सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ गोलाध्याये तेन मन्दस्फुटेन वा तुल्यः स्यात् । कुत इत्यतो हेतुमाह-कक्षास्थमध्योपरीति । कक्षावृत्त- स्थं यदुक्तरूपं मध्यचिह्नं तदुपरि भूगर्भप्रतिवृत्तगतग्रहोपरि नीयमानं सूत्रं कर्णस्तस्य स्वानुरुद्धमार्गेण यत्सूत्रं कक्षामण्डलावधिः । तस्य पातात्संबन्धात् । कक्षाप्रदेशकर्णसूत्रसंपाते खलु स्पष्टग्रहस्थानम् । तत्प्रकृते मध्यग्रहस्थानं एव सिद्धम् । कर्णस्योर्ध्वरेखैकदेशत्वेन सिद्धत्वादित्यर्थः । तथा च नीचोच्चतुल्यग्रहे मध्यस्फुटयोरभेदात्फलाभावः । तदग्रतः पृष्ठतश्च ग्रहे मध्ये स्फुटग्रहचिह्नयोर्भेदात्तदन्तरं फलमुत्पद्यतेऽतो यथोच्चनीचाभ्यामन्तरित- ग्रहस्तथा फलं भवतीत्युच्चं तद्विप्रकर्षजनितफलज्ञानार्थमुपयुक्तमिति सम्यगुक्तमस्य फलोप- पत्तये प्रकल्पितं तुङ्गमितीति भावः । एवं च यत्कक्षाप्रदेशसमसूत्रेण मध्यतुल्यः स्पष्टो ग्रहो दृष्टस्तथा द्वितीयपरिवर्तंतत्कक्षावृत्तप्रदेशसमसूत्रेण मध्यतुल्यः स्पष्टो दृष्टः । किंत्वन्यप्रदेश- समसूत्रेण दृष्ट इति फलाभावे ग्रह एवोच्चं तच्चलनं प्रत्यक्षप्रमाणान्न किंचिदनुभवविरुद्ध- मिति तात्पर्यम् ।।२१।। केदारदत्तः—उच्च स्थान की उपपत्ति बताई जा रही है— पूर्व कथन में उच्च ग्रहों का अन्तरांश चाप को केन्द्र चाप और केन्द्रचाप की ज्या को केन्द्र ज्या कहा गया है । ग्रह तो अपने वृत्त में वेधादि क्रम से दृश्य है किन्तु उच्च पदार्थ दृश्य नहीं है । उसे कैसे ज्ञात किया गया ? (इत्यादि इस विषय का विस्तृत विवेचन इसी ग्रन्थ के पूर्व ग्रहगणिताध्याय की शिखा नामक हिन्दी भाष्य ले० केदारदत्त जोशी में देखिए ।) अपने प्रतिमण्डलस्थ पूर्वाभिमुख गमनशील ग्रह को भूपृष्ठस्थ द्रष्टा या वेध करने वाला गणितज्ञ अपनी कक्षा में जहाँ पर ग्रह को देखता है वह स्पष्ट ग्रह होता है । मध्यम ग्रह के तुल्य स्पष्ट ग्रह दृश्य नहीं है । मध्यम ग्रह में धन वा ऋण फल संस्कार से सिद्ध मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह होता है अर्थात् फल तुल्य चाप के तुल्य आगे या पीछे आकर्षितमध्य ग्रह स्पष्ट ग्रह रूप में देखा गया है । अतः फल तुल्य चाप का आकर्षक कोई स्थान विशेष विन्दु का नाम उच्च बिन्दु होता है । भूमि से अत्यन्त दूरी पर ग्रह कक्षागत विन्दु का नाम उच्च विन्दु है, दीर्घ समय तक वेध करने से उस उच्च बिन्दु की (राश्यादि गणनया) राशि आदि का ज्ञान किया गया है । यह प्रदेश भी गतिमान है इसलिए ग्रहगणितज्ञों से इस बिन्दु की भी गति का ज्ञान किया गया है । उच्च बिन्दु से ६ राशि की दूरी पर उसी कक्षा में नीचाकर्षक बिन्दु नीच राशि होती है । उच्च राशि के तुल्य ग्रह की स्थिति में कर्ण कोटि सूत्र की एकता वशेन स्पष्ट केन्द्र ज्या = ∞ = मध्य केन्द्र ज्या = ० अतः ० ~ ० = ० अर्थात् उच्च स्थान स्थित ग्रह की स्थिति में फलाभाव समीचीन है । वेधोपलब्धि ही यहाँ-उपपत्ति है ।।१९।।२०।।२१।। Indological Truths