भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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पृष्ठ 358

२५६ गोलाध्याये रिति रोमशसिद्धान्तोक्तेः संक्रान्तिषु यथा कालस्तदीयेऽप्ययने तथेति जाबाल्युक्तेश्चाति- रिक्तराशिसंक्रान्तिसिद्धेः । किंच संक्रान्तिनिरासस्याऽऽर्षोक्त्यैव संक्रान्तेरार्षोक्तत्वं सुतरां सुप्रसिद्धं च । कथमन्यथाऽप्रसक्तनिषेधः संगच्छत इति । अपि च । ब्रह्ममते एकैव संक्रान्ति- स्तर्हि संक्रान्तिपुण्यकालोक्त्यनन्तरं चलसंक्रान्तित्तिग्मांशोरित्युक्तस्यानुपपत्तिः । तन्मते संक्रान्तेस्तद्रूपत्वेनैव सिद्धेरिति । केचित्तु चलसंस्कृततिग्मांशोः संक्रमो यः स संक्रमः । न किंत्वन्य एवायनसंक्रमः इत्यर्थः । यतस्तत्क्षेत्रं तत्क्रान्तिकक्षाया, अन्यत्र नैति । अत्रायमभि- प्रायः—अयनांशैः क्रान्तिमण्डलेन सह चलितः सराशिः क्रान्तिमण्डले पूर्वस्थानं त्यक्त्वा- ऽन्यत्र न गच्छतीत्याहुः । ननु मेषतुलायनसूर्यस्य विषुवं विषुवद्वृत्तसंबन्धादुच्यते चन्द्रादि- ग्रहाणां तु पाताधिकारोक्तगोलसंभावेव तेषामयनस्थानेऽयननिवृत्यारम्भौ न किंतु पाता- धिकारोक्तायनसंधाविति तुलामेषायने यान्ति ग्रहा यद्विषुवं च तदिति शाकल्योक्तं साधारणं कथं संगतम् । शरान्तरितत्वेन ग्रहाणां तदा विषुवद्वृत्तसंबन्धाभावादग्रहसमरात्रिनिदिवत्वा- भावाच्चेति चेन्न । शराभावविषयत्वादित्यलमप्रसक्तविचारपल्लविनेन ॥१९॥ केदारदत्त : —क्रान्तिपात अर्थात् अयन चलन से अयनांश ज्ञान— राशियों का उदयमान, चर, क्रान्ति आदि ज्ञान के लिये गणित का माप मेषादि बिन्दु ही माप दण्ड होता है । अत्यन्त कम गति होने से मेषादि बिन्दु को, सृष्ट्यारम्भ मेषादि की यथार्थ प्राकृत सन्धि मेषादि को स्थिर समझ कर कुछ समय तक ग्रह गणित सिद्धान्तों की रचना होती गई । किन्तु कालान्तर में ग्रहगणितज्ञों को वेधादि से ज्ञात हुआ कि सृष्ट्यादि का नाड़ीक्रान्तिवृत्तसम्पात स्थिर न होकर कालान्तर में वह भी चल सम्पात है ऐसा ज्ञान हुआ । इस ग्रन्थ प्रणेता आचार्य के समय (शक १०३६) में यह निश्चय हो गया कि सृष्ट्यादि मेषादि सम्पात कदापि स्थिर नहीं है वह चल है । उसकी वार्षिक गति कितनी है और किस प्रकार की गति है इत्यादि बड़े महत्व की खोज पर यहाँ प्रकाश दिया जा रहा है— ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति का ज्ञान (जो पूर्व श्लोक में स्पष्ट किया गया है) करना परम आवश्यक है जिससे ग्रह को आकाशीय स्थिति वश, अनेकों पदार्थों का सम्यक् ज्ञान हो जाता है । ग्रह क्रान्ति साधन गणित मषादि बिन्दु की अपेक्षा रखता है । अतः क्रान्ति साधन के लिये पात अर्थात् दो वृत्तौं (क्रान्तिनाडीं) का सम्पात अपेक्षित होता है । क्रान्ति साधनाय पात = अर्थात् वृत्तद्वय सम्पात बिन्दु ज्ञान आवश्यक होता है । सृष्टि के आरम्भ दिन में नाड़ी क्रान्ति वृत्त का जो सम्पात बिन्दु मेषादि बिन्दु नाम से उच्चारित होता था, वह मेषादि बिन्दु भी चल बिन्दु है । तथा वह मेषादि चल सम्पात विलोमगति से चलता है अर्थात् मेषादि सम्पात पश्चि- माभिमुख मेष से पश्चिम मीन कुम्भ मकर....राशियों में गमनशील है । ग्रहों की पूर्वा- भिमुख की तरह पात मेषवृषादि अनुलोम गति शील नहीं है ।