सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय
श्रीमद्भास्कराचार्य विरचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के अंकगणित (लीलावती) और बीजगणित नामक दोनों भागों के विषयों का पूर्व में संक्षिप्त विवरण हो चुका है। ध्यान देने की बात है कि इन दोनों के महत्त्व को समझकर, मुगलकाल में बादशाह अकबर ने फारसी भाषा में इनका अनुवाद फैजी नामक विद्वान से सन् १५८७ में तथा बादशाह अकबर के पौत्र बादशाह शाहजहाँ ने भी १६३४ ई० में अल्लाहसदी द्वारा बीजगणित का अनुवाद कराया गया। अब तक इन दोनों ग्रन्थों का पश्चिम के गणितज्ञों से आंग्ल भाषा में प्रकाशन, प्रचार और महत्व स्थापित हो चुका है। श्री भास्कराचार्य ने अंकगणित (लीलावती) एवं बीजगणित की रचना के बाद सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के तृतीय भाग ग्रहगोलाध्याय की रचना की एवं इसके पश्चात् अन्तिम भाग ग्रहगणिताध्याय की सफल रचना की इसकी पुष्टि हमें आचार्य भास्कर के ही कथन से मिलती है। जैसे-ग्रहगणिताध्याय के भगणाध्याय के श्लोक ७ में "अत्रोपपत्तिर्गोले" तथा अन्यत्र समग्र ग्रहगणिताध्याय में "समं भसूर्यावुदितौ किलाक्ष्याँ" "एवं सर्वमुपपन्नं तच्च गोले सम्यगभिहिता व्याख्याता च", "तात्कालीकीकरणकारणता गोले कथिता व्याख्याता च" तथा "दर्शाग्रत सङ्क्रमकालतः प्राक् सदैव तिष्ठत्यधिमासशेषम्" इत्यादि "गोले कथितं" आदि से सुस्पष्ट है कि आचार्य भास्कर ने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के लीलावती (अंक- गणित) बीजगणित भाग के पश्चात् इस ग्रहगोलाध्याय की रचना कर अन्त में ग्रहगणिता- ध्याय की रचना की है। सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगोल, भूगोल, खगोल का अत्यन्त रोचक, सरल और स्पष्ट वर्णन करने के पश्चात् आचार्य भास्कर को अनुभव हुआ कि ग्रहगोल, खगोल विषयक ज्योतिष के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगणित की सैद्धान्तिक सोदाहरण उपपत्ति के बावजूद उन्होंने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के चतुर्थ भाग ग्रह-गणिताध्याय की सफल रचना की। आचार्य भास्कर की सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ये दोनों भाग ज्योति- र्विद्या (खगोल विद्या) की अद्भुत व आश्चर्यजनक देन हैं। भारतीय ग्रहगोल खगोलशास्त्रियों के एतद्विषयक ज्ञानलाभ के लिए सिद्धान्तशिरो- मणि ग्रन्थ आज तक इकाई है और त्रिश्व के गणितज्ञान गोल पिपासुओं के लिए भी भास्कराचार्य की यह देन अत्यन्त समादरणीय है। अतः ग्रन्थ के दोनों भागों ग्रहगोला- ध्याय व ग्रहगणिताध्याय की समीक्षा जो अतिअ वश्यक भी है संक्षेप से इस स्थल पर यथामति-यथाशक्ति की जा रही है।