भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 723 में से

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पृष्ठ 280

१७८ गोलाध्याये सव्यमार्गेण कक्षायां यत्क्रमेण ग्रहचिह्नं भवति प्रत्यहं तन्मार्गेणेत्यर्थः । स्थतुङ्गान्मन्द- नीचोच्चवृत्ते मन्दोच्चस्थानात् । शीघ्रनीचोच्चवृत्ते शीघ्रोच्चस्थानादित्यर्थः । आरभ्य तदुच्चस्थानं पूर्वावधिं कृत्वेत्यर्थः । भ्रमत्युक्तमार्ग क्रमेण प्रत्यहं गच्छतीत्यर्थः । हि निश्चयेन । तेन मन्दनीचोच्चवृत्ते ग्रहः कक्षागमनमार्गाद्विपरीतमार्गेण गच्छतीत्यतिविरुद्धम् । एकग्रहबिम्बेऽविरतविरुद्धगत्योराश्रयत्वानुपत्तेः । नहि ग्रहस्वरूपं द्वेधा दर्शनाभावात् । शीघ्रप्रतिवृत्तेऽपि तथा कल्पनापरोश्चेत्याशङ्का निरस्ता । एतदाशङ्कानिवारणस्य वक्ष्यमाणत्वा- दिति सूचितम् । अतः कारणाद्भगणाङ्किते द्वादशराशिभागकलाविकलाङ्किते । अस्मिल्लिखि- खिते नीचोच्चवृत्ते । मृदुशीघ्रकेन्द्रं निजोच्चान्मन्दनीचोच्चवृत्ते मन्दोच्चस्थानान्मन्दकेन्द्रं शीघ्रनीचोच्चवृत्ते शीघ्रोच्चस्थानाच्छीघ्रकेन्द्रम् । यथोक्तमपसव्यसव्यक्रमेण देयम् । केन्द्र- भोगगणनया वृत्ते चिह्नं कार्यमित्यर्थः । केन्द्रदानप्रयोजनमाह—चुचर इति । तदग्रे उच्च- केन्द्रचिह्नाग्रस्थितवृत्तपरिध्येकदेशस्य केन्द्ररूपत्वात्तन्मूलमुच्चस्थानं केन्द्रचिह्नं तदग्रस्थानमतः केन्द्राग्रचिह्नम् । चुचरः । ग्रहचिह्नं कार्यम् । तथा नीचोच्चवृत्त उच्चस्थानात्केन्द्र- भोगान्तरेण ग्रहचिह्नं कार्यमित्यर्थः पर्यवस्यति । ग्रहचिह्नप्रयोजनमाह—दोर्ज्येति । खेटतः कृतग्रहचिह्नादुच्चरेखावधि ऊर्ध्वरेखापर्यन्तम् । ऋज्वी रेखाऽर्धज्याकारा भुजज्या स्यात् । ग्रहचिह्नान्नीचोच्चवृत्तस्थतिर्यग्रेखापर्यन्तमर्धज्याकारोर्ध्वाधरा रेखा कोटिज्या स्यात् ॥२६॥२७॥ केदारदत्तः—ग्रहबिम्ब कभी महान् कभी लघु क्यों दीखता है— उच्चराशिगत ग्रह धरित्री से अत्यन्त दूर होने से छोटा बिम्ब एवं नीच राशिगत ग्रह धरित्री के समीप होने से बड़ा दिखाई देता है । उत्पत्ति स्वयं सिद्ध उपलब्धि है ॥२२॥ ग्रह साधन की जो युक्ति मैने पूर्व में बता दी है उसे स्पष्टीकरणवासना की जानकारी चाहने वाले गणितज्ञों के असंभ्रमार्थ; अर्थात् जो अच्छी तरह नहीं हटाया जा सकता सुगमता से शिष्य को ज्ञान प्राप्त हो जाय इसलिये नीचोच्च वृत्त भङ्गि द्वारा मैं उक्त विषय अर्थात् ग्रहस्पष्टीकरण को और अच्छी तरह स्पष्ट कर रहा हूँ यह आचार्योक्ति है ॥२३॥ कक्षावृत्तीय मध्यग्रह चिन्ह केन्द्र से अन्त्य फलज्या तुल्य व्यासार्ध से निर्मित वृत्त में नीचोच्च रेखा जो भूगर्भ से मध्य ग्रहकेन्द्र गत रेखा तक गई है उसकी रचना करनी चाहिए । इस नीचोच्चवृत्त में भी भूगर्भीय रेखा सम्पात बिन्दु पर ऊपर में उच्च, और नीचे, नीच बिन्दु की कल्पना करनी चाहिए । इस नीचोच्च वृत्त में राशि, अंश, कलादि कल्पना चिह्न करने चाहिए । इस नीचोच्च वृत्त में भी मध्य ग्रह का भ्रमण होता है । उच्च से विलोम मन्द केन्द्र, और अनुलोम में शीघ्र केन्द्र समझ कर अनुपात से मन्द एवं शीघ्र फल साधन करने चाहिए ।

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या) · पृष्ठ 280, कुल 723 में से · BharatKosha