भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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छेद्यकाधिकारः १७९ उपपत्ति—इसी अध्याय के पूर्व क्षेत्र देखिये । ग्र = पारमार्थिक ग्रह । त = प्रतिवृत्तीय गणितागत ग्रह । स = कक्षा वृत्तीय ग्रह । क ग = मन्दान्त्यफलज्या । स्प ब = म त । क न = केन्द्रज्या = ज्या के क न x ग्र म ज्या के x ग्र म ग्र ल = —————————— = ————————————— क स त्रि स्प ब x क ग्र ज्या अं फ x वास्तव कर्ण ग्र म = ——————————— = ————————————————————— क स्प त्रि ज्या के ज्या अं फ x वास्तव कर्ण ग्र ल = —————— x ————————————————————— त्रि त्रि ग्र ल x क स्प ज्या के ज्या अं फ त्रि त्रैराशिक से ज्या स्प म = —————————— = —————— x ———————— x ————————— क ग्र त्रि त्रि वास्त क ज्या के x ज्या अ. फ ज्या के x परिधि = —————————————————— = —————————————— = त मे = भुज फल = दो : फ त्रि ३६ भू केन्द्र से मन्द प्रति वृत्तस्थ मध्यम ग्रह तक मन्द कर्ण एवं शीघ्र प्रतिवृत्तस्थ मन्द स्पष्ट ग्रह तक शीघ्र कर्ण होता है । अपनी ग्रह कक्षा में गतिमान ग्रह के परम फल का नाम अन्त्य फल, इसकी ज्या = मन्दान्त्य फलज्या एवं शीघ्र गति वेग से शीघ्र प्रतिवृत्त गमन शील ग्रह के परम फल का नाम परम शीघ्र फल, इसकी ज्या को परम शीघ्रफलज्या कहा गया है ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ इदानीं कर्णानयनं फलं चाऽऽह— ये केन्द्रदोःकोटिफले कृते ते नीचोच्चवृत्ते भुजकोटिजीवे । त्रिज्योर्ध्वतः कोटिफलं मृगादौ कर्यादिकेन्द्रे तदधो यतः स्यात् ॥२८ अतस्तदैक्यान्तरमत्र कोटिर्दोःफलं भूग्रहमध्यसूत्रम् । कर्णोऽथ मध्यग्रहकर्णमध्ये फलं धनर्णं तदिहोक्तवच्च ॥२९॥ वा० भा०—पूर्वार्धं सुगमम् । कक्षावृत्ते व्यासार्धं किल त्रिज्या । त्रिज्याग्रा- दुपरि कोटिफलं यतो मृगादौ केन्द्रे भवति कर्यादौ तु तदधोऽतस्तदैक्यान्तरं स्पष्टा कोटिः । तस्मिंस्त्र्यस्रे भुजफलमेव बाहुः । भूग्रहान्तरं कर्णः । दोःकोटिवर्गै-