भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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गोलबन्धाधिकारः २७१ बद्ध्वा भगोलमिति । एवमुक्तप्रकारेण । यष्ट्यां ध्रुवयष्ट्यां भगोलं ग्रहगोलसहितं बद्ध्वा निष्पाद्यं । तां यष्टि खगोलनलिकान्तर्निबद्धखगोलप्रतिदक्षिणोत्तरनलिकाद्वयगर्भे । अङ्ग्- गुलाद्यात्मकभगोलबहिःस्थितयष्टिभागाग्रद्वयद्वारा शिथिलां प्रक्षिप्य । तां निबद्धभगोलं प्रत्यक्षभ्रमणानुरोधेन पश्चिमाभिमुखं तन्निर्मापको भ्रमयेत् । तथा च निबद्धगोलस्यापि भ्रमणसंभवान्न क्षतिरिति भावः । ननु निबद्धगोलस्य भ्रमणसंभवे खदृग्गोलयोः पूर्वनिबद्ध- योर्नलिकासंबन्धेन भ्रमणापत्तिः । नहि तद्भ्रमणमुचितम् । तत्संज्ञाव्याघातादित्यत आह— स्थिराविति । कुत इत्यतः कारणमाह—यष्ट्याधाराविति । नलिकाया अप्यन्तर्गर्भच्छि- द्रत्वेऽपि यष्ट्याधारत्वात्प्रागुक्तनलिकाद्वयासक्तावित्यर्थः । तथा च नलिकागर्भस्थिताशिथि- लाग्रध्रुवयष्टेर्भ्रमणसंभवेन तदाधारभगोलस्य भ्रमणं संभवति । खदृग्गोलाधारनलिकायाः प्रक्षेपानुक्तेस्तद्भ्रमणासंभवात्तयोरपि भ्रमणासंभव इति भावः ॥३१॥ अथाऽऽरब्धोऽधिकारो निरूपित इति फक्किकयाऽऽह—इति गोलबन्धाधिकार इति । स्पष्टम् ॥ दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्ति गोलप्रबन्धरचनाधिकृतिः स्फुटेयम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वरगणक- विरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये गोलबन्धाधिकारः संपूर्णः ॥ केदारदत्तः—क्रमोत्क्रम से १२ अहोरात्रवृत्तों के साथ ७ ग्रह कक्षा बन्धन कहा जा रहा है । नाडी वृत्त में मेषादि सम्पात से तीन वृत्तों को उत्तर की तरफ और तीन वृत्तों की दक्षिण की तरफ द्युज्या व्यासार्ध से रचना करने से क्रमोत्क्रम गणना से ये १२ बारह द्युज्या व्यासार्ध से उत्पन्न वृत्त होते हैं । इसका नाम भगोल = नक्षत्र गोल = राशिवृत्त गोल कहा गया है । इसी को खेचर गोल अर्थात् ग्रह गोल भी कहते हैं । भगोलान्तर्गत खगोल कल्पना से नीचे क्रमशः शनि- गुरु-मंगल-सूर्य-शुक्र-बुध और चन्द्रमा को कक्षावृत्तों की रचना करनी चाहिए । मकड़ी के जाल की तरह सर्वोपरि शनिकक्षा से लघु गुरु कक्षा, उससे लघु-मंगल कक्षा वृत्त की तरह गोल बन्धन करना चाहिए । इस प्रकार पूर्व में वर्णित यष्टि के आधार से खगोल नलिका (छिद्राकार) से गोल रचना कराकर स्थिर रूप में ग्रह गोल और दृग्गोल भ्रमण से दृष्टियोग्य अनन्त आकाशस्थ अनन्त ग्रह तारों की स्थिति समझनी चाहिए ॥२९॥३०॥३१॥ इति सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के गोलबन्धाधिकारः-७ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक "केदारदत्तः" हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।