सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोलबन्धाधिकारः २५७ अयनचलन नहीं होता है ऐसा समझना या कहना बड़ी त्रुटि है क्योंकि ग्रहवेध से अयन चलन की प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है । यदि अयन चलन होता है तो ब्रह्मगुप्त प्रभृति महान् खगोलज्ञों ने अपने ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में इस विषय पर कुछ तो कहना चाहिए था अथवा कुछ प्रकाश डालना चाहिए था उन्होंने इस विषय पर प्रकाश क्यों नहीं दिया ? इस नियम का उल्लेख तक क्यों नहीं किया ? इस शंका का समाधान भास्कर स्वयं कर रहे हैं कि आचार्य ब्रह्म गुप्त के समय में अयन चलन का ज्ञान हो गया था किन्तु उसी काल में सम्पात चलन का आभास सा था अत्यन्त स्वल्प अन्तर होने से ग्रहगणित में उल्लेख्य अन्तर के अभाव से ब्रह्म- गुप्ताचार्य ने इस पर प्रकाश नहीं डाला । वर्तमान में अर्थात् भास्कराचार्य के समय (ई० ११ के समीप पूर्वापर) में अयन चलन लगभग १० अंश पश्चिम हो गया है, इस समय तक के सभी ग्रहगणित इस ज्ञान से परिचित हो गए हैं । [चित्र में पाठ:] क्रान्ति वृत्त या राशिवृत्त नाड़ी वृत्त या विषुवद् वृत्त मकर कुम्भ मीन वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु वर्तमान २१ मार्च सन् १९८५ में चल मेषादि सम्पात = में मेषादि स्थान सृष्टि के आरम्भ में = मे अयनांश ज्ञान (अयन चलन) होने के बावजूद अयन चलन की वार्षिक गति क्या है ? इस विषय में आचार्य भास्कर भी (अपने बचाव के लिये) कह रहे हैं कि— महान् काल में अयनांश में महान् अन्तर पड़ जाने पर अयनांश गति का सही आकलन कैसे किया जायेगा तो भगवत्कृपा से आने वाले भविष्य में, गणकचक्रचूड़ामणि ब्रह्मगुप्त सदृश ग्रहगणितज्ञों की उत्पत्ति होती रहेगी उन लोगों के शोध पूर्ण ग्रन्थ रचनाओं में अयन चलन की वार्षिक या दैनन्दिनिय गति का ज्ञान होता रहेगा । १७