेनास्याः कोटिज्या तावान् भुजज्यामितेत्यर्थः । अपिशब्दो भुज- कोट्योस्तुल्यत्वनियमव्यवच्छेदार्थकः । तेनात्रोपपत्तिः प्रसिद्धा । तथा हि—पञ्चचत्वारिंशद्भा- गचिह्ने मध्यसूत्राभ्यां वृत्ते भुजकोट्योः समत्वात्तज्ज्ञानेऽपि त्रिज्यामितकर्णज्ञानात्तज्ज्ञानं सुलभम् । कर्णस्य भुजकोटिवर्गयोगमूलत्वात्कर्णवर्गो भुजकोटिवर्गयोरैक्यम् । तत्रापि भुज- कोट्योः समत्वेन प्रकृतकर्णवर्गे भुजज्यावर्गः कोटिज्यावर्गो वा द्विगुणः संभवत्यतः कर्ण- वर्गोऽर्धं भुजज्या तद्वर्गः कोटिज्यावर्गो वा तन्मूलं भुजज्या कोटिज्या वा तुल्यैवेति । तथा गजाग्निवेदाग्निमितत्रिज्यानुरोधेन त्रिज्यावर्गः ११८१९८४४ अस्यार्धं ५९०९९२२। अस्य सूक्ष्मं मूलं पञ्चचत्वारिंशद्भागानां ज्या २४३१।१।५९। इयं स्पष्टाधिकारोक्तः चतुर्विंशज्यासु द्वादशी ॥३॥
अथैकद्विराशिज्याज्ञातज्ञानज्यासंबन्धिभागानां तदर्धांशानां ज्याज्ञानं चोपजातिकयाऽऽह— त्रिभज्यकार्धमिति । त्रिज्यार्धे त्रिंशद्भागानां ज्या । त्रिंशद्भागानां कोटिजीवा पूर्वोक्तप्रकारेण षष्टिभागानां ज्या स्यात् । यथा त्रिज्या ३४३८ अर्धमेकराशिज्या १७१९ अष्टमी प्रकृते अस्या वर्गः २९५४९६१ त्रिज्यावर्गाच्छुद्धो ८८६४८८३ अस्य मूलं द्विराशिज्या षोडशी २९७७। २३।४३ । क्रमोत्क्रमज्येति येषामंशानां क्रमज्या ज्ञाता तेषामंशानामुक्तरीत्योत्क्रमज्या कोटि- ज्योनत्रिज्यारूपा ज्ञेया । ततस्तयोः क्रमज्ययोर्वर्गयोरैक्यान्मूलस्यार्धम् । ज्ञातक्रमज्योत्क्रम- ज्यासंबन्धिभागानामर्धांशास्तेषां क्रमज्या स्यादित्यर्थः । यथा पञ्चचत्वारिंशद्भागानां क्रमज्या २४३१ । एतत्तुल्यैव तेषां कोटिज्या । तयोना त्रिज्या तेषामुत्क्रमज्या १००७ । अनयोर्वर्गयो ५९०८९२२ । १०१४०४९ योगो ६९२३३७१ अस्य मूलस्यार्धं सार्धद्वा- विंशत्यंशानां ज्या षष्ठी १३१५।४०।१९। यथा वैकराशिक्रमज्या १७१९ द्विराशिज्योन- त्रिज्यैकराश्युत्क्रमज्या ४६१ अनयोर्वर्गयो २९५४९६१।२१२५२१ योगोऽ३१६७४८२स्य मूलार्धं पञ्चदशभागानां चतुर्थी ज्या ८८९।५३। अत्रोपपत्तिः । त्रिज्यामितव्यासार्धेन यद्- वृत्तं तद्द्वादशराश्यकं कार्यम् । तत्र परिधौ तद्व्यासार्धेन वृत्तम् । तद्वृत्तपूर्ववृत्तसंपातात्तद्व्या- सार्धेन पुनर्वृत्तम् । पुनस्तत्पूर्वपरिधिसंपातात्तद्व्यासार्धेन वृत्तमेवं पूर्ववृत्ते षड् वृत्तानि भवन्ति । तेषु व्यासार्धं त्रिज्या । सा पूर्ववृत्ते षडस्रभुजरूपा राशिद्वयस्य संपूर्णज्या तदर्ध-
, two avagrahas: ऽऽह.
त्रिज्योत्क्रमज्ययोर्घातार्धस्य मूलं यदंशानामुक्तक्रमज्या तदंशार्धांशानां क्रमज्या स्यात् । Correct.
वा प्रकारान्तरे । यथा पञ्चचत्वारिंशद्भागानामुक्तक्रमज्या १००७ त्रिज्यागुणा ३४६२०६६
Wait: वा प्रकारान्तरे । -> वा प्रकारान्तरे ।
Numbers: १००७, ३४६२०६६.
Wait, check १००७: 1007.
Check ३४६२०६६: 3462066. (1007 * 3438 = 3462066). Exactly!
अर्धिताऽ१७३१०३३ स्या मूलं सार्धद्वाविंशत्यंशानां ज्या १३१५ । १९ । यथा वैकराश्यु-
Wait, अर्धिताऽ१७३१०३३ -> 3462066 / 2 = 1731033. Correct!
Wait, स्या मूलं -> स्या मूलं or स्य मूलं? It says स्या मूलं (looks like स्या or अस्या?).
Wait, look at the letter: स्या with a matra? Yes, स्या मूलं.
षण्मतज्योनात्रिज्याऽष्टादश्युत्क्रमज्या । अष्टादशोना त्रिज्या षण्मितोत्क्रमज्या । आभ्यां सपादेकदशांशानां सपादचतुस्त्रिंशदंशानां चोक्तरीत्या तृतीया नवमी च तयोः कोटिज्ये । एवं विंशीपञ्चदश्यौ । एवमर्धांशानामभीष्टज्या साध्योक्तरीत्याऽपेक्षावशादिति । यथा च प्रकृते सार्धद्वाविंशत्यंशज्यायाः कोटिज्या ३१७६ । २४ तयोना त्रिज्या तस्या उत्क्रमज्या २६१ । ३६ त्रिज्यागुणा ८९८८०८ अर्धं ४४९४०४ मूलं तृतीया ज्या ६७०।३४। एवमन्यान्यप्यानेयानि । अत्राधर्माधिकायवयस्यैकग्रहणग्रहणमार्षोक्ताविरुद्धम् । अर्धन्यूनाव- यवस्यैकग्रहणं क्वचित्तदनुरोधादेवेति ध्येयम् । अत्रोपपत्तिः । भुजोत्क्रमज्योना त्रिज्या कोटिक्रमज्या ऊ१ त्रि १ एतद्वर्गौ उव १ उत्त्रि २ त्रिव १ निस्त्रिज्यावर्गो भुजज्यावर्गः उव१ उत्त्रि २ । अस्य भुजोत्क्रमज्यावर्गो योज्य इत्यधनघनयोस्तुल्योनाशादवशिष्टं क्रमोत्क्रम- ज्याकृतियोगस्य स्वरूपमुत्क्रमज्या त्रिज्याघातो द्विगुण इति । अस्य मूलदलमिति लाघवा- दस्यैव दलमूलं ग्राह्यम् । तत्र मूलदलस्य वर्गचतुर्थांशरूपत्वादूर्गेण वर्गं गुणयेद्द्बजेच्चेत्युक्त- त्वाच्चोत्क्रमज्या । त्रिज्याघातस्य द्विगुणस्य चत्वारो हर इति भाड्यहरयोर्द्व्यर्थापवर्तनेनोत्क्रम- ज्या त्रिज्याघातार्धमूलमुपपन्नम् । एवमर्धांशकज्योत्पत्तिसाधनेन सर्वा अपि जीवास्तद्रूपा उत्पत्स्यन्तीति तस्याः पुनरित्याद्युपपन्नम् ॥ ५ ॥ न चैवमनियमाज्ज्याः कियत्यः साध्याः । न त्वत्करीत्या पूर्णानामेव ज्याज्ञानं येन नवधेयोर्निनियताः (?) स्युरित्यतस्तदुत्तरं प्रकारान्तरेण जीवाज्ञानं चोपजातिकयाऽऽह— एवमिति । एवमर्धांशज्यासाधनप्रकारेण । सुधिया गणकेन । अभीष्टजीवा अभीष्टांशानां ज्या विधेयाः सिद्धाः कार्याः । अयमर्थः । स्वेच्छया यन्मिता ज्या इष्टास्तत्संख्यया नवत्यंशास्त- त्कला वा भक्ताः, यल्लब्धं तदन्तरेणाभीष्टा ज्या उक्तरीत्या साध्याः । सुधियेति हेतुगर्भम् । तेनार्धांशज्याप्रकारेण तदन्तराभावेन यत्र ज्या सिध्यति सोपेक्षणीया । यत्र च तदन्तरे नोक्तप्रकारेण ज्यासिद्धिरुत्र पूर्वापरज्याभ्यामनुपातेन ज्या साध्येति सूचितम् । तत्रोदाह- रति—त्रिषडिति । यथाऽत्र ग्रन्थे चतुर्विंशतिजीवाकल्पनेन त्रिषट्सूर्यजिनादयश्चतुर्विंशति- जीवा उक्तरीत्योपपन्नाः । पञ्चचत्वारिंशदंशज्याया अर्धज्यासाधनरीत्या षष्ठी तृतीया जीवा भवति नान्या । तदुद्देशेनैकविंशत्यष्टादश्योर्जीवयोरुद्देशः । कोटिज्याया उपजीव्यत्वात् । एवमष्टादश्या नवमीष्टांशानां ज्याज्ञानासम्भवादनुपातस्यात्रासंगतत्वादित्यतः प्रकारान्तरेण सूक्ष्मजीवाज्ञानमाह—त्रिज्योत्थवृत्त इति । त्रिज्यामितव्यासाधैन कृतवृत्ते । भगणाङ्किते । द्वादशराशिकलाविकलाभिरङ्किते । अभीष्टा जीवा विगणय्य गणयित्वा ग्राह्या
१५८ गोलाध्याये मर्धज्या तन्मापकेन त्रिज्या तन्मापकेनैव गणयित्वा ज्ञेयमेवं स्वेच्छयाऽभीष्टांशानां सूक्ष्मज्या सिध्यतीति ॥ ६ ॥ केदारदत्त:— किसी समान भूमि में अर्थात् जल आदि से समतल कृत भूमि धरातल में अभीष्ट अंगुल व्यासार्ध रेखा से एक वृत्त बना कर उस वृत्त में पूर्व पश्चिमादि दिक् चिह्न लगाकर उस वृत्त में, ३६० अंश, पुनः एक-एक अंश में ६० विकला····के स्थान अङ्कित करने चाहिए। इस प्रकृत वृत्त के चार चतुर्थांश में ९०° होंगे। एक चतुर्थांश चाप में जितनी जीवा करनी है उस चतुर्थांश चाप के उतने अभीष्ट विभाग करने चाहिए। गणिताचार्यों ने एक वृत्त के धनु अंश में २४ विभागों की कल्पना की है अतः इस आधार से (९०° × ६०) / २४ = २२५ कला का एक चाप होता है। प्रत्येक अभीष्ट चिह्नगत सरल रेखा का नाम ज्या होता है। इस प्रकार २४ संख्यक ज्या होती हैं जिनका ज्यार्ध नाम भी होता है। सोपपत्तिक व्याख्या— किसी भी वृत्त खण्ड की इष्ट त्रिज्या कर्ण, भुजज्या = भुज कर्ण और भुज का वर्गान्तर मूल = कोटि होती है। क्षेत्र देखें— अ क ल प ह म न ट र ल स वृत्त का चतुर्थांश वृत्त = अ ह। अभीष्ट चाप = अ प की ज्या सरल रेखा = प य = केत = भुज। चाप अ ह – चाप अ प = चाप प ह = कोटि चाप की ज्या = प त = कोटि। केन्द्र से परिधि तक की केप रेखा = कर्ण। अतः के त² + त प² = के प² तथा = के प² - प त² = के त² = भुज ज्या²
छेद्यकाधिकारः १५९ इस प्रकार भुज ज्या² + कोटि ज्या² = केत² = कर्ण² = कर्ण । अतः २√भुज ज्या² + कोटिज्या² = २√के त² = कर्णवर्ग का मूल = कर्ण इसी प्रकार यह भुज और कोटि की क्रम ज्या होती हैं। केह - केत = त्रिज्या - भुज ज्या = त ह = कोटि उत्क्रम ज्या । तथा के अ - के य = त्रिज्या - कोटि ज्या = अ य = भुजोत्क्रम ज्या । ज्या और चाप के मध्य में बाण (शर) आकार को भुज सम्बन्धेन कोटि उत्क्रम, और कोटि सम्बन्धेन भुजोत्क्रम होती है। सरल त्रिकोणमिति, चापीय त्रिकोणमिति नामक आधुनिक ग्रन्थों के अध्ययन से उक्त सभी विषय और अधिक स्पष्ट होते हैं, छात्रों ने उक्त त्रैकोणमितिक ग्रन्थों का सम्यगध्ययन करना चाहिए । तत्कालीन गणित परम्परा और बहुविकसित आधुनिक गणित का चापीय एवं सरल त्रिकोणमितिक गणितों का मूल स्रोत आचार्योक्त यही गणित हैं। शेष स्पष्ट है। यहाँ पर ग्रन्थ गौरवभय से उक्त विषय का मात्र दिग्दर्शन कराया गया है जो पर्याप्त है ॥२॥३॥४॥५॥६॥ क्योंकि इस गणित सम्बन्ध के आधुनिक गणित ग्रन्थ, गणितज्ञों की देन से यत्र तत्र सर्वत्र सुलभ एवं सुबोध गम्य हैं । अतएव ग्रन्थ विस्तार भय से यहाँ पर इस विषय का संक्षेप किया जा रहा है । भास्कराचार्यरचिता ज्योत्पत्तिरियमद्भुता । मुनीश्वरेण विवृता गुरुरामप्रसादतः ।१। इदानीं स्पष्टीकरणे फलस्योत्पत्तिमाह— भूमेर्मध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतः स्याद् यस्मिन् वृत्ते भ्रमति खचरो नास्य मध्यं कुमध्ये । भूस्थो द्रष्टा नहि भवलये मध्यतुल्यं प्रपश्ये- त्तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इह तद्दोःफलं मध्यखेटे ॥७॥ वा० भा०—यदेतद् भपञ्जरेऽश्विन्यादीनां भानां वलयं तद्भूमेः समन्तात्सर्वत्र तुल्येऽन्तरे वर्तते । यतस्तस्य मध्यं कुमध्ये । अथ यस्मिन्वृत्ते ग्रहो भ्रमति तस्य मध्यं कुमध्ये न । तद्भूमेः समन्तात्समानान्तरं नेत्यर्थः । अतो भूस्थो द्रष्टा भव- लये मध्यमस्थाने ग्रहं न पश्यति । किन्त्वन्यत्र पश्यति । तयोर्भवलये यदन्तरं तद् ग्रहस्य फलमित्यर्थादुक्तं भवति । अत उक्तं—तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इह तद्दोःफलं मध्यखेट इति ॥७॥ मरीचिः—अथ संसिद्धादित्यादिप्रश्नोत्तरभूतस्पष्टक्रियावासनां निरूपयितुं प्रथमं फल- वासनां संक्षिप्तां वक्ष्यमाणार्थनिरूपणसंगतिसूचिकां मन्दाक्रान्तयाऽऽह—भूमेरिति ।
१६० गोलाध्याये तस्मात्कारणात् । इह । अहर्गणानुपातसिद्धमध्यग्रहे । तज्जैर्मध्यस्पष्टविवेकविद्भिः पूर्वाचार्यैस्तत्स्पष्टाधिकारोक्तं दोःफलं केन्द्रभुजसाधितफलं मन्दं शैघ्यं च । साक्षात्परम्परा- संबन्धेन क्रियते संस्क्रियत इत्यर्थः । कारणमाह—भूस्थ इति । हि यतो भूस्थो भूगर्भस्थो द्रष्टा ग्रहबिम्बद्रष्टा भवलये क्रान्तिवृत्ते वक्ष्यमाणरूपे मध्यतुल्यमहर्गणानुपातसिद्धमध्यग्रह- भोगतुल्यं ग्रहबिम्बस्थानं न पश्येत् । अयमर्थः । क्रान्तिवृत्ते रेवतीस्थानान्मेषाद्यङ्कितद्वा- दशराशिभागकलाविकलाङ्किते यत्राहर्गणानुपातसिद्धग्रहभोगमित्या रेवतीस्थानाद्ग्रहचिह्नं तत्समसूत्रेण ग्रहकक्षायां ग्रहबिम्बं न पश्यति । यत्र च ग्रहबिम्बं पश्यति तत्समसूत्रेण क्रान्तिवृत्ते स्थानं पूर्वग्रहचिह्नं तत्समसूत्रेण ग्रहकक्षायां ग्रहबिम्बं न पश्यति । यत्र च ग्रह- बिम्बं पश्यति तत्समसूत्रेण क्रान्तिवृत्ते स्थानं पूर्वग्रहचिह्नात्प्रागपरत्र भवति । तत्रातस्त- त्स्थानयोरन्तरं फलं तेन पूर्वग्रहचिह्नमहर्गणानुपातसिद्धं संस्कृतं स्पष्टग्रहस्थानं भवति । तत्र ग्रहबिम्बस्य समसूत्रेण दर्शनात्स्पष्टत्वम् । अत एव पूर्वग्रहचिह्नसमसूत्रेण ग्रहबिम्बादर्श- नादहर्गणानुपातसिद्धो ग्रहो मध्यो न स्फुट इति प्रत्यक्षप्रमाणसिद्धम् । अत्रापि कारणमाह- भूमेरिति । यतः कारणात् । भूमेर्मध्ये भूगोलमध्यकेन्द्रभागे । भवलयस्य नक्षत्रपञ्जर- गोलस्य खलु निश्चयेन मध्यं केन्द्रं तदैक्यसंबन्धेन । अपिशब्दान्नक्षत्रगोलानुसृतस्वस्वकाश- भागे प्रवहभ्रमानुसृतग्रहकक्षावृत्तानां भूगर्भे केन्द्रमित्यर्थः । ग्रहः पूर्वगत्या यस्मिन्वृत्ते भ्रमति भगणभोगं करोति । अस्य वृत्तस्य मध्यं केन्द्रं कुमध्ये भूगोलगर्भे न स्यात् । तथा च नक्ष- त्राणां सदैकरूपदर्शनाद्भूगोलाभितः समान्तरेण नक्षत्रगोलोऽस्तीति क्रान्तिवृत्तमपि तथा- ऽस्ति । ग्रहबिम्बानामेकरूपत्वेन दर्शनाभावादणुपृथुबिम्बदर्शनान्यथानुपपत्त्या ग्रहबिम्बाधि- ष्ठितवृत्तं कक्षावृत्तभिन्नत्वेन लाघवात्कल्पितं भूगोलाभितः समान्तरेण नास्तीति क्रान्तिवृ- त्ताङ्कितमेषादिराशिभागाद्यनुरुद्धसमसूत्रेण ग्रहाधिष्ठितवृत्ताङ्कितमेषादिराश्यादिकं न स्या- दिति गणितस्य भूगर्भसंबन्धेनोक्तत्वादहर्गणानुपातसिद्धं क्रान्तिवृत्तानुसृतकक्षावृत्तस्थमध्य- ग्रहचिह्नसमसूत्रेण ग्रहबिम्बादर्शनं युक्तमुक्तम् । यत्कक्षाप्रदेशसमसूत्रेण ग्रहबिम्बदर्शनं तत्क- क्षाप्रदेशे मेषादिराश्यादिमानं स्पष्टग्रहभोग इति मध्यस्पष्टग्रहस्थानयोरन्तरं फलं धनमृणं मध्यग्रहे स्पष्टग्रहज्ञानार्थं क्रियत इति फलितार्थः ॥७॥ केदारदत्तः—ग्रह कक्षा केन्द्र भूकेन्द्र से भिन्न है— भूगर्भकेन्द्र से त्रिज्या व्यासार्ध से उत्पन्न वृत्त को क्रान्ति वृत्त या राशि वृत्त कहा जाता है । अर्थात् अश्विनी आदिक अनेक नक्षत्रों से युक्त वृत्त का नाम क्रान्ति वृत्त है वह भूमि के चारों तरफ समान दूरी पर है । भूपरिधि का गर्भ केन्द्र भूकेन्द्र, उक्त नक्षत्र कक्षादि जिसका अपर नाम क्रान्ति वृत्त है उस वृत्त का केन्द्र बिन्दु भू गर्भ बिन्दु है । लेकिन ग्रह बिम्ब जिन वृत्तों से गमन कर अश्विनी आदिक नक्षत्रों का भोग करते हैं उन वृत्तों का केन्द्र बिन्दु भूगर्भ बिन्दु नहीं है । भू पृष्ठ से द्रष्टा की दृष्टि गणितागत मध्यम ग्रह पर अर्थात् कक्षा वृत्तस्थ मध्यम ग्रह स्थान पर नहीं हो सकने से मध्यम ग्रह का स्थान स्पष्ट ग्रह के स्थान से भिन्न दृष्टि पथ में
छेद्यकाधिकारः १६१ आने से मध्यम ग्रह में मन्दफल और शीघ्र फलों का नियमानुसार मध्यम ग्रहों में संस्कार कर देने से ही स्पष्ट ग्रह बिम्ब कक्षा वृत्त में दृष्टि गोचर होता है। अतः ग्रह कक्षा का केन्द्र बिन्दु भू केन्द्र बिन्दु न होकर अन्यत्र कोई अन्य बिन्दु ग्रहकक्षा केन्द्र होता है। दृश्य कक्षा वृत्त में मध्यम और स्पष्ट ग्रहों का अन्तर ही फल (मन्द फल या शीघ्र फल) जिस वृत्त में ग्रह भ्रमण करता है उस जगह पर भू केन्द्रामि प्रायिक दृश्य ग्रह स्थान मध्यम ग्रह स्थान से भिन्न या अन्तरित होने ग्रह कक्षा केन्द्र भूगर्भ केन्द्र से भिन्न प्रतीत होने से अहर्गण से साधित मध्यम ग्रह में अन्य संस्कार अपेक्षित देखे जाने से मध्यम ग्रह में मन्दफल शीघ्रफल संस्कारों का होना आवश्यक होता है ॥७॥ एवमेकेनैव श्लोकेन संक्षेपाच्छेद्यकसर्वमुक्तवेदानीं किंचित्सविस्तरं छात्रान्प्रत्याह— पूर्वापरायतायां तद्भित्तावूत्तरपार्श्वके । दर्शयेच्छिष्यबोधार्थं लिखित्वा छेद्यकं सुधीः ॥८॥ वा० भा०—नाद्यापीदं सम्यगस्माभिरज्ञायित इति शिष्यैरुक्त आचार्य आह। पूर्वापरायतायामित्यादि । स्पष्टार्थम् ॥८॥ मरीचिः--तत्वनया फलवासनया फलायनघासना त्वसिद्धा । उच्चकेन्द्रभुजकोटिज्यादेः स्वरूपानवगमात् । किंचोक्तरीत्या फलज्ञानासंभवस्तद्वर्णनाज्ञानासंभवश्च । ग्रहाधिष्ठित- वृत्तस्य मध्यज्ञानाभावादाकाशस्थितकल्पिततद्वृत्तयोरतिदूरस्थत्वेन तद्विभागावयवानां मनुष्यनेत्रागोचरत्वादित्यतोऽनुष्टुभाऽऽह— पूर्वापरेति । सुधीर्गोलाभिज्ञो गणकः । सुधीरित्यनेन यथा शिष्यस्य तदुपपत्तिबोधः स्यात्तयोपपत्ति- ज्ञानाय प्रकाराः कल्पनीया इति सूचितम् । पूर्वापरायतां पूर्वापरं दैर्घ्यं यस्यास्तस्यां भित्तावूत्तरपार्श्वके । उत्तरदिक्स्थितायामित्यर्थः । अन्यथा पूर्वापरदैर्घ्यभूताया भित्तेरुत्तर- पार्श्वभागानुपपत्तेः । छेद्यकं पूर्वाचार्यप्रयोगानुसारद्राक्ष्यमाणस्पष्टक्रियोपपत्तिबोधकपरिलेषः छेद्यकपदवाच्यस्तमुक्तप्रकारेण लिखित्वा शिष्यबोधार्थं शिष्यस्य स्पष्टक्रियोपपत्तिज्ञान- संपादनिमित्तं शिष्याय तदुच्चकेन्द्रभुजकोठितज्ज्याफलस्पष्टग्रहादिस्वरूपं दर्शयेत् । तथा चाऽऽकाशस्थतद्वृत्तानामतिदूरस्थत्वात्तद्विभागानां नयनागोचरत्वादपि तद्द्दष्टान्ते केद्यके तन्निश्चयस्य सुलभत्वादाकाशेऽपि तत्स्वरूपमनुमावगम्यम् । दृष्टान्तस्याऽऽकाशतुल्यतया सिद्धत्वादिति न क्षतिः । अत्र भूमौ खेद्यकलिखने भूम्यभितो ग्राहभ्रमणं प्रत्यक्षसिद्धं न दृश्यत इति भित्तौ तल्लिखनम् । तत्रापि पूर्वपश्चिमदिक्स्थभित्त्योर्लिखने तु पूर्वापरग्रह- भ्रमणादर्शनात्तद्दर्शार्थं पूर्वापरायतायामित्युक्तम् । तत्रापि च दक्षिणदिक्स्थभित्तौ छेद्यक- लिखने पूर्वापरभ्रमादर्शनोपलम्भार्थी मेषादिराशीनामपसव्येन लिखनं भवतीत्युत्तरदिक्स्थभित्तौ तल्लिखने मेषादिराशीनां लिखनं सव्येन भवतीत्युत्तरपार्श्वक इत्युक्तम् । सव्यक्रमस्य भाग- लिखनत्वेन शिष्टसंमतत्वात् । अन्यथा तत्क्रमेण वर्णादिलिखनं बाध्येतेति ध्येयम् ॥८॥ ११
, then a virama? Or 'त्'?
Wait, नीतमानीतं । - usually 'नीतम् आनीतम्'. In the text: 'नीतमानीतन्' or 'नीतमानीतम्'?
Look at the letter: it has two vertical legs joined at the bottom? That's an 'न्' with a virama: न्?
Wait, or is it 'म्' with virama?
Look at 'मित्यर्थः । अन्यथा': it's 'म्' with virama! 'आनीतम् ।'
Wait, let's look at 'आनीतम्' vs 'आनीतन्':
In Devanagari, 'म्' has a loop on the left and a right vertical line.
Yes, it's आनीतम् ।!
Let's look at L31:
। स्वर्गलोकस्य भूप्रदेशविशेषत्वाश्रथमत एवावनीत्त्वात्वदवनों नीतमित्यस्यानुपपत्तेः । तथा
Wait! Look at this line very carefully:
First character: । (danda at the beginning of the line!)
Wait, why is there a danda at the beginning?
At the end of L30, there is । अन्यथा.
Then L31 starts with:
Wait, does it start with । or is that a line border or danda?
There is a vertical bar: । at the start of L31!
Then: `स्वर्गलोक
ैहिकं" or does it have repha? No repha on 'जि' in स्वाजित! But wait, look at the next word: "पूर्वजन्मार्जितं" - here 'र्जि' has a clear repha. In "स्वाजित" it seems the repha was omitted in print, or is it there? It's omitted: "स्वाजितपुण्यमैहिकं". Wait, look at line 28: "स्वाऽऽयुषार्जिसतं" - wait, look at line 28: "स्वाऽऽयुषार्जिसतं" or "स्वाऽऽयुषार्जितं"? In line 28: "स्वाऽऽयुषार्जितं" or "स्वाऽऽयुषार्जिसतं"? Let's look closely at line 28: "त्वात्तेषां च भोगैकनाशयत्वेन तेषा सर्वेषां भोगार्थं यः कालः स एवाऽऽयुःसुकृतक्षय इत्य-" Wait, line 27: "त्वात्तेषां च भोगैव्यनाशयत्वेन तेषा सर्वेषां भोगार्थं यः कालः स एवाऽऽयुःसुकृतक्षय इत्य-" Wait, is it "भोगैव्यनाशयत्वेन" or "भोगैकनाश्यत्वेन"? In line 27: "भोगैकनाश्यत्वेन" -> look at 'क': it has a loop on left, curve on right. It is 'भोगैकना
१६४ गोलाध्याये केदारदत्तः—अनन्त दूरी पर गमनशील ग्रहों की आकाशस्थ गतिविधि जो दृष्टि- गोचर भी नहीं हो सकती है उसका ज्ञान उक्त छेद्यक से कैसे हो सकेगा ? इसका समा- धान बताया जा रहा है— वाङ्ममनवाणी से अतीन्द्रिय ग्रहगणित गोलज्ञानात्मक यह एक ब्रह्म निर्मित दिव्यज्ञान है । वशिष्ठ आदि ऋषियों की परम्परा से उत्तरोत्तर यह रहस्य पृथ्वी में लाया गया है । इसीलिये द्वेषी, कृतघ्न दुर्जन, दुराचारी को तथा गुरुकुलवासी छात्र को यह रहस्यमय ग्रह ज्ञान नहीं देना चाहिए । दीर्घ समय तक गुरु की सेवा के साथ गुरु सेवारक्त सच्छिस्थ छात्रोंको ही यह ग्रह रहस्यमय ज्ञान देना चाहिये । यही मर्यादा है । अर्थात् मर्यादा भंग करने से आयुक्षय, और सुकृतक्षय होता है । मुनिकृत सदाचार नियमों का उलंघन उचित नहीं होता है ॥९॥ इदानीं विलिख्य च्छेद्यकमाह— त्रिभज्यकासंमितकर्कटेन कक्षाह्यवृत्तं प्रथमं विलिख्य । तन्मध्यतो मध्यमखेटभुक्तितिथ्यंशमानेन महीं सुवृत्ताम् ॥१०॥ कक्षाह्यवृत्ते भगणाङ्कितेऽत्र दत्त्वोच्चखेटौ क्रियतोऽथ रेखा । कुमध्यतुङ्गोपरिगा विधेया तिर्यक् ततोऽन्या सुधिया कुमध्ये ॥११॥ उच्चोन्मुखीमन्त्यफलज्यकां च दत्त्वा कुमध्याद्विलिखेतदग्रे । त्रिभज्ययैव प्रनिमण्डलाख्यं सैवोच्चरेखा त्वपराऽत्र तिर्यक् ॥१२॥ तुङ्गोर्ध्वरेखा खलु यत्र लग्ना तन्नीचचमस्मिन् प्रतिमण्डलेऽपि । ततो विलोमं खलु तुङ्गभागैर्मैपादिरस्मात्खचरोऽनुलोमम् ॥१३॥ देयस्तदुच्चान्तरमत्र केन्द्रं दोर्ज्योच्चरेखाखगयोश्च मध्ये । तिर्यक्स्थरेखाखगयोस्तु कोटिः सोर्ध्वाऽधरा बाहुगुणस्तुतिर्यक् ॥१४॥ वा० भा०—भित्तेरुत्तरपार्श्वे बिन्दुं कृत्वा तस्माद्विन्दोस्त्रिज्यामितेन कर्कटेन वृत्तं विलिखेत् । तत्कक्षावृत्तम् । यस्य ग्रहस्य च्छेद्यकं विलिख्यते तस्य मध्यमभुक्तिपञ्चदशांशेन तस्मिन्नेव बिन्दौ यद्वृत्तं क्रियते सा भूः । लम्बनावन- तिदर्शनार्थमियं भूः । अन्यथा बिन्दुरेव भूः कल्प्यते । तत्कक्षावृत्तं चक्रांशैरङ्क्यम् । तत्रेष्टस्थाने मेषादि प्रकल्प्य तस्मान्मध्यमग्रहमुच्चं च दत्त्वा तदग्रयोश्चिह्ने कार्ये । भूम्युच्चरुपरि गता रेखा कार्या । सोच्चरेखा । अथ भूमध्य-उच्चरेखाजनित- मत्स्येन तिर्यग्रेखाऽन्या कार्या । अथ ग्रहस्यान्त्यफलज्यामितं सूत्रं भूमध्यादुच्चरेखायां दत्त्वा तदग्रेचिह्नात्त्रिज्यामितेनैव कर्कटेन यद्वृत्तं विलिख्यते तत्प्रतिमण्डलम् । तत्रापि सैवोच्चरेखा । किंतु तन्मध्येऽन्या तिर्यग्रेखा कार्या । प्रतिमण्डलमपि