सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ गोलाध्याये ग्रहणादर्शनादिति ध्येयम् । नन्वेतावता प्रश्नस्योत्तरं किं सिद्धमत आह—पश्चादिति । ततः । यतः प्रागुक्तं युक्तिसहं तस्मात्कारणादित्यर्थः । अस्य सूर्यस्य । पश्चात् । बिम्बपश्चिमभागे स्पर्शः हरिदिशि बिम्बपूर्वभागे मोक्षः । न त्वाकाशे राहुबिम्बाभावेऽपि पुराणादिसंमतो यः कश्चन राहुरेवैनं ग्रसतीत्यत आह—अत एवेति । अतश्चन्द्रस्याऽऽच्छादकत्वसिद्धेः । एवकाराद्राहुकर्तृकग्रसनप्रसिद्धेन्निरासः । एष सूर्यः । क्वापि क्वचिद्देशे । छन्न आच्छन्ने दृश्यते तदतिरिक्तदेशे । अपिहितः । अपिधानतिरोधानपिधानाच्छादनानि चेत्यमरोक्त्या । आच्छन्नोऽनाच्छन्न इत्यर्थः । दृश्यते । केचिदपिहित इत्यस्यानाच्छन्न इत्यर्थमङ्गीकृत(त्य) नकारस्योभयत्रान्वयं वदन्ति । तन्न । नकारवैयर्थ्यात् । तथा च राहुकृतार्कग्रासे सूर्यस्यैक- त्वेन सर्वदेशिकग्रहणादुक्तानुभवपलापप्रसङ्ग इति भावः । ननु चन्द्रस्याऽऽच्छादकत्वेऽप्युक्ता- नुभावः कुतः सूपपन्नः । आच्छन्नसूर्यस्यैव सर्वदेशावच्छेदेन दर्शने संभवादित्यत आह— कक्षान्तरत्वादिति । छाद्यच्छादकयोर्भिन्नकक्षास्थितत्वाभावादित्यर्थः । तथा च च्छाद्य- च्छादकयोरूर्ध्वाधरान्तराभावे सर्वदैशिकग्रहणसंभवस्तदभावे तदभाव इति भावः । नन्विदं कुतोऽवगतमित्यतश्छादकदृष्टान्तमाह—जलदवदिति । यथाऽधःस्थितैर्मेघैरर्कः क्वचिच्छन्नः क्वचिच्च न च्छन्न इति प्रत्यक्षानुभावात्सूर्यस्य ग्रहणेऽपि कल्प्यते । परमियान्विशेषः । मेघानामासन्नस्थितत्वात्स्वस्य भूप्रदेशान्तरेण च्छन्नाच्छन्नत्वं प्रत्यक्षसिद्धम् । चन्द्रस्यातिदूर- स्थत्वेन च्छन्नाच्छन्नत्वं बहुदेशान्तरेणेति भावः ॥११॥ केदारदत्तः—सूर्यग्रहण की स्पर्श मोक्ष दिशा— पृथ्वी पृष्ठ से आकाश पर दृष्टि पड़ने पर चन्द्रकक्षागत चन्द्रमा के ऊपर की सूर्य कक्षास्थित सूर्य बिम्ब की चन्द्र कक्षा से भिन्न कक्षागत की स्थिति होने से अमान्त में सूर्य से संयोग कर चन्द्रमा अपनी पूर्वाभिमुखी गति से राशिवृत्ताभिप्रायिक सूर्य के साथ होता है तो सूर्य बिम्ब के पश्चिम की तरफ से पहिले सूर्य को ढकता है जैसे पृथ्वी भिन्न प्रदेशों से सूर्य कहीं बादलों से ढँका और कहीं अविकृत विशेष प्रकाश मान पूर्ण दीखता है, उसी प्रकार कहीं चन्द्रमा से सूर्य आच्छादित और कहीं स्वच्छ भी दीखता है । अतएव सूर्य ग्रहण में सूर्य बिम्ब का छादक का कार्य करने से सूर्य का, चन्द्रमा को ही छादक कहा जाता है । सूर्य बिम्ब को सूर्ये के पश्चिम से ढकते हुये अपनी कक्षा में चन्द्रमा जब सूर्य केन्द्र तक पहुँचता है तो उस समय सूर्य का मध्य ग्रहण और जब सूर्य से चन्द्रमा आगे हो जाता है तो सूर्य बिम्ब के पूर्व भाग से ग्रहण का मोक्ष होता है । बादलों से घिरे आकाश में स्थित सूर्य बिम्ब का कहीं अदर्शन और कहीं पर स्वच्छ धूप, भूपृष्ठीय भिन्न-भिन्न प्रदेशीय समान सूर्य को जैसे देखता है उसी प्रकार चन्द्र बिम्ब से आच्छादित सूर्य की स्थिति से भूपृष्ठ में कहीं सूर्य ग्रहण और कहीं ग्रहणाभाव अर्थात् सूर्यबिम्ब स्वच्छ दिखाई देता है । सूर्य ग्रहण में यही स्थिति कहीं ग्रहण और कहीं ग्रहणाभाव भूपृष्ठ वासी देखता है कि सूर्य बिम्ब का चन्द्रमा से ग्रहण होते समय पश्चिम