सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
DevanagariHindipublished723 पृष्ठ
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( २९ ) २५ २५ (भु × को) × २ = ४ त्रिभुजों का फल १५ × २० × २ = ६०० इसमें अन्तर वर्ग = (५)² = २५ जोड़ देने से ६२५ = या² अतः २५ = या ऐसी स्थिति में एक सिद्धान्त जिसे सूत्र कहते हैं उपपन्न होता है कि भुज कोटि के अन्तर वर्ग को भुज कोटि के द्विगुणित गुणनफल में जोड़ देने से वह दोनों भुज कोटि का वर्ग हो जाता है। अर्थात् (भु ~ को)² + (भु × को) × २ = भु² + को² = कर्ण² उपपन्न होता है। प्रश्न है कि भुज में ३ कम करने से प्राप्त मूल में १ कम करने से कोटि मान हो जाता है तो एक ही द्वादश भुज में अनेकों कर्णों का मान क्या होगा ? आलाप से — √भु - ३ - १ = कर्ण, कोटि, इष्ट = २ ∴ √भु - ३ = २ + १ = ३, ∴ भु - ३ = ९, भु = ९ + ३ = १२,
- कोटि = १६, कर्ण = २० अतः कर्ण² - कोटि² = १४४ = (कर्ण + को) (कर्ण - कोटि) किन्हीं दो राशियों के योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य होता है । जैसे (२० + १६) (२० - १६) = ३६ × ४ = १४४ = (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ = भुज इत्यादि ।